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पर्यावरण योद्धाओं का मिट्टी से होगा तिलक

Thu, 19 Aug 2021 11:12 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 19 Aug 2021 11:12 PM IST
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Environmental warriors will have tilak with clay
बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा के जंगल को बचाने की जंग में जुटे पर्यावरण पैरोकारों ने अभियान को और तेजी प्रदान की है। अब पर्यावरण के पैरोकार बकