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हीरा तराशते थे, फावड़ा कैसे चलाएं ?

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Sat, 06 Jun 2020 03:10 PM IST
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hira mzdoor
सूरत की डायमंड कम्पनी में कच्चा हीरा तराशता अंकित - फोटो : AMAR UJALA
एप से ------ मशीनों में हीरा तराशते थे, गाँव में फावड़ा कैसे चलाएँ ? - गाँव लौटे प्रवासी मज़दूर ने बयां की पीड़ा - सूरत में डायमंड कम्पनी में करता था जॉब - ट्रेन चलते ही फिर चला जाएगा सूरत रशीद सिद्दीकी बाँदा। " सूरत में हम मशीनों से हीरा तराशते थे। अब इन हाथों से गांव में फावड़ा कैसे चलाएं ? ट्रेन चलते ही हम फिर वहां के लिए चल पड़ेंगे। सीधे- सपाट शब्दों में अपनी यह पीड़ा नरैनी क्षेत्र के मोतियारी गांव के युवा मजदूर अंकित ने बयां की । कहा कि उसे मनरेगा की मजदूरी नहीं , बल्कि वह जौहरी चाहिए जो उसके हुनर की कद्र करके उसे रोजगार दे सके। आठवीं तक पढ़े युवा मज़दूर अंकित कुमार ने बेरोजगारी और से तंग तंग आकर एक साल पहले अपने दोस्तों के साथ सूरत चला गया। वहां उसे मारुति डायमंड कंपनी में काम मिल गया । दो माह में ही वह मशीन पर कच्चे हीरे की घिसाई और तराशने के काम में माहिर हो गया। अंकित बताता है कि वह रोजाना 50 से 60 कच्चे हीरे तैयार करता था। उसे 10 रुपये प्रति हीरा की दर से मजदूरी मिलती थी। रोजाना लगभग 600 रुपये का काम हो जाता था । मशीन से काम करने में ज्यादा मेहनत मशक्कत भी नहीं होती थी। महीने में ₹20000 तक मिल रहे थे। अंकित ने बताया कि मार्च लॉक डाउन लागू होते ही कंपनी बंद हो गई । कंपनी ने उसका पूरा हिसाब कर दिया । 2 माह तक वह वहीं फंसा रहा । अपनी पूंजी खर्च कर बैठा। 15 दिन पहले वह अपने गांव लौटा है। अंकित बताता है कि गांव आने के बाद उसे काम की समस्या पैदा हो गई है। यहां सिर्फ मनरेगा के फावड़े चलाने का ही काम मय्यसर है। मशीन चलाने वाले उसके हाथ इस शिद्दत की गर्मी में फावड़ा नहीं चला सकते। ट्रेन चालू होते ही वह वापस सूरत चला जाएगा।
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