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वन माफिया के आगे प्रशासन बेबस

Tue, 24 May 2016 12:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी Updated Tue, 24 May 2016 12:11 AM IST
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Administration unassisted forest mafia
बाराबंकी। हैदरगढ़ मार्ग स्थित पंचमदास कुटी मंदिर परिसर में कटवाए गए हरे पेड़। - फोटो : अमर उजाला
 जिले में करीब 5525 हेक्टेअर में जंगल हैं। अधिकारियों का दावा है कि  जिले में पिछले दो सालों में पेड़ों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है लेकिन हकीकत इससे जुदा है। जिले में आए दिन पेड़ों की कटान हो रही है। वन माफिया और विभागीय मिलीभगत से पेड़ों की कटान पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। ग्रामीणों की शिकायत के बाद भी पुलिस कार्रवाई करने के प्रति संजीदा नहीं है।
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जिले में वनमाफिया हावी हैं और आए दिन हरियाली पर आरा चल रहा है। वन विभाग के नियम भी इस कदर हैं कि जरूरतमंद भी अपने पेड़ कटवाने के लिए परमिट के लिए कई दिनों तक दौड़ता रह जाता है लेकिन विभागीय पेंच के चलते उसे अनुमति नहीं मिलती और व ठेकेदार द्वारा पेड़ कटवा लेने में ही अपनी भलाई समझता है।
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ठेकेदारों का भी अपना फंडा है जैसे-तैसे परमिट लेकर अधिक पेड़ काट कर धन का वारा न्यारा कर लेते हैं। नियम के अनुसार परमिट मिलने पर पेड़ काटने पर उसे एक पेड़ के लिए 200 रुपये की एनएससी देनी पड़ती है।
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एक पेड़ काटने के एवज में उसे दो पेड़ लगाकर उसकी परवरिश करनी होती है। छह साल बाद वन कर्मियों द्वारा भौतिक सत्यापन करने के बाद उसे पैसे वापस मिल जाते हैं। लेकिन वन माफिया पेड़ काटने के समय एनएससी जमा कर देते हैं फिर उसे लेने कभी नहीं आते।


वन माफियाओं के लिए यह सस्ता सौदा होता है। वनविभाग के अनुसार बीते पांच सालों में शायद ही कोई एनएससी का रुपया वापस लेने आया हो। शहर ने जब आकार लिया तो क्रंक्रीट के जंगल में बागों की हरियाली खो गई। जनपद के कई नामचीन बागों का वजूद खो गया है। हजाराबाग, दशहराबाग व लखपेड़ाबाग तो अब सिर्फ नाम तक ही सीमित हो गए हैं।

 
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