{"_id":"07f21b1609b875276b2d6954609c1e72","slug":"nirjla-vow-began-with-ritual-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"खरना अनुष्ठान के साथ शुरू किया निर्जला व्रत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खरना अनुष्ठान के साथ शुरू किया निर्जला व्रत
बाराबंकी/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 16 Nov 2015 10:25 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भगवान भास्कर की उपासना के महापर्व छठ पूजा पर महिलाओं ने सोमवार शाम से निर्जला व्रत शुरू किया तथा गुड़ और साढ़े के चावल की बनी रसियाव का भोग लगाया। शाम को भोग लगाकर व्रत रखने वाली महिलाओं व पुरुषों ने रसियाव, रोटी व लौकी या कद्दू की सब्जी का स्वल्पाहार लिया। व्रत प्रारंभ होने के साथ ही छठ पूजा के पारंपरिक गीत सुनाई देने लगे हैं।
छठ पूजा के इस महापर्व में उगते हुए सूर्य के साथ अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। छठ पूजा के चार दिवसीय अनुष्ठान के अंतर्गत सोमवार शाम को गुड़ और साढ़े के चावल व गुड़ से बनाए गए रसियाव का भोग लगाया तथा स्वल्पाहार लिया।
तथा घर के लोगों को रसियाव प्रसाद के रूप में दिया गया। इसी के साथ ही महिलाओं ने निर्जला व्रत की शुरुआत की तथा खरना अंतर्गत पूजा अर्चना के साथ ही भगवान भास्कर का अर्घ्य देने की तैयारियां करीब-करीब पूरी कर ली गई। कई घरों में पुरुषों के भी व्रत रखने की परंपरा है। छठ मइया के पारंपरिक गीतों से घरों में उत्सव जैसा माहौल हो गया है।
विज्ञापन
ठेकुआ का विशेष महत्व
छठ महापर्व को लेकर घर-घर में उत्साह का माहौल है। ठेकुआ (सूर्य की डिजायन के पुए) का विशेष महत्व है। सोमवार को दिन में व्रत रखने वाली महिलाओं ने छठ मइया के गीत गाते हुए ठेकुआ बनाए। दूर दराज रहकर नौकरी करने वाले, आए रिश्तेदारों से घरों में उत्सव सरीखा माहौल है। खरना रस्म के साथ ही रसियाव का भोग लगाकर महिलाओं ने निर्जला व्रत की शुरुआत की।
डूबते सूर्य को अर्घ्य आज
रेठ नदची के चिलहटा घाट, नागेश्वरनाथ मंदिर तालाब, पीएसी बटालियन स्थित तालाब व सूतमिल कालोनी स्थित अस्थाई तालाब पर श्रद्धालुओं द्वारा भगवान सूर्य की पूजा अर्चना की जाएगी। मंगलवार को डूबते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
छठ पूजा के चलते दुकानों पर लगी रही भीड़
बाजार में महिलाओं ने छठ पूजा की तैयारियों का सामान खरीदा। खासकर फलों व साड़ी की दुकानों मेें महिलाओं की भीड़ रही। बाजार में गागरा और सुथनी की खूब डिमांड रही। गागरा व सुथनी दोनों ही बिहार प्रांत में उत्पादित होने वाले फल हैं। छठ पूजा में इन फलों को विशेष रूप से चढ़ाया जाता है। सुथनी देखने में आलू जैसा होता है, इसका स्वाद शकरकंद जैसा मीठा होता है। वहीं गागरा मुसंमी जैसा होता है लेकिन इसका आकार काफी बड़ा होता है। बाजार पहुंची महिलाओं ने पूजा में जरूरत की सामग्री कच्ची हल्दी, कच्ची अदरख, कच्ची गाजर, शकरकंद, आंवला, कैथा, कमरान, पनियाला, अनानास, गन्ना, सिंघाड़ा, शरीफा, केला, सेव, संतरा, कच्ची सुपारी आदि की खरीदारी की।
प्रत्यक्ष दिखने वाले देवता हैं भगवान सूर्य
सूर्य की उपासना करने वाले रामनाथ मौर्या बताते हैं कि सूर्य प्रत्यक्ष दिखने वाले देवता हैं जो सुबह से लेकर शाम तक दिखाई देते हैं। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार का ही पर्व नहीं है बल्कि सबका है। अलग-अलग स्थानों पर भगवान सूर्य की पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है।
व्रत के दौरान भूमि पर किया जाता है शयन
अभय नगर निवासी सुरभि चौरसिया बताती हैं व्रत मेें साफ-सफाई का विशेष महत्व है। व्रत का सारा सामान ठेकुआ आदि लकड़ी के चूल्हे पर बनाया जाता है। व्रत के दौरान भूमि पर चटाई बिछा कर शयन किया जाता है।
डाला लेेकर घाट पर जाते हैं पुरुष
अभय नगर निवासी शिवम चौरसिया ने बताया कि छठ पूजा के दौरान पुरुष व्रत रखने वाली महिलाओं के साथ पूजा स्थल पर डाला (पूजा की टोकरी) लेकर जाते हैं। बिहार में इसे बहंगी भी कहते हैं। अर्घ्य देते समय महिलाओं को पूजा का सामान गंगाजल, फल आदि एक-एक कर प्रदान करते हैं और महिलाएं पूजा अर्चना करती हैं।
