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खाने के लिए तरस रहे बाढ़ पीड़ित

Fri, 11 Aug 2017 11:42 PM IST
अमर उजाला/बाराबंकी
अमर उजाला/बाराबंकी Updated Fri, 11 Aug 2017 11:42 PM IST
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Craving for food flood victims
बाढ़ - फोटो : amar ujala
 घाघरा की बाढ़ से तबाही पर पहुंचे पीड़ितों का दर्द सिर्फ दो जून की रोटी और तन ढकने का कपड़ा ही नहीं है। किसी को बेटी के हाथ पीले करने की फिक्र सता रही है तो कोई इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। आदिवासियों से भी बदतर जीवन को विवश हैं। वैसे तो प्रतिवर्ष घाघरा अपनी चपेट में लेकर सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दाने-दाने का मोहताज बना जाती है।
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इस बीच सबसे बड़ी समस्या इनके सामने होती है बेटी और बेटों का विवाह, बुजुर्गों का इलाज कैसे करें जब पूरा समय घर बसाने और दो जून की रोटी में बीत जाता है। वर्षों से इनके दर्द का स्थाई हल निकलाने के लिए प्रदेश के सत्तासीन नेता आते हैं वादे करते हैं करोड़ों रुपये खर्च करते हैं और समस्या हल करने के नाम पर सिर्फ वही ढाक के तीन पात की तरह रह जाती है। यह हालात तराई के करीब सवा सौ गांवों की डेढ़ लाख आबादी कहा है। पर इसके कुछ उदाहरण पूरी तस्वीर को पेश करने के लिए काफी हैं।  
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 तेलवारी निवासी केशव बताते हैं कि नदी के बीच रेता मे उनका खेत है वहीं पर मकान बनाकर खेती बाड़ी करते हैं। पिछले साल बाढ़ ने अनाज नहीं होने दिया तो इस साल बारह बीघे धान की फसल बाढ़ की पानी में डूब गई है। जिससे इस वर्ष भी अनाज होने की उम्मीद नहीं है।
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बताते हैं कि दो साल पहले बिटिया की शादी तय की थी बाढ़ के चलते पिछले साल तारीख बढ़ा दी हालात इस साल भी वैसे हैं जिससे इस वर्ष भी बिटिया के हाथ पीले कर पाना संभव नहीं दिख रहा है। जहां पर वह मकान बना कर रहते व खेतीबारी करते हैं।                   
   
गोबरहा निवासी रामदीन का परिवार बताता है कि बाढ़ के चलते नाते रिश्तेदारों से भी संबंध बहुत कम ही रह पाते हैं। सब कुछ होने के बाद भी कुछ नहीं बचता है बाढ़ आती है और अपने साथ सब कुछ बहा ले जाती है।

साल भर मेहनत कर जितना बनते है एक पल में सब खत्म हो जाता है। बाढ़ के चलते बच्चों की शादी करने को कोई तैयार नहीं है। बाढ़ आने से पहले ही लड़के गांव के बाहर कमाने चले जाते हैं क्योंकि बाढ़ के वक्त परिवार का पालन करना सबसे कठिन काम होता है।        
  
अतरौली गांव की जखाना बताती है खून पसीने की कमाई घाघरा नदी की बाढ़ पल भर में अपने साथ बहा ले जाती है। घर में लड़के बीमार हो जाए तो इलाज के लिए भी पैसा नहीं रहता है। प्रशासन से भी हम लोगों को कोई खास मदद नहीं मिलती है।

मकान बाढ़ के पानी में बह गया है। बंधे पर तिरपाल के सहारे पूरे परिवार के साथ गुजर बसर की जा रही है। बाढ़ के चलते मेहनत मजदूरी का कार्य भी नहीं हो पाता है। जिससे दो वक्त की रोटी जुटा पाना काफी मुश्किल हो जाता है।        
     
गोबरहा के निवासी गमलू बताते हैं कि उजड़ना और बसना अब हम लोगों की नीयत बन गई है। खून पसीना बहाकर साल भर जुटाते हैं और नदी की बाढ़ आती है और पल भर में सब कुछ अपने साथ बहा ले जाती है। खेती न होती तो दूसरे गांव में जाकर बस जाते लेकिन खेती के सहारे ही परिवार चलता है।


खेतों में धान की फसल बोई गई है बाढ़ के पानी में पिछले एक माह से डूबी है। फसल से अब कोई उम्मीद नहीं बची है कि उसमें कुछ मिलेगा। पानी खत्म होने के बाद नए सिरे से जिंदगी शुरू की जाती है।
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