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रावण के पुतलों के साथ मुस्लिम बना रहे ताजिये
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Tue, 20 Oct 2015 11:48 PM IST
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बांदा। ऋषि वामदेव और नवाब की नगरी बांदा मेें राम-रहीम की जुगलबंदी चल रही है। कौमी एकता इससे नायाब नमूना और क्या होगा कि राम-रहीम एक ही घर में तैयार हो रहे हैं। दशहरे का रावण और मोहर्रम का ताजिया मुस्लिम कारीगर तुफैल अहमद अपने घर पर एक साथ बना रहा है। बांदा मेें रामलीला के लिए रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाने और इन्हें फूंकने की शुरुआत ही इसी मुस्लिम घराने से हुई है। यह अभी भी चली आ रही है।
नवरात्र और मोहर्रम के मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द की विरासत को बरकरार रखते हुए कई नजारे यहां मौजूद हैं। मर्दननाका निवासी तुफैल अहमद आने मजहब का पाबंद है। वह हर साल दशहरे के लिए रावण के पुलते, रामलीला के लिए फुलवारी और मोहर्रम के लिए ताजिये बनाता है। उसे यह विरासत अपने पिता मरहूम एजाज अहमद से मिली। एजाज भी लगभग पांच दशकों तक यही करते रहे। अब उनका काम बेटे तुफैल ने संभाल लिया है।
इन दिनों तुफैल अपने घर में रावण के पुतले और ताजिये बनाने में मशगूल है। उसे बांदा शहर में मनाए जाने वाले चार दिवसीय दशहरे रामलीला मंचन के दौरान फूंकने वाले रावण के पुतले बनाने हैं। इसी तरह जन्नो बीबी के इमामबाड़े सहित कई इमामबाड़ों के लिए ताजिये तैयार करना है। दोनों काम एक साथ चल रहे हैं। तुफैल का कहना है कि दोनों ही कामों में मेहनत और वक्त बहुत लगता है। उतना मेहनताना नहीं मिलता लेकिन तसल्ली इस बात की है कि उसका यह पुश्तैनी काम शहर में सांप्रदायिक सौहार्द का पैगाम बिखेर रहा है। तुफैल का असल खर्च उसकी नौकरी पूरा करती है। वह एक शू के शो रूम में सेल्समैन है। रामलीला और मोहर्रम आयोजक उसका सम्मान करते हैं।
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नवरात्र और मोहर्रम के मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द की विरासत को बरकरार रखते हुए कई नजारे यहां मौजूद हैं। मर्दननाका निवासी तुफैल अहमद आने मजहब का पाबंद है। वह हर साल दशहरे के लिए रावण के पुलते, रामलीला के लिए फुलवारी और मोहर्रम के लिए ताजिये बनाता है। उसे यह विरासत अपने पिता मरहूम एजाज अहमद से मिली। एजाज भी लगभग पांच दशकों तक यही करते रहे। अब उनका काम बेटे तुफैल ने संभाल लिया है।
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इन दिनों तुफैल अपने घर में रावण के पुतले और ताजिये बनाने में मशगूल है। उसे बांदा शहर में मनाए जाने वाले चार दिवसीय दशहरे रामलीला मंचन के दौरान फूंकने वाले रावण के पुतले बनाने हैं। इसी तरह जन्नो बीबी के इमामबाड़े सहित कई इमामबाड़ों के लिए ताजिये तैयार करना है। दोनों काम एक साथ चल रहे हैं। तुफैल का कहना है कि दोनों ही कामों में मेहनत और वक्त बहुत लगता है। उतना मेहनताना नहीं मिलता लेकिन तसल्ली इस बात की है कि उसका यह पुश्तैनी काम शहर में सांप्रदायिक सौहार्द का पैगाम बिखेर रहा है। तुफैल का असल खर्च उसकी नौकरी पूरा करती है। वह एक शू के शो रूम में सेल्समैन है। रामलीला और मोहर्रम आयोजक उसका सम्मान करते हैं।
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