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Barabanki News: सुई-धागे से झोले-बैग बना उठा रहीं परिवार का खर्च
Thu, 19 Jun 2025 01:01 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Thu, 19 Jun 2025 01:01 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कोठी (बाराबंकी)। सिद्धौर ब्लॉक के मुरलीगंज इलाके की निवासी अलका शर्मा सुई-धागे की मदद से अपनी जिंदगी संवारी है। मात्र 15 हजार रुपये का ऋण लेकर सुई-धागे की मदद से कपड़े के झोले व बैग बना कर पूरे परिवार का खर्च उठाने वाली अलका आज अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हैं। खुद स्वावलंबी बनने के साथ वह अन्य महिलाओं को भी काम दे कर आत्म निर्भर बना रही हैं। ब्लॉक क्षेत्र में हर कोई उनके सिले बैग व झोले पूरे भरोसे के साथ खरीदता है। अपने उत्कृष्ट कार्य के लिए वह ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक सम्मानित भी हो चुकी हैं।
राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत गठित जय मां सरस्वती स्वयं सहायता समूह के संचालक के रूप में अलका ने गांव की अन्य महिलाओं को भी समूह में जोड़ रखा है। उन्होंने यह समूह 15 हजार का ऋण लेकर एक सिलाई मशीन के साथ शुरू किया था। इसके बाद नए व पुराने कपड़े खरीदकर इनके बैग व झोले बनाकर बेचना शुरू किया। अलका अब बच्चों के लिए कपड़े से तैयार स्कूली बैग भी बना रही है।
इसकी बिक्री से होने वाली आय से वह खुद के साथ समूह से जुड़ी अन्य महिलाओं के परिवार का खर्च भी बिना किसी परेशानी के उठा रही है। उनकी प्रेरण से ही गांव की अन्य महिलाएं भी अब कपड़े के बैग व झोले बनाने का हुनर सीख कर समूह से जुड़ने लगी हैं।
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कोठी (बाराबंकी)। सिद्धौर ब्लॉक के मुरलीगंज इलाके की निवासी अलका शर्मा सुई-धागे की मदद से अपनी जिंदगी संवारी है। मात्र 15 हजार रुपये का ऋण लेकर सुई-धागे की मदद से कपड़े के झोले व बैग बना कर पूरे परिवार का खर्च उठाने वाली अलका आज अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हैं। खुद स्वावलंबी बनने के साथ वह अन्य महिलाओं को भी काम दे कर आत्म निर्भर बना रही हैं। ब्लॉक क्षेत्र में हर कोई उनके सिले बैग व झोले पूरे भरोसे के साथ खरीदता है। अपने उत्कृष्ट कार्य के लिए वह ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक सम्मानित भी हो चुकी हैं।
राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत गठित जय मां सरस्वती स्वयं सहायता समूह के संचालक के रूप में अलका ने गांव की अन्य महिलाओं को भी समूह में जोड़ रखा है। उन्होंने यह समूह 15 हजार का ऋण लेकर एक सिलाई मशीन के साथ शुरू किया था। इसके बाद नए व पुराने कपड़े खरीदकर इनके बैग व झोले बनाकर बेचना शुरू किया। अलका अब बच्चों के लिए कपड़े से तैयार स्कूली बैग भी बना रही है।
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इसकी बिक्री से होने वाली आय से वह खुद के साथ समूह से जुड़ी अन्य महिलाओं के परिवार का खर्च भी बिना किसी परेशानी के उठा रही है। उनकी प्रेरण से ही गांव की अन्य महिलाएं भी अब कपड़े के बैग व झोले बनाने का हुनर सीख कर समूह से जुड़ने लगी हैं।
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