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बकस्वाहा में फिर गूंजा हीरे नहीं, हरियाली चाहिए
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बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल को बचाने की मुहिम ने फिर तेजी पकड़ी है। क्रांति दिवस (9 अगस्त) की पूर्व संध्या पर रविवार को छतरपुर में दो किलोमीटर लंबा पर्यावरण शांति मार्च निकला और मानव श्रंखला बनाई गई। पर्यावरण पैरोकार, हमें हीरा नहीं, हरियाली चाहिए के नारे गुंजाते रहे। इस दौरान आंदोलनकारियों ने जंगल बचाने का सामूहिक संकल्प भी लिया।
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान के बैनर तले मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के गांधी आश्रम से शांति मार्च को आश्रम अध्यक्ष दुर्गा प्रसाद राय ने अपना संदेश देकर रवाना किया। यात्रा में शामिल महिला-पुरुषों के हाथों में हीरा नहीं, हरियाली चाहिए इत्यादि नारों की तख्तियां थीं। इन पर्यावरण प्रेमियों ने बस स्टैंड के पास मानव श्रंखला भी बनाई और कहा कि प्रकृति बचाना है तो जंगल बचाने होंगे।
बकस्वाहा के जंगल को बचाने के अभियान का नेतृत्व पीपल, नीम, तुलसी संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र कुमार कर रहे थे। वह 5 अगस्त से ही छतरपुर में जमे हुए हैं। उन्होंने बताया कि 9 अगस्त के कार्यक्रम की भी रूपरेखा तैयार कर ली गई है।
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बकस्वाहा जंगल को बचाने में बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन मिल रहा है। साथ ही जो लोग शांति मार्च और आंदोलनों में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, वह अपने गांव और बस्तियों में यही काम कर रहे हैं। बकस्वाहा जंगल बचाने की गूंज गांवों और कस्बों में भी काफी तेजी से गूंज रही है।
रविवार को कई कस्बों और गांवों में मानव श्रंखला, रैली, पौधरोपण इत्यादि आयोजन हुए। डॉ. धर्मेंद्र ने बताया कि हरेक आयोजन में कोविड गाइडलाइन का ध्यान रखा जा रहा है। बताया कि लोगों को भी इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है।
नाटक, लेखन और हस्ताक्षर अभियान
बकस्वाहा जंगल बचाओ मुहिम में नुक्कड़ नाटक, दीवारों में लेखन, हस्ताक्षर अभियान और राष्ट्रपति को संबोधित पत्र लेखन का कार्य भी चल रहा है। पर्यावरण पैरोकार यह गतिविधियां अपने क्षेत्रों और घरों से अंजाम दे रहे हैं।
आंदोलन में शामिल हुए ये पर्यावरण योद्धा
बकस्वाहा अभियान के आयोजनों में बिहार की समाजसेविका और दीदीजी फाउंडेशन की संस्थापक डॉ. नम्रता आनंद, अंकित कुमार, मातृ शक्ति संगठन यूथ विंग समर्पण युवा संगठन की सीमा चौहान, समाजसेवी पवन राजावत, छतरपुर बार काउंसिल अध्यक्ष राकेश दीक्षित, वृक्षमित्र सुनील दुबे, पर्यावरण प्रशिक्षक आनंद पटेल, भोपाल के डॉ. राजीव जैन, बकस्वाहा के समाजसेवी राजेश यादव, झांसी के राजेंद्र कुमार, सिहोर के ओम प्रकाश पंचाल, मध्यप्रदेश के पन्ना के डॉ. अभिषेक खरे, प्राकृतिक चिकित्सक दिनेश द्विवेदी, प्रो. डॉ. कुसुम कश्यप, भोपाल के पर्यावरणविद अश्विनी दुबे, पंजाब के अनुराग विश्नोई, मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ की श्रद्धा चौहान समेत नीलय पांडेय, देवेंद्र कुशवाहा, बाबी तिवारी, रामबाबू तिवारी आदि शामिल रहे।
पिकनिक स्पॉट बनाकर लें आमदनी
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान में शामिल होने छतरपुर पहुंचीं पर्यावरण योद्धा डॉ. नम्रता आनंद ने कहा कि हीरा खदान के लिए बकस्वाहा जंगल के करीब ढाई लाख पुराने पेड़ काटे जाना पर्यावरण हित में नहीं है। इससे जैव विविधता नष्ट होगी।
बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश सहित पूरे देश का पर्यावरण प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि कोरोना की दूसरी लहर में सभी ने यह महसूस किया है कि हमारे लिए हरियाली महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पर्यावरण योद्धाओं को बकस्वाहा जंगल की जंग जीतना ही होगी।
उधर, पीपल, नीम, तुलसी अभियान के प्रणेता डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार को बकस्वाहा जंगल से सिर्फ आमदनी चाहिए तो इसे पिकनिक स्पॉट और टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित कर दें।
महोबा में आज लिखे जाएंगे खून से खत
बुंदेली समाज संयोजक तारा पाटकर ने बताया कि नौ अगस्त क्रांति दिवस पर महोबा जिले के आल्हा चौक में सुबह 10:30 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खून से पत्र लिखे जाएंगे। इन पत्रों में बुंदेलखंड राज्य की मांग सहित बकस्वाहा जंगल और बुंदेलखंड के सभी जंगल, नदी, पहाड़ एवं ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की मांग की जाएगी। इस आंदोलन पर डटे बुंदेली 21वीं बार खून से पत्र लिखेंगे।
ये है बकस्वाहा का बवाल
बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल की लगभग 382 हेक्टेयर भूमि मध्य प्रदेश सरकार ने बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग इंडस्ट्रीज को 50 साल के पट्टे पर दिया है। यह कंपनी यहां हीरा खनन करेगी। जंगल के लगभग सवा दो लाख पेड़-पौधे कटेंगे। इतनी बड़ी संख्या में पेड़ कटने का चौतरफा विरोध हो रहा है।
एनजीटी ने फिलहाल पेड़ कटान पर रोक लगा दी है। अभी यह प्रकरण विचाराधीन है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बकस्वाहा जंगल के शैल चित्रों को लेकर दाखिल याचिका में केंद्र और राज्य सरकार व पुरातत्व विभाग से चार हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है।
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बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान के बैनर तले मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के गांधी आश्रम से शांति मार्च को आश्रम अध्यक्ष दुर्गा प्रसाद राय ने अपना संदेश देकर रवाना किया। यात्रा में शामिल महिला-पुरुषों के हाथों में हीरा नहीं, हरियाली चाहिए इत्यादि नारों की तख्तियां थीं। इन पर्यावरण प्रेमियों ने बस स्टैंड के पास मानव श्रंखला भी बनाई और कहा कि प्रकृति बचाना है तो जंगल बचाने होंगे।
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बकस्वाहा के जंगल को बचाने के अभियान का नेतृत्व पीपल, नीम, तुलसी संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र कुमार कर रहे थे। वह 5 अगस्त से ही छतरपुर में जमे हुए हैं। उन्होंने बताया कि 9 अगस्त के कार्यक्रम की भी रूपरेखा तैयार कर ली गई है।
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बकस्वाहा जंगल को बचाने में बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन मिल रहा है। साथ ही जो लोग शांति मार्च और आंदोलनों में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, वह अपने गांव और बस्तियों में यही काम कर रहे हैं। बकस्वाहा जंगल बचाने की गूंज गांवों और कस्बों में भी काफी तेजी से गूंज रही है।
रविवार को कई कस्बों और गांवों में मानव श्रंखला, रैली, पौधरोपण इत्यादि आयोजन हुए। डॉ. धर्मेंद्र ने बताया कि हरेक आयोजन में कोविड गाइडलाइन का ध्यान रखा जा रहा है। बताया कि लोगों को भी इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है।