सिप-सोप्ता पर चढ़ाया जाता है अघरौटा
तान्या सिंह ने बताया कि टोकरी में लाए फल-फूल व पूजन सामग्री से कलश व वेदी की पूजा की जाती है। साथ ही नदी किनारे घाट पर बनाए गए सिप-सोप्ता (मंदिरनुमा गुबंद) पर अघरौटा (ठेकुआ) चढ़ाया जाता है। पांच चक्कर परिक्रमा कर पूजा अर्चना की जाती है।
विज्ञापन
छठ पूजा के इस महापर्व में उगते हुए सूर्य के साथ अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। छठ पूजा के चार दिवसीय अनुष्ठान के अंतर्गत सोमवार शाम को गुड़ और साढ़े के चावल व गुड़ से बनाए गए रसियाव का भोग लगाया तथा स्वल्पाहार लिया।
विज्ञापन
तथा घर के लोगों को रसियाव प्रसाद के रूप में दिया गया। इसी के साथ ही महिलाओं ने निर्जला व्रत की शुरुआत की तथा खरना अंतर्गत पूजा अर्चना के साथ ही भगवान भास्कर का अर्घ्य देने की तैयारियां करीब-करीब पूरी कर ली गई। कई घरों में पुरुषों के भी व्रत रखने की परंपरा है। छठ मइया के पारंपरिक गीतों से घरों में उत्सव जैसा माहौल हो गया है।
विज्ञापन
ठेकुआ का विशेष महत्व
छठ महापर्व को लेकर घर-घर में उत्साह का माहौल है। ठेकुआ (सूर्य की डिजायन के पुए) का विशेष महत्व है। सोमवार को दिन में व्रत रखने वाली महिलाओं ने छठ मइया के गीत गाते हुए ठेकुआ बनाए। दूर दराज रहकर नौकरी करने वाले, आए रिश्तेदारों से घरों में उत्सव सरीखा माहौल है। खरना रस्म के साथ ही रसियाव का भोग लगाकर महिलाओं ने निर्जला व्रत की शुरुआत की।
डूबते सूर्य को अर्घ्य आज
रेठ नदची के चिलहटा घाट, नागेश्वरनाथ मंदिर तालाब, पीएसी बटालियन स्थित तालाब व सूतमिल कालोनी स्थित अस्थाई तालाब पर श्रद्धालुओं द्वारा भगवान सूर्य की पूजा अर्चना की जाएगी। मंगलवार को डूबते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
छठ पूजा के चलते दुकानों पर लगी रही भीड़
बाजार में महिलाओं ने छठ पूजा की तैयारियों का सामान खरीदा। खासकर फलों व साड़ी की दुकानों मेें महिलाओं की भीड़ रही। बाजार में गागरा और सुथनी की खूब डिमांड रही। गागरा व सुथनी दोनों ही बिहार प्रांत में उत्पादित होने वाले फल हैं। छठ पूजा में इन फलों को विशेष रूप से चढ़ाया जाता है। सुथनी देखने में आलू जैसा होता है, इसका स्वाद शकरकंद जैसा मीठा होता है। वहीं गागरा मुसंमी जैसा होता है लेकिन इसका आकार काफी बड़ा होता है। बाजार पहुंची महिलाओं ने पूजा में जरूरत की सामग्री कच्ची हल्दी, कच्ची अदरख, कच्ची गाजर, शकरकंद, आंवला, कैथा, कमरान, पनियाला, अनानास, गन्ना, सिंघाड़ा, शरीफा, केला, सेव, संतरा, कच्ची सुपारी आदि की खरीदारी की।
प्रत्यक्ष दिखने वाले देवता हैं भगवान सूर्य
सूर्य की उपासना करने वाले रामनाथ मौर्या बताते हैं कि सूर्य प्रत्यक्ष दिखने वाले देवता हैं जो सुबह से लेकर शाम तक दिखाई देते हैं। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार का ही पर्व नहीं है बल्कि सबका है। अलग-अलग स्थानों पर भगवान सूर्य की पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है।
व्रत के दौरान भूमि पर किया जाता है शयन
अभय नगर निवासी सुरभि चौरसिया बताती हैं व्रत मेें साफ-सफाई का विशेष महत्व है। व्रत का सारा सामान ठेकुआ आदि लकड़ी के चूल्हे पर बनाया जाता है। व्रत के दौरान भूमि पर चटाई बिछा कर शयन किया जाता है।
डाला लेेकर घाट पर जाते हैं पुरुष
अभय नगर निवासी शिवम चौरसिया ने बताया कि छठ पूजा के दौरान पुरुष व्रत रखने वाली महिलाओं के साथ पूजा स्थल पर डाला (पूजा की टोकरी) लेकर जाते हैं। बिहार में इसे बहंगी भी कहते हैं। अर्घ्य देते समय महिलाओं को पूजा का सामान गंगाजल, फल आदि एक-एक कर प्रदान करते हैं और महिलाएं पूजा अर्चना करती हैं।
सिप-सोप्ता पर चढ़ाया जाता है अघरौटा
तान्या सिंह ने बताया कि टोकरी में लाए फल-फूल व पूजन सामग्री से कलश व वेदी की पूजा की जाती है। साथ ही नदी किनारे घाट पर बनाए गए सिप-सोप्ता (मंदिरनुमा गुबंद) पर अघरौटा (ठेकुआ) चढ़ाया जाता है। पांच चक्कर परिक्रमा कर पूजा अर्चना की जाती है।