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नोटबंदी से धान उत्पादक किसान परेश्ााान
ब्यूरो, अमर उजाला, बांदा
Updated Thu, 24 Nov 2016 11:08 PM IST
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नोटबंदी से गल्ला मंडी में पसरा सन्नाटा।
- फोटो : अमर उजाला
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बांदा। सूखा झेलने के बाद अब धान उत्पादक किसान ‘नोटबंदी’ की मार से परेशान हैं। 50-100 नोटों की कमी और नई करेंसी बाजार में न आने से आढ़ती धान खरीदने से किनारा किए हैं। दूरदराज से आने वाले किसान उधार धान बेचकर या या फिर बैरंग लौट रहे हैं।
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बुंदेलखंड में धान का उत्पादन मुख्य रूप से बांदा और चित्रकूट जिले में होता है। यहां के चावल की खुशबू देश की राजधानी दिल्ली और मुंबई तक फैली है। सूखा की वजह से पिछले वर्ष धान का उत्पादन यहां 52 हजार मीट्रिक टन और चित्रकूट जिले में 13,200 मीट्रिक टन था।
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इस वर्ष अच्छी बारिश से उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बांदा में 69 हजार और चित्रकूट में 16,082 मीट्रिक टन धान उत्पादन हुआ, लेकिन नोटों की कमी से खुशी काफूर है। शहर की गल्ला मंडी में वीरानगी छाई है।
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आढ़तियों के पास किसानों का माल खरीदने को पैसा नहीं है और ग्राहक भी इस संकट के चलते बाजार से मुंह फेरे हैं। गल्ला व्यवसायियों का कहना है कि 500 व 1000 के नोट बंद होने के बाद अधिकांश व्यापारियों की जेबें खाली हैं।
सिर्फ 25 फीसदी व्यापार रह गया है। धान बेचने आने वाले किसानों का पूरा माल खरीदना मुमकिन नहीं है। अधिकांश उधार पर ही धान भरे बोरे दुकानों पर छोड़कर जा रहे हैं। नोटों से पैदा हुई मंदी में धान का भाव भी गिर गया। पिछले माह सोनम चावल का भाव 2800 रुपये क्विंटल था। नोटबंदी के बाद अब 1950 रुपये क्विंटल है।