नाटक, लेखन और हस्ताक्षर अभियान
बकस्वाहा जंगल बचाओ मुहिम में नुक्कड़ नाटक, दीवारों में लेखन, हस्ताक्षर अभियान और राष्ट्रपति को संबोधित पत्र लेखन का कार्य भी चल रहा है। पर्यावरण पैरोकार यह गतिविधियां अपने क्षेत्रों और घरों से अंजाम दे रहे हैं।
आंदोलन में शामिल हुए ये पर्यावरण योद्धा
बकस्वाहा अभियान के आयोजनों में बिहार की समाजसेविका और दीदीजी फाउंडेशन की संस्थापक डॉ. नम्रता आनंद, अंकित कुमार, मातृ शक्ति संगठन यूथ विंग समर्पण युवा संगठन की सीमा चौहान, समाजसेवी पवन राजावत, छतरपुर बार काउंसिल अध्यक्ष राकेश दीक्षित, वृक्षमित्र सुनील दुबे, पर्यावरण प्रशिक्षक आनंद पटेल, भोपाल के डॉ. राजीव जैन, बकस्वाहा के समाजसेवी राजेश यादव, झांसी के राजेंद्र कुमार, सिहोर के ओम प्रकाश पंचाल, मध्यप्रदेश के पन्ना के डॉ. अभिषेक खरे, प्राकृतिक चिकित्सक दिनेश द्विवेदी, प्रो. डॉ. कुसुम कश्यप, भोपाल के पर्यावरणविद अश्विनी दुबे, पंजाब के अनुराग विश्नोई, मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ की श्रद्धा चौहान समेत नीलय पांडेय, देवेंद्र कुशवाहा, बाबी तिवारी, रामबाबू तिवारी आदि शामिल रहे।
पिकनिक स्पॉट बनाकर लें आमदनी
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान में शामिल होने छतरपुर पहुंचीं पर्यावरण योद्धा डॉ. नम्रता आनंद ने कहा कि हीरा खदान के लिए बकस्वाहा जंगल के करीब ढाई लाख पुराने पेड़ काटे जाना पर्यावरण हित में नहीं है। इससे जैव विविधता नष्ट होगी।
बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश सहित पूरे देश का पर्यावरण प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि कोरोना की दूसरी लहर में सभी ने यह महसूस किया है कि हमारे लिए हरियाली महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पर्यावरण योद्धाओं को बकस्वाहा जंगल की जंग जीतना ही होगी।
उधर, पीपल, नीम, तुलसी अभियान के प्रणेता डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार को बकस्वाहा जंगल से सिर्फ आमदनी चाहिए तो इसे पिकनिक स्पॉट और टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित कर दें।
महोबा में आज लिखे जाएंगे खून से खत
बुंदेली समाज संयोजक तारा पाटकर ने बताया कि नौ अगस्त क्रांति दिवस पर महोबा जिले के आल्हा चौक में सुबह 10:30 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खून से पत्र लिखे जाएंगे। इन पत्रों में बुंदेलखंड राज्य की मांग सहित बकस्वाहा जंगल और बुंदेलखंड के सभी जंगल, नदी, पहाड़ एवं ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की मांग की जाएगी। इस आंदोलन पर डटे बुंदेली 21वीं बार खून से पत्र लिखेंगे।
ये है बकस्वाहा का बवाल
बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल की लगभग 382 हेक्टेयर भूमि मध्य प्रदेश सरकार ने बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग इंडस्ट्रीज को 50 साल के पट्टे पर दिया है। यह कंपनी यहां हीरा खनन करेगी। जंगल के लगभग सवा दो लाख पेड़-पौधे कटेंगे। इतनी बड़ी संख्या में पेड़ कटने का चौतरफा विरोध हो रहा है।
एनजीटी ने फिलहाल पेड़ कटान पर रोक लगा दी है। अभी यह प्रकरण विचाराधीन है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बकस्वाहा जंगल के शैल चित्रों को लेकर दाखिल याचिका में केंद्र और राज्य सरकार व पुरातत्व विभाग से चार हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है।