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परदेस नहीं जाएंगे, गांव में ही काम कर लेंगे
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संजय कुमार।
- फोटो : BANDA
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बांदा। जिले में प्रवासी श्रमिकों के आने का सिलसिला जारी है। हर श्रमिक का अपना-अपना दर्द है। काम-धंधा बंद हो जाने से इन प्रवासी श्रमिकों के सामने तमाम तरह की दुश्वारियां पैदा हो गई हैं।
हालत यह है कि घर वापसी के सिवाय इनके पास और कोई चारा नहीं था। हालांकि कुछ श्रमिकों का कहना है कि अब फैक्ट्री/कंपनी मालिकों के काम पर लौट आने के फोन आ रहे हैं। फिलहाल अभी वह नहीं जाएंगे। गांव में ही काम-धंधा तलाशेंगे। कोई भी काम कर लेंगे पर परदेस नहीं जाएंगे। ब़ वापस नहीं जाऊंगा अहमदाबाद
बड़ोखर गांव का इंटर पास संजय अहमदाबाद में टाइल्स का काम करता था। कोरोना फैलने के बाद कंपनी बंद हुई तो रोजी छिन गई और रोटी के लाले पड़ गए।
जिला अस्पताल में स्क्रीनिंग के दौरान उसने बताया कि लॉकडाउन में हुई समस्या का दर्द बयां नहीं कर सकता। कहा कि अब वह महानगर नहीं जाएगा। गांव में ही रहकर काम-धंधा करेगा। चाहे फावड़ा ही क्यों न चलाना पड़े। परिवार के साथ ही रहेगा।
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गांव में ही करूंगा सिलाई
बबेरू निवासी दिलीप मुंबई में सिलाई करता था। 16 दिन की लंबी यात्रा के बाद शनिवार को मुंबई से बांदा पहुंचा। उसने बताया कि अब तो परदेस के नाम पर कान पकड़ता हूं।
बताया कि वहां जो कमाया था लॉकडाउन में घर हो गया। घरवालों ने चार हजार रुपये भेजे तब जाकर वहां से आ पाया हूं। अब गांव में ही सिलाई करके परिवार का हाथ बंटाऊंगा। सिलाई मशीन खरीदने के लिए किसी से उधार ले लूंगा।
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हालत यह है कि घर वापसी के सिवाय इनके पास और कोई चारा नहीं था। हालांकि कुछ श्रमिकों का कहना है कि अब फैक्ट्री/कंपनी मालिकों के काम पर लौट आने के फोन आ रहे हैं। फिलहाल अभी वह नहीं जाएंगे। गांव में ही काम-धंधा तलाशेंगे। कोई भी काम कर लेंगे पर परदेस नहीं जाएंगे। ब़ वापस नहीं जाऊंगा अहमदाबाद
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बड़ोखर गांव का इंटर पास संजय अहमदाबाद में टाइल्स का काम करता था। कोरोना फैलने के बाद कंपनी बंद हुई तो रोजी छिन गई और रोटी के लाले पड़ गए।
जिला अस्पताल में स्क्रीनिंग के दौरान उसने बताया कि लॉकडाउन में हुई समस्या का दर्द बयां नहीं कर सकता। कहा कि अब वह महानगर नहीं जाएगा। गांव में ही रहकर काम-धंधा करेगा। चाहे फावड़ा ही क्यों न चलाना पड़े। परिवार के साथ ही रहेगा।
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गांव में ही करूंगा सिलाई
बबेरू निवासी दिलीप मुंबई में सिलाई करता था। 16 दिन की लंबी यात्रा के बाद शनिवार को मुंबई से बांदा पहुंचा। उसने बताया कि अब तो परदेस के नाम पर कान पकड़ता हूं।
बताया कि वहां जो कमाया था लॉकडाउन में घर हो गया। घरवालों ने चार हजार रुपये भेजे तब जाकर वहां से आ पाया हूं। अब गांव में ही सिलाई करके परिवार का हाथ बंटाऊंगा। सिलाई मशीन खरीदने के लिए किसी से उधार ले लूंगा।

दिलीप।- फोटो : BANDA