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मूहुर्त में पूजन, घरों के द्वार में नाग की आकृति
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बांदा। सावन माह के तीसरे शनिवार को नागपंचमी परंपरा के साथ मनाई गई। नाग पंचमी पूजा का मुहूर्त सुबह 2 घंटे 43 मिनट रहा। भगवान शिव के गले का हार कहे जाने वाले नागों की घरों में पूजा की गई।
शहर के बांबेश्वर मंदिर सहित महेश्वरी देवी, सिंह वाहिनी, महामाई, संकट मोचन, बनका बिहारी, जमुनादास महावीरन आदि मंदिरों में पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने घर के द्वार पर गोबर से नाग देवता की आकृति बनाई। नागों की बांबियों में पूजन कर दीप जलाया और दूध रखा।
उधर, बबेरू में मढ़ीदाई मंदिर में पूजा-अर्चना हुई। सावन के गीत गूंजे। तिंदवारी समेत बेंदा, चिल्ला, पैलानी, पपरेंदा, गोखरही, पचनेही, पिपरगवां, गोधनी, मुंगुस आदि गांवों में भी नाग पंचमी मनाई गई। खप्टिहा कलां में परंपरा के मुताबिक किशोरियों और महिलाओं के जत्थे कजलियों के लिए खेतों से मिट्टी लेने पहुंचे।
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शहर के बांबेश्वर मंदिर सहित महेश्वरी देवी, सिंह वाहिनी, महामाई, संकट मोचन, बनका बिहारी, जमुनादास महावीरन आदि मंदिरों में पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने घर के द्वार पर गोबर से नाग देवता की आकृति बनाई। नागों की बांबियों में पूजन कर दीप जलाया और दूध रखा।
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उधर, बबेरू में मढ़ीदाई मंदिर में पूजा-अर्चना हुई। सावन के गीत गूंजे। तिंदवारी समेत बेंदा, चिल्ला, पैलानी, पपरेंदा, गोखरही, पचनेही, पिपरगवां, गोधनी, मुंगुस आदि गांवों में भी नाग पंचमी मनाई गई। खप्टिहा कलां में परंपरा के मुताबिक किशोरियों और महिलाओं के जत्थे कजलियों के लिए खेतों से मिट्टी लेने पहुंचे।
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