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Banda News: बेटी की लाचारी देख पिता ने नहीं दी ऑपरेशन की अनुमति
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बांदा। दरिंदगी की शिकार बहादुर बेटी के इलाज के मामले में कई स्तरों पर लापरवाही हुई। पहले तो उसे भर्ती कराने में ही काफी समय ले लिया गया, जिससे उसका काफी खून बह गया।
बाद में उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि डाॅक्टरों ने जब ऑपरेशन के लिए कहा तो पिता इंकार कर दिया। सवाल यह कि बहादुर बिटिया दरिंदे से लड़कर तो खुद को जिंदा रखने में कामयाब रही लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद उसे बचाया नहीं जा सका। न ही वहां उसका कोई ऑपरेशन किया गया। डाॅक्टर भी बिटिया के पिता को यह विश्वास नहीं दिला सके कि ऑपरेशन के बाद उसे बचाना संभव होगा। आखिरकार भर्ती के आठवें दिन बुधवार को सुबह चार बजे उसने दम तोड़ दिया।
चिल्ला थाना क्षेत्र के एक गांव में तीन जून की दोपहर तीन बजे से मासूम लापता हो गई थी। माता-पिता ने शाम पांच बजे से तलाश शुरू की।
जब वह नहीं मिली और गांव के ही आरोपी सुनील निषाद के कपड़ों में खून और गंदगी देखकर लोगों को शक हुआ तो उन्होंने रात नौ बजे चिल्ला थाने में सूचना दी। सूचना के बाद पुलिस सक्रिय हुई थी और मासूम को मरणासन्न हालत में रात दो बजे चिल्ला के पदारथपुर के जंगल से झाड़ियों के नीचे से बरामद कर ट्राॅमा सेंटर में भर्ती कराया था।
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आरोपी सुनील को पुलिस ने मुठभेड़ में गिरफ्तार किया था। वारदात के समय आरोपी नशे में था। अगले दिन चार जून को डॉक्टरों ने बच्ची को गंभीर हालत में रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। वहां से उसी दिन कानपुर के हैलट अस्पताल के लिए रेफर की गई थी।
पुलिस अधीक्षक पलाश बंसल ने कानपुर के जिलाधिकारी से बात कर बच्ची के इलाज की व्यवस्था कराई थी। कानपुर हैलट में मासूम का पीडियाट्रिक आईसीयू में आठ दिन तक इलाज चला। आखिरकार बुधवार को सुबह चार बजे उसने अपनी अंतिम सांस ली। बाल रोग, पीडियाट्रिक सर्जरी, स्त्री रोग, न्यूरो सर्जरी विभाग की टीमों के विशेषज्ञों की टीम ने इलाज किया था।
पिता के मुताबिक, कानपुर हैलट में डॉक्टरों ने छह जून को बच्ची के ऑपरेशन के लिए कहा था। डॉक्टरों ने कहा था कि दो सर्जरी होगी।
चूंकि बच्ची के मल और मूत्र मार्ग पूरी तरह से क्षतिग्रस्त होकर एक हो गया था तो सर्जरी से मल निकासी के लिए अलग नली डालनी थी, लेकिन पिता ने बेटी की लाचारी को
देखते हुए उन्हें मना कर दिया था। सिस्टम में अनुमति न मिलने से आखिरकार मासूम की सर्जरी नहीं हो सकी थी।
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बाद में उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि डाॅक्टरों ने जब ऑपरेशन के लिए कहा तो पिता इंकार कर दिया। सवाल यह कि बहादुर बिटिया दरिंदे से लड़कर तो खुद को जिंदा रखने में कामयाब रही लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद उसे बचाया नहीं जा सका। न ही वहां उसका कोई ऑपरेशन किया गया। डाॅक्टर भी बिटिया के पिता को यह विश्वास नहीं दिला सके कि ऑपरेशन के बाद उसे बचाना संभव होगा। आखिरकार भर्ती के आठवें दिन बुधवार को सुबह चार बजे उसने दम तोड़ दिया।
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चिल्ला थाना क्षेत्र के एक गांव में तीन जून की दोपहर तीन बजे से मासूम लापता हो गई थी। माता-पिता ने शाम पांच बजे से तलाश शुरू की।
जब वह नहीं मिली और गांव के ही आरोपी सुनील निषाद के कपड़ों में खून और गंदगी देखकर लोगों को शक हुआ तो उन्होंने रात नौ बजे चिल्ला थाने में सूचना दी। सूचना के बाद पुलिस सक्रिय हुई थी और मासूम को मरणासन्न हालत में रात दो बजे चिल्ला के पदारथपुर के जंगल से झाड़ियों के नीचे से बरामद कर ट्राॅमा सेंटर में भर्ती कराया था।
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आरोपी सुनील को पुलिस ने मुठभेड़ में गिरफ्तार किया था। वारदात के समय आरोपी नशे में था। अगले दिन चार जून को डॉक्टरों ने बच्ची को गंभीर हालत में रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। वहां से उसी दिन कानपुर के हैलट अस्पताल के लिए रेफर की गई थी।
पुलिस अधीक्षक पलाश बंसल ने कानपुर के जिलाधिकारी से बात कर बच्ची के इलाज की व्यवस्था कराई थी। कानपुर हैलट में मासूम का पीडियाट्रिक आईसीयू में आठ दिन तक इलाज चला। आखिरकार बुधवार को सुबह चार बजे उसने अपनी अंतिम सांस ली। बाल रोग, पीडियाट्रिक सर्जरी, स्त्री रोग, न्यूरो सर्जरी विभाग की टीमों के विशेषज्ञों की टीम ने इलाज किया था।
पिता के मुताबिक, कानपुर हैलट में डॉक्टरों ने छह जून को बच्ची के ऑपरेशन के लिए कहा था। डॉक्टरों ने कहा था कि दो सर्जरी होगी।
चूंकि बच्ची के मल और मूत्र मार्ग पूरी तरह से क्षतिग्रस्त होकर एक हो गया था तो सर्जरी से मल निकासी के लिए अलग नली डालनी थी, लेकिन पिता ने बेटी की लाचारी को
देखते हुए उन्हें मना कर दिया था। सिस्टम में अनुमति न मिलने से आखिरकार मासूम की सर्जरी नहीं हो सकी थी।