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प्राकृतिक खेती कर रहे विपिन की राह पर चल पड़े पांच सौ किसान
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बाराबंकी। खेती-किसानी में डंका बजा रहे बाराबंकी के प्रगतिशील किसानों में एक और नाम जुड़ गया है। मसौली ब्लॉक के रजईपुर गांव के किसान विपिन वर्मा ने हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय गढ़वाल से कृषि अर्थशास्त्र से परास्नातक की डिग्री लेकर वर्ष 2018 में गांव लौटे।
पूरे जिले का भ्रमण कर भौगोलिक स्थित जानी। उसके बाद चार माह बाद ही गोआधारित प्राकृतिक खेती की ऐसी शुरूआत की कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने रासायनिक खाद के प्रयोग को बाय-बाय कर गाय के गोबर और गोमूत्र से धान-गेेहूं, आलू और सब्जी की प्राकृतिक खेती कर लागत ही नहीं कम की बल्कि मुनाफे की खेती कर दिखाया। वहीं विलुप्त होते देशी बीज को भी जीवंतकर किसानों को उपलब्ध करा रहे हैं।
विपिन को प्राकृतिक खेती के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो देशी प्रजाति के बीजों को संरक्षित करने को नवधन्या इंटरनेशनल फाउंडेशन की वंदना से सम्मान मिल चुका है। विपिन करीब पांच हजार किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक कर चुके हैं। इसमें से राष्ट्रीय आजीविका मिशन के समूह की महिलाओं समेत पांच सौ से अधिक किसानों ने विपिन की राह पर गोआधारित प्राकृतिक खेती करनी शुरू कर दी है।
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विपिन बताते हैं कि वह 20 बीघ में धान-गेहूं, आलू और सब्जी की प्राकृतिक खेती के साथ विलुप्त होते धान के देशी प्रजाति सरयू बावन, इंद्रासन, काला नमक, सर्बती, चिन्नौर, शक्कर चीनी और श्रीराम, गेहूं के नंहा सम्राट, बंशी, काला गेहूं और लौकी, कद्दू के देशी बीज भी प्राकृतिक खेती द्वारा जीवंत कर रहे हैं।
देशी बीज को मार्केट में बेचने की बजाय किसानों को बीज के बदले बीज देकर देशी प्रजाति को बढ़ावा दे रहे हैं। विपिन बताते हैं कि प्राकृतिक खेती में बाजार के उर्वरक और कीटनाशक की जगह गाय के गोबर और गोमूत्र से बना जीवामृत, घनामृत और दसपर्णी का प्रयोग किया जाता है। लागत की बात करें तो सिर्फ जुताई व मजदूरी पर खर्च आता है।
शुरूआत में प्राकृतिक खेती करने से पहले वर्ष उत्पादन कम होता है। मगर, लागत कम आने से औसतन घाटा नहीं होता। धीरे-धीरे खेतों की उर्वरा शक्ति के साथ उत्पादन बढ़ता है। इससे किसान एक लाख रुपये प्रति एकड़ मुनाफा कमा लेते हैं। विपिन ने अपना आश्री फाउंडेशन और वेबसाइट भी बना रखी है।
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पूरे जिले का भ्रमण कर भौगोलिक स्थित जानी। उसके बाद चार माह बाद ही गोआधारित प्राकृतिक खेती की ऐसी शुरूआत की कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने रासायनिक खाद के प्रयोग को बाय-बाय कर गाय के गोबर और गोमूत्र से धान-गेेहूं, आलू और सब्जी की प्राकृतिक खेती कर लागत ही नहीं कम की बल्कि मुनाफे की खेती कर दिखाया। वहीं विलुप्त होते देशी बीज को भी जीवंतकर किसानों को उपलब्ध करा रहे हैं।
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विपिन को प्राकृतिक खेती के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो देशी प्रजाति के बीजों को संरक्षित करने को नवधन्या इंटरनेशनल फाउंडेशन की वंदना से सम्मान मिल चुका है। विपिन करीब पांच हजार किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक कर चुके हैं। इसमें से राष्ट्रीय आजीविका मिशन के समूह की महिलाओं समेत पांच सौ से अधिक किसानों ने विपिन की राह पर गोआधारित प्राकृतिक खेती करनी शुरू कर दी है।
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विपिन बताते हैं कि वह 20 बीघ में धान-गेहूं, आलू और सब्जी की प्राकृतिक खेती के साथ विलुप्त होते धान के देशी प्रजाति सरयू बावन, इंद्रासन, काला नमक, सर्बती, चिन्नौर, शक्कर चीनी और श्रीराम, गेहूं के नंहा सम्राट, बंशी, काला गेहूं और लौकी, कद्दू के देशी बीज भी प्राकृतिक खेती द्वारा जीवंत कर रहे हैं।
देशी बीज को मार्केट में बेचने की बजाय किसानों को बीज के बदले बीज देकर देशी प्रजाति को बढ़ावा दे रहे हैं। विपिन बताते हैं कि प्राकृतिक खेती में बाजार के उर्वरक और कीटनाशक की जगह गाय के गोबर और गोमूत्र से बना जीवामृत, घनामृत और दसपर्णी का प्रयोग किया जाता है। लागत की बात करें तो सिर्फ जुताई व मजदूरी पर खर्च आता है।
शुरूआत में प्राकृतिक खेती करने से पहले वर्ष उत्पादन कम होता है। मगर, लागत कम आने से औसतन घाटा नहीं होता। धीरे-धीरे खेतों की उर्वरा शक्ति के साथ उत्पादन बढ़ता है। इससे किसान एक लाख रुपये प्रति एकड़ मुनाफा कमा लेते हैं। विपिन ने अपना आश्री फाउंडेशन और वेबसाइट भी बना रखी है।