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एनजीटी से पेड़ों को मिली दो माह की ‘ऑक्सीजन’: बकस्वाहा जंगल के पेड़ों के कटान पर रोक बरकरार

Sun, 29 Aug 2021 10:46 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Sun, 29 Aug 2021 10:46 AM IST
सार

बुंदेलखंड के छतरपुर जनपद के बकस्वाहा जंगल को मध्य प्रदेश सरकार ने हीरा खनन के लिए बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग कंपनी को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। हीरा खनन होगा तो यहां के 2.15 लाख से ज्यादा पेड़-पौधे काटे जाएंगे।

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Trees got oxygen for two months from NGT: Ban on felling of trees of Bakswaha forest continues
बकस्वाहा जंगल - फोटो : amar ujala

विस्तार

बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल के करीब सवा लाख पेड़ों पर बिड़ला ग्रुप की कंपनी के कुल्हाड़े चलने की उम्मीदों पर एक बार फिर से पानी फिर गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई के लिए दो माह का समय और बढ़ा दिया है। तब तक पेड़ों की कटान पर रोक संबंधी एनजीटी का आदेश प्रभावी रहेगा। 
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बुंदेलखंड के छतरपुर जनपद के बकस्वाहा जंगल को मध्य प्रदेश सरकार ने हीरा खनन के लिए बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग कंपनी को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। हीरा खनन होगा तो यहां के 2.15 लाख से ज्यादा पेड़-पौधे काटे जाएंगे। इसका चौतरफा काफी तीखा विरोध भी किया जा रहा है। इस मुद्दे पर दिल्ली निवासी पर्यावरण के पैरोकार, अधिवक्ता और नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे एवं एलएलबी के छात्र उज्ज्वल शर्मा ने एनजीटी में रिट दायर की थी।
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इस पर सुनवाई के बाद 30 जून को एनजीटी की डबल बेंच ने अंतरिम आदेश जारी किया था। ट्रिब्यूनल के न्यायाधीश जस्टिस श्यौ कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और अरुण कुमार वर्मा (विशेषज्ञ सदस्य) द्वारा पारित किए गए अंतरिम आदेश में कहा था कि वन संरक्षण कानून 1927 व 1980 का पालन किया जाए। कहा कि टीएन गोधावर्मन कमेटी की गाइड लाइन का अनुसरण हो।
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भारतीय वन अधिनियम के नियमों के तहत वन विभाग से क्लीयरेंस (एनओसी) मिले बगैर बकस्वाहा जंगल में कोई पेड़ की कटान नहीं होनी चाहिए। यह भी आदेश दिया था कि सरकार इसका भी अध्ययन करे कि इस परियोजना से कितने लोगों को समस्या है और कितने लोगों को फायदा। एनजीटी ने यह आदेश पारित करने के साथ अगली सुनवाई के लिए 27 अगस्त निर्धारित की थी।

शुक्रवार (27 अगस्त) को निर्धारित तिथि पर एनजीटी ने मध्य प्रदेश सरकार और बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग कंपनी ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया। मध्यप्रदेश सरकार और कंपनी ने दो माह की मोहलत मांगी। एनजीटी बेंच ने उनकी इस अर्जी को स्वीकार कर लिया। अगली सुनवाई के लिए 27 अक्तूबर निर्धारित की है। तब तक एनजीटी द्वारा लगाई गई पेड़ कटान रोक भी प्रभावी रहेगी। 

पेड़ों के साथ पक्षी भी उजड़ेंगे 
बकस्वाहा के जंगल में लाखों पेड़ के साथ ही हजारों वर्ष पुराने शैल चित्र/राक पेंटिंग भी हैं। जंगल में 382.131 हेक्टेयर वन क्षेत्र में हीरा खनन की योजना है। पर्यावरण पैरोकारों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में हरे पेड़ काटे जाने से न सिर्फ बकस्वाहा का ही नहीं, बल्कि बुंदेलखंड का पर्यावरण गड़बड़ा जाएगा। जंगल के पेड़ों में हजारों की संख्या में पक्षियों के बसेरे हैं। वह भी वीरान हो जाएंगे। पानी का भी संकट खड़ा हो जाएगा, क्योंकि हीरा परियोजना में हर साल लगभग 5.3 मिलियन क्यूबिक पानी खर्च होगा। 

 

हाईकोर्ट में भी विचाराधीन है याचिका 
बकस्वाहा जंगल की दुर्लभ रॉक पेंटिंग/शैल चित्र को भी बचाने की जोरदार कोशिशें चल रहीं हैं। डॉ. पीजी नाजपांडे ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इस पर सुनवाई के बाद पिछले माह 16 जुलाई को हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने पुरातत्व विभाग को निर्देश दिए थे कि वह स्टेटस रिपोर्ट पेश करें और सच्चाई सामने लाएं। हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों और पुरातत्व विभाग से चार हफ्ते में अपना जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं। यह मामला भी अभी विचाराधीन है। 

हीरा फैक्टरी नहीं, ऑक्सीजन चाहिए 
बकस्वाहा जंगल बचाने की पैरवी में लगे संगठनों में शामिल पीपल, नीम, तुलसी अभियान ने कहा कि किसी भी दशा में जंगल नहीं कटने दिया जाएगा। अभियान में कोरोना के दूसरे संक्रमणकाल में ऑक्सीजन की मची हाय तौबा की याद दिलाते हुए कहा कि पेड़ ही ऑक्सीजन हैं। यहां हीरा फैक्टरी की कतई जरूरत नहीं है, बल्कि ऑक्सीजन की जरूरत है। इस बाबत अभियान के संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि बकस्वाहा जंगल की मिट्टी से बिहार के हरेक जिले में पर्यावरण योद्धाओं का तिलक अभियान चलाया जा रहा है।

राष्ट्रीय पर्यावरण संसद नौ सितंबर को 
बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन/पर्यावरण बचाओ अभियान/पाषाणकालीन सभ्यता बचाओ अभियान ने कहा कि बकस्वाहा जंगल बचाने और यहां के शैलचित्रों को विश्व धरोहर घोषित कराने और केन-बेतवा लिंक मुद्दों पर रणनीति के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण संसद का आयोजन किया जाएगा। यह नौ सितंबर को भोपाल में होगी। इसमें नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर सहित बकस्वाहा और केन-बेतवा लिंक के लिए संघर्ष कर रहे पर्यावरण पैरोकार शामिल होंगे। कहा कि जंगल से हजारों परिवार और जैव विविधता निर्भर है। जंगल उजाड़कर कोई भी विकास फलदायी नहीं होगा।
 
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