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Barabanki News: आस्था के धागे पिरो कर में कायम की मिसाल
Fri, 11 Apr 2025 12:05 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Fri, 11 Apr 2025 12:05 AM IST
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कोटवाधाम (बाराबंकी)। एकता के सूत्र में पिरोए आस्था के धागे में दिव्यांग गौरा ने रोजगार का अवसर खोज लिया। अब वह अपने परिवार को भरण-पोषण करने के साथ ही दूसरों को भी स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।
सतनामी संप्रदाय के आदि प्रवर्तक समर्थ स्वामी जगजीवन साहेब के अनुयायी एकता का सौहार्द का प्रतीक धागा अपने हाथ में बांधते हैं। कोटवाधाम तीर्थ आने वाले तीर्थयात्री इस धागे को खूब खरीदते हैं। पैर से दिव्यांग होने के कारण चलने-फिरने में असमर्थ गौरा एकता के सूत्र में पिरोए जाने वाले आस्था के इस धागे को बनाने में काफी माहिर है। वह बैठे-बैठे व धागा बनाने के साथ ही अपनी दुकान पर उसे बेचती भी हैं।
फेरी लगाकर बेचने वाले युवा भी उसी से यह धागा लेकर बेचते हैं। इससे उसकी बेहतर कमाई हो जाती है। गौरा के पिता स्व. सूर्य लाल भी धागा बनाकर बेचते थे। पिता की मौत के बाद गौरा ने भी जीविकोपार्जन के बतौर इसे बनाने का काम संभाल लिया। वह सौहार्द के इस धागे के साथ ही बच्चों के गले व कमर में पहनाई जाने वाली माला व करधना भी बनाती हैंं। गौरा का कहना है कि वह भले ही अपने पैरों से चलने फिरने में समर्थ नहीं है लेकिन उनके हाथों से बने धागे दूर-दराज से आने वाले लोग पहनते और पसंद करते हैं। यह उसके लिए गर्व की बात है।
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सतनामी संप्रदाय के आदि प्रवर्तक समर्थ स्वामी जगजीवन साहेब के अनुयायी एकता का सौहार्द का प्रतीक धागा अपने हाथ में बांधते हैं। कोटवाधाम तीर्थ आने वाले तीर्थयात्री इस धागे को खूब खरीदते हैं। पैर से दिव्यांग होने के कारण चलने-फिरने में असमर्थ गौरा एकता के सूत्र में पिरोए जाने वाले आस्था के इस धागे को बनाने में काफी माहिर है। वह बैठे-बैठे व धागा बनाने के साथ ही अपनी दुकान पर उसे बेचती भी हैं।
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फेरी लगाकर बेचने वाले युवा भी उसी से यह धागा लेकर बेचते हैं। इससे उसकी बेहतर कमाई हो जाती है। गौरा के पिता स्व. सूर्य लाल भी धागा बनाकर बेचते थे। पिता की मौत के बाद गौरा ने भी जीविकोपार्जन के बतौर इसे बनाने का काम संभाल लिया। वह सौहार्द के इस धागे के साथ ही बच्चों के गले व कमर में पहनाई जाने वाली माला व करधना भी बनाती हैंं। गौरा का कहना है कि वह भले ही अपने पैरों से चलने फिरने में समर्थ नहीं है लेकिन उनके हाथों से बने धागे दूर-दराज से आने वाले लोग पहनते और पसंद करते हैं। यह उसके लिए गर्व की बात है।
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