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किसानों को मालामाल करेगी पंगेशियस

Sat, 10 Nov 2018 10:24 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा Updated Sat, 10 Nov 2018 10:24 PM IST
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Pangesius will do the farming for farmers
पंगेशियस मछली। - फोटो : अमर उजाला

रोहू, कतला और नैन आदि प्रजातियों के बाद अब बुंदेलखंड के तालाबों में दक्षिण पूर्व एशिया की पंगेशियस मछली भी अपने जलवे बिखेरती नजर आएगी। मछली के शौकीनों का जायका बनने के साथ ही मछली पालन में रुचि रखने वालों के लिए भी यह मछली रोजगार का जरिया बनेगी। भारत सरकार की नीली क्रांति योजना के तहत मछली की यह प्रजाति बुंदेलखंड लाई जा रही है।

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इसके लिए बुंदेलखंड में आठ इंडोर तालाब भी बनाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि देसी और चाइनीज मछलियों की तुलना में इसका वजन डेढ़ गुना और उत्पादन दोगुना होगा। मौजूदा समय में बुंदेलखंड में छोटे-बड़े जलाशयों में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में मछली पालन हो रहा है। इनमें देसी प्रजाति की कतला, रोहू, नैन और चाइनीज प्रजाति में ग्रास, सिल्वर और कामन कार्प मछलियां शामिल हैं।
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इनका औसत वजन एक से डेढ़ किलो होता है। पैदावार पांच टन प्रति हेक्टेयर है। मत्स्य पालक किसानों की आय बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की नीली क्रांति योजना से अब बुंदेलखंड के तालाबों में पंगेशियस मछली पालन की योजना लागू की गई है। दूसरी मछलियों की तुलना में पंगेशियस मछली करीब तीन माह में तैयार हो जाती है। प्रजनन के बाद 7-8 माह में ही यह ढाई किलो वजन तक की हो जाती है, जबकि देसी और चाइनीज मछलियां 10 माह में तैयार हो पाती हैं। पंगेशियस एक कांटे (हड्डी) वाली मछली है।
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50 लाख से मऊरानीपुर में बन रहा इंडोर तालाब
बुंदेलखंड में पंगेशियस मछली पालन का कार्य मऊरानीपुर (झांसी) तहसील के घाटकोटरा गांव से शुरू होगा। इस गांव के मत्स्य पालक किसान एमडी खां के यहां इंडोर तालाब तैयार हो रहा है। इस तालाब की लागत 50 लाख रुपये है। केंद्र सरकार की नीली क्रांति योजना से मत्स्य पालक को 20 लाख रुपये का अनुदान मिलेगा। शेष 30 लाख रुपये मत्स्य पालक को लगाने हैं। इसमें 8 तालाबनुमा टैंक बनाए जा रहे हैं, जिन्हें फाइबर सीट से ढक दिया जाएगा।

देसी से 10 गुना ज्यादा लगेगा बीज
देसी और चाइनीज मछलियों की तुलना में पंगेशियस बीज लगभग 10 गुना ज्यादा लगेगा। अंगुलिका साइज का बीज एक हेक्टेयर में लगभग एक लाख लगेगा, जबकि देसी और चाइनीज मछलियों के बीज एक हेक्टेयर में करीब 10 हजार डाले जाते हैं। विभाग का कहना है कि पंगेशियस का बीज कोलकाता के हावड़ा बाजार से मंगाया जाएगा। झांसी में इसका प्रयोग किया जा चुका है। यह बेहतर साबित हुआ है।

मत्स्य पालन की सारी योजनाएं नीली क्रांति में
वर्ष 2016-17 में केंद्र सरकार द्वारा लागू गई नीली क्रांति योजना में मत्स्य पालन से संबंधित लगभग सभी कार्य जैसे तालाब निर्माण व सुधार, हेचरी, मछुआ आवास, मछुआ दुर्घटना बीमा योजना को शामिल कर दिया गया। मत्स्य पालन के लिए वित्तीय सहायता भी इसी योजना से दी जा रही है। इसमें केंद्र द्वारा 60 फीसदी केंद्र और 40 प्रतिशत राज्य सरकार का अनुदान शामिल है। बुंदेलखंड में मौजूदा समय नीली क्रांति योजना के तहत वर्ष 2017-18 के कार्य चल रहे हैं। 

शार्क प्रजाति की है पंगेशियस मछली
पंगेशियस मछली मूलत: दक्षिण-पूर्व एशिया की मछली है। यह शार्क प्रजाति में मानी जाती है। इसका मुख्य भोजन कना, चूनी, चोकर आदि के अलावा नदियों में पाए जाने वाले जीव-जंतु और घास आदि हैं। यह मुख्यत: भारत, बांग्लादेश, बर्मा आदि देशों में पाई जाती है।

इंडोर तालाबों में कम लगेगा पानी
पंगेशियस मछली पालन के लिए 50 लाख रुपये की लागत से बनाए जा रहे इंडोर तालाबों की डिजाइन ऐसी बनाई गई है कि इसमें पानी की खपत कम होगी। तालाब का पानी बाहर न जाकर एक-दूसरे तालाब से होकर एकत्रित रहेगा। इस प्रक्रिया में पानी की सफाई भी होगी। इसके लिए बायो फिल्टर लगाए जाएंगे। एक इंडोर में आठ टैंक बनेंगे। इनकी लंबाई और चौड़ाई 8-8 मीटर होगी। तालाबों को फाइबर सीट से कवर कर दिया जाएगा। उसके अंदर आक्सीजन के लिए एईरेटर की व्यवस्था रहेगी। पानी के लिए ट्यूबवेल लगाए जाएंगे।


बुंदेलखंड में जल्द ही पूर्वी एशिया की पंगेशियस मछली का पालन शुरू हो जाएगा। शुरुआत झांसी के मऊरानीपुर से हो रही है। इससे मत्स्य पालकों की आय बढ़ेगी। इसका पालन इंडोर तालाबों में होगा। तालाब बनाने के लिए केंद्र सरकार की नीली क्रांति योजना से मत्स्य पालकों को अनुदान भी दिया जाएगा।
-ज्ञानेंद्र सिंह, उप निदेशक (मत्स्य) झांसी/चित्रकूटधाम मंडल।

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