फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Banda News ›   Why was diamond mine allowed in Bakswaha forest?

बकस्वाहा जंगल में क्यों दी गई हीरा खदान की अनुमति

Thu, 25 Nov 2021 12:03 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 25 Nov 2021 12:03 AM IST
विज्ञापन
Why was diamond mine allowed in Bakswaha forest?
Why was diamond mine allowed in Bakswaha forest? - फोटो : BANDA
बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल को हीरा खदान के लिए दिए जाने पर सुनवाई कर रही नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा कि जंगल में हीरा खदान की अनुमति क्यों दी गई है? एनजीटी ने इसका जवाब 15 दिनों के अंदर पेश करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी 2022 निर्धारित की है।
विज्ञापन

बकस्वाहा (छतरपुर) जंगल को केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार ने हीरा खनन के लिए बिड़ला ग्रुप की एस्सल माइनिंग इंडस्ट्रीज लिमिटेड को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। जंगल की लगभग 382.13 हेक्टेयर भूमि में लगभग 2.15 लाख से भी ज्यादा हरे पेड़ कटने का अंदेशा है। इतने बड़े पैमाने पर हरियाली कटने के मंडराते खतरे पर पर्यावरण पैरोकार/संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं।
विज्ञापन

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी इसकी याचिका विचाराधीन है। दिल्ली के पर्यावरण पैरोकार डॉ. पीजी नाजपांडे और रजत भार्गव ने एनजीटी में याचिका दायर करके सरकार द्वारा बकस्वाहा जंगल में हीरा खदान की अनुमति देने को चुनौती दी है। एनजीटी कई माह से इस पर सुनवाई कर रही है। इसी वर्ष पहली जुलाई को एनजीटी ने आदेश जारी कर वन विभाग की एनओसी न मिलने तक बकस्वाहा जंगल के पेड़ों की कटान पर रोक लगा दी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

सोमवार (22 नवंबर) को सुनवाई के दौरान एनजीटी के न्यायाधीश शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और डॉ. अरुण कुमार वर्मा (विशेषज्ञ सदस्य) ने सुनवाई के बाद अपने दो पृष्ठीय आदेश में कहा है कि सरकार 15 दिन के अंदर अपना जवाब पेश करे।
साथ ही याचिका दायर करने वालों को निर्देश दिया है कि याचिका की प्रति तथा संबंधित दस्तावेज सरकार को उपलब्ध कराएं। पूर्व में राज्य सरकार ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए मोहलत मांगी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी अधिवक्ता प्रभात यादव ने की। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता कुछ और दस्तावेज प्रस्तुत करना चाहते हैं। एनजीटी ने यह दस्तावेज सरकार को देने के निर्देश दिए हैं।
जंगल ही नहीं, जीवन का बसेरा भी है
बुंदेलखंड का बकस्वाहा जंगल सिर्फ जंगल ही नहीं, बल्कि यहां जीवन का बसेरा भी है। अनेकों गांवों में आबाद आदिवासी और जंगल में जीव जंतुओं का डेरा है। जंगल के नीचे हीरे का भंडार है। पर्यावरण के पैरोकार कहते हैं कि जमीन के नीचे दबे हीरे की चाहत में धरती के ऊपर हीरा रूपी जंगल को खत्म करने की कवायद चल रही है। पैरोकारों का कहना है कि कोरोना काल में यह साबित हो गया कि तिजोरियों में बंद सोना-चांदी और हीरा बेचकर लोगों ने प्राणदायी आक्सीजन हासिल करने की कोशिश की। अक्सर स्थानों पर तो इसके बाद भी आक्सीजन नहीं मिली। आक्सीजन का वास्तविक उत्पादन केंद्र जंगल ही है।

दुर्लभ शैल चित्र भी बचाने की कवायद
बकस्वाहा जंगल में पेड़ों के अलावा बड़ी संख्या में दुर्लभ शैल चित्र भी हैं। ये 25 से 30 हजार पुराने बताए गए हैं। शैल चित्रों को हीरा खनन से बचाने के लिए एनजीटी और हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हो चुकी हैं। इनके संरक्षण के लिए भी न्यायालय दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम शैल चित्रों का सर्वे करके अपनी रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को दी चुकी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed