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कमिश्नर के गांव में गड्ढों के पानी से बुझा रहे प्यास
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
Updated Fri, 30 Mar 2018 10:46 PM IST
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नीबी गांव में गड्ढा खोदकर प्रदूषित पानी का जुगाड़ करते ग्रामीण।
- फोटो : अमर उजाला
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गोद लेने वाले अफसरों के मुंह मोड़ने का खामियाजा गांव के गरीब पानी के संकट के रूप में भुगत रहे हैं। देश और प्रदेश में दलितों को रिझाने और उन्हें अपना हमदर्द बताने की सरकारों में मची होड़ के बीच दलित बस्ती में पीने के पानी के लाले हैं। सूख चुकी नदी में गड्ढे खोदकर निकाले जा रहे प्रदूषित पानी से प्यास बुझाई जा रही है। नरैनी तहसील के नीबी गांव के यही हालात हैं। इस गांव को कमिश्नर ने गोद ले रखा है।
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लगभग 2000 आबादी वाले नीबी गांव में हैंडपंप ही पानी का जरिया है। गांव में चार हैंडपंप समुदाय अंशदान योजना के तहत लगाए गए हैं। इन पर उन्हीं लोगों का कब्जा है, जिन्होंने अंशदान दिया है। यहां कोई और पानी नहीं पा पाता। सबसे खराब हालत गांव की दलित बस्ती की है। दलित बस्ती में एक भी हैंडपंप नहीं हैं।
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इस बस्ती के लोगों को प्यास बुझाने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। गांव के कुएं और तालाब सूख चुके हैं। गांव किनारे से गुजरी बड़हार नदी पूरी तरह सूखी पड़ी है। बालू माफिया द्वारा जल धारा से बालू निकाल लिए जाने के कारण नदी का पानी इस गांव तक नहीं पहुंच पा रहा। मरता क्या न करता की तर्ज पर गांव के दलितों ने सूखी नदी में फावड़े चलाकर गड्ढा खोद लिया है। इसमें कुछ पानी जमा हो जाता है। हालांकि यह पानी गंदा है, लेकिन किसी तरह पानी को छानकर दलित बस्ती के बाशिंदे प्यास बुझा रहे हैं।
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विद्याधाम समिति के सचिव राजाभइया का कहना है कि नीबी गांव जैसे हालात नरैनी ब्लाक के करतल, कालिंजर और फतेहगंज आदि गांवों में भी है। यहां बड़ी तादाद में हैंडपंप खराब पड़े हुए हैं। अब गर्मी में गांव की जिंदगी बेहद दूभर हो जाएगी। बताते हैं कि हैंडपंपों का रखरखाव ग्राम पंचायतों को सौंप दिया गया है। ग्राम पंचायतें यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि पैसा ही नहीं है। उधर, इस बाबत नरैनी खंड विकास अधिकारी लालव्रत यादव का कहना है कि एक हैंडपंप खराब होने की सूचना मिली थी, उसे ठीक करा दिया गया है। उन्होंने कहा कि गांव में पेयजल संकट की जानकारी नहीं है। जल्द ही पता कराकर कुछ व्यवस्था कराई जाएगी।
दस दिन से नहीं किया स्नान
नीबी गांव की दलित बस्ती के लोगों को नहा न पाने का भी मलाल है। सेहत के लिए रोजाना नहाना जरूरी है, पर यहां पखवारे भर में भी नहाने का जुगाड़ नहीं हो पाता। पीने का पानी ही मिल जाना ही बड़ी बात है। सुंदरकली बताती है कि सबसे बड़ी चिंता पानी की है। उसने 10 दिन से नहीं नहाया है और न ही बच्चों को स्नान करा पाई।
मुश्किल से मिलता है पीने का पानी
गांव की फुलमतिया देवी बताती है कि इन दिनों फसल कटाई चल रही है। पूरा परिवार तड़के से शाम तक इसमें जुटता है। खेत से निकलने के बाद धूल से सराबोर शरीर को स्नान की सख्त दरकार होती है। लेकिन बिन पानी मन मसोस कर रह जाते हैं। प्यास बुझाने के लिए बमुश्किल इधर-उधर भटक कर दूसरे के हैंडपंपों से पानी लाना पड़ता है।
प्यास से भैंस ने तोड़ दिया दम
गांव की भूरी देवी बताती हैं कि ग्रामीणों के साथ पशुओं को भी पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है। बताया कि उसके पास लगभग 50 हजार रुपये कीमत की भैंस थी। वह उसके लिए पानी का जुगाड़ नहीं कर पाई। अगले दिन उसे खूंटे से जैसे ही छोड़ा वह चोहड़ की तरफ भागी। प्यास के कारण वह रास्ते में ही गिर गई। उसकी वहीं मौत हो गई।
आज ही गांव भेजेंगे अफसर
गोद लिए गांव में पेयजल संकट की बाबत मंडलायुक्त रामविशाल मिश्रा ने कहा कि उनकी जानकारी में यह स्थिति नहीं लाई गई। वे आज ही जल निगम के अधीक्षण अभियंता को बुलाकर नीबी गांव भेजेंगे और पेयजल संकट समस्या का निदान कराएंगे। उन्होंने कहा कि पेयजल संकट कहीं भी नहीं होना चाहिए। इसमें लापरवाही पाई गई तो दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।