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बस हादसों में 33 की जान गई, कार्रवाई किसी पर नहीं
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बाराबंकी। जिले में बीते दो माह के अंतराल में हुए दो बड़े बस हादसों में अब तक 33 लोगों की जान चली गई है। इसके बाद भी परिवहन विभाग के अफसर बेखबर है। बिना फिटनेस व परमिट के बसें क्षमता से अधिक सवारियां लेकर फर्राटा भर रही हैं। हादसा होने के बाद सिर्फ चेकिंग की खानापूर्ति कर खुद की गर्दन बचा ली जाती है। शासन स्तर से इन लापरवाह अफसरों पर कोई कार्रवाई न होने से यहां के हालत में सुधार नहीं हो पा रहा है।
बीते 28 जुलाई की रात को रामसनेहीघाट कोतवाली क्षेत्र में अयोध्या हाईवे पर एक डबल डेकर बस हादसे का शिकार हो गई थी। इस हादसे में जहां 18 लोगों की मौत हो गई थी वहीं तमाम यात्री गंभीर रूप से घायल हुए थे। जांच में इस बस में कई कमियां मिली थीं।
इसके बाद सक्रिय हुए अफसरों ने खानापूर्ति करने के लिए अभियान चलाना शुरू किया। कागजों पर चालान व जुर्माना करने की कार्रवाई भी दिखाई गई लेकिन इसके बाद भी बिना परमिट व फिटनेस के चलने वाले वाहनों पर रोक नहीं लग सकी। इसी का नतीजा है कि बुुधवार रात देवा के पास हुए हादसे में 15 लोगों की जान चली गई है।
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यह नहीं वर्ष 2019 सितंबर में भी राससनेहीघाट के पास एक डबल डेकर बस हादसे का शिकार हुई थी जिसमें दो यात्रियों की मौत होने के साथ करीब 50 लोग घायल हो गए थे। इसके अलावा सफेदाबाद व सफदरगंज के पास भी हुए बस हादसे में कई लोगों की जान जा चुकी है।
हादसों पर भी गंभीर नहीं होते अफसर
भले ही बस हादसों में लोग अपनी जान गवां रहे हों पर परिवहन विभाग के अफसरों को इससे कोई मतलब नहीं है। हादसे के बाद खुद की गर्दन बचाने के लिए शासन को ऐसी रिपोर्ट भेजी जाती है जिसमें यह लगे कि विभाग तो बहुत काम कर रहा है। इसी का नतीजा है कि शासन भी ऐसे अफसरों पर कार्रवाई नहीं करता है।
जबकि प्रदेश की राजधानी से सटे जिले के मामलों का संज्ञान सीएम तक लेते हैं। उसके बाद भी बाराबंकी में हुए दो बस हादसों में 33 लोगों की मौत के बाद भी किसी भी अधिकारी के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। यहां लंबे समय से जमे एआरटीओ भी अपना रैकेट मजबूत किए हैं जिससे डग्गामारी लगातार बढ़ती जा रही है।
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बीते 28 जुलाई की रात को रामसनेहीघाट कोतवाली क्षेत्र में अयोध्या हाईवे पर एक डबल डेकर बस हादसे का शिकार हो गई थी। इस हादसे में जहां 18 लोगों की मौत हो गई थी वहीं तमाम यात्री गंभीर रूप से घायल हुए थे। जांच में इस बस में कई कमियां मिली थीं।
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इसके बाद सक्रिय हुए अफसरों ने खानापूर्ति करने के लिए अभियान चलाना शुरू किया। कागजों पर चालान व जुर्माना करने की कार्रवाई भी दिखाई गई लेकिन इसके बाद भी बिना परमिट व फिटनेस के चलने वाले वाहनों पर रोक नहीं लग सकी। इसी का नतीजा है कि बुुधवार रात देवा के पास हुए हादसे में 15 लोगों की जान चली गई है।
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यह नहीं वर्ष 2019 सितंबर में भी राससनेहीघाट के पास एक डबल डेकर बस हादसे का शिकार हुई थी जिसमें दो यात्रियों की मौत होने के साथ करीब 50 लोग घायल हो गए थे। इसके अलावा सफेदाबाद व सफदरगंज के पास भी हुए बस हादसे में कई लोगों की जान जा चुकी है।
हादसों पर भी गंभीर नहीं होते अफसर
भले ही बस हादसों में लोग अपनी जान गवां रहे हों पर परिवहन विभाग के अफसरों को इससे कोई मतलब नहीं है। हादसे के बाद खुद की गर्दन बचाने के लिए शासन को ऐसी रिपोर्ट भेजी जाती है जिसमें यह लगे कि विभाग तो बहुत काम कर रहा है। इसी का नतीजा है कि शासन भी ऐसे अफसरों पर कार्रवाई नहीं करता है।
जबकि प्रदेश की राजधानी से सटे जिले के मामलों का संज्ञान सीएम तक लेते हैं। उसके बाद भी बाराबंकी में हुए दो बस हादसों में 33 लोगों की मौत के बाद भी किसी भी अधिकारी के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। यहां लंबे समय से जमे एआरटीओ भी अपना रैकेट मजबूत किए हैं जिससे डग्गामारी लगातार बढ़ती जा रही है।