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मंडल में घट रहा सारस का कुनबा

Sat, 01 May 2021 11:43 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 01 May 2021 11:43 PM IST
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बांदा। चित्रकूटधाम मंडल में प्रदेश के राजकीय पक्षी सारस का कुनबा घटता जा रहा है। संरक्षण की ठोस व्यवस्था न होने से दो सालों में लगभग आधा सैकड़ा सारस कम हो गए। लगातार घट रही संख्या पर वन विभाग ने इनके संरक्षण की कवायदें तेज कर दीं। शासन के निर्देश पर अगले माह जून में सारस पक्षी की गणना होनी है। पिछले वर्ष गणना में मंडल के तीन जिलों में 356 सारस पाए गए।
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महोबा में इनकी संख्या शून्य है। सबसे ज्यादा सारस बांदा जनपद में हैं। प्रदेश में सारस को राज्य पक्षी का दर्जा मिला है। राजकीय पक्षी होने के साथ सारस का महत्वपूर्ण स्थान है। सारस को क्षेत्र की स्वस्थ परिस्थिति का संकेतक भी माना जाता है। यहां का पर्यावरण अनुकूल होने पर सारस के कुनबे में तेजी से वृद्धि हुई थी, लेकिन अब इनकी संख्या में गिरावट हो रही है। संरक्षण की कोई ठोस पहल न होने पर आने वाले वर्षों में सारस लुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएंगे। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वर्ष अगस्त और दिसंबर में जीपीएस प्रणाली से हुई गणना में मंडल में 356 सारस पाए गए। इनमें सबसे ज्यादा बांदा में 290 सारस मिले। हमीरपुर में 50 और चित्रकूट में 16 सारस दर्ज है।
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महोबा जनपद से सारस पक्षी लुप्त हो गया। पिछले वर्ष दिसंबर में हुई गणना में इनकी संख्या शून्य बताई गई है। हालांकि, बांदा जनपद में सारसों की संख्या को वन विभाग संतोषजनक स्थिति मान रहा है, लेकिन अन्य जनपदों में इनकी कम संख्या मिलने पर चिंतित है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य जीव) ने पत्र जारी कर अगले माह जून में सारस गणना के निर्देश दिए हैं। उप प्रभागीय वनाधिकारी एमपी गौतम ने बताया कि वन विभाग ने सारस गणना की तैयारी पूरी कर ली है। टीमें गठित कर दी गई हैं। सारस का कुनबा बढ़ाने के लिए उनके संरक्षण को लेकर प्रयास लगातार जारी हैं।
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इंसेट---
मंडल में वर्षवार सारस का ब्योरा---
वर्ष सारस की संख्या
2016 362
2017 381
2018 421
2019 395
2020 356
इंसेट---
नर और मादा दोना साथ पाए जाते हैं
बांदा। सारस का जंतु वैज्ञानिक नाम ग्रस एंटिगोन है। यह सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी है। देश में सबसे ज्यादा इसकी संख्या उत्तर प्रदेश में है। प्रदेश में इसे राजकीय पक्षी का दर्जा हासिल है। सारस दलदल, नदी, तालाब, जलाशय, नहर, मैदान और खेतों में निवास करते हैं। सारस की गूंज दूर तक सुनी जा सकती है। दलदल के जलीय पौधों के ढेर से घोंसला बनाते हैं। (संवाद)
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रामायण की प्रथम कविता में सारस को श्रेय
बांदा। सारस का सांस्कृतिक महत्व भी है। रामायण की प्रथम कविता का श्रेय सारस को है। इसकी शुरुआत प्रणयरत सारस युगल के वर्णन से हुई है। महर्षि वाल्मीकि इसके दृष्टा हैं। किवदंती है कि शिकारी ने प्रणयरत सारस युगल को मार दिया। जोड़े के दूसरे सारस ने जीवन साथी की मौत के वियोग में वहीं प्राण त्याग दिए। इस पर महर्षि ने शिकारी का श्राप दे दिया था। सारस हमेशा जोड़ों में ही नजर आता है। (संवाद)

इंसेट---
खनन, कब्जों से घट रही सारस की संख्या
बांदा। पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार सारस की कम हो रही संख्या की सबसे बड़ी वजह तालाबों में कब्जे और नदियों में खनन है। आरटीआई एक्टिविस्ट व समाजसेवी आशीष सागर ने बताया कि नदियों किनारे सारस बड़ी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन दिन-रात मशीनों से बालू खनन करने पर इनका बसेरा नदियों से खत्म होता जा रहा है। साल-दर-साल खेत का दायरा सिमटने का भी सारस के निवास पर बुरा प्रभाव पड़ा है। (संवाद)
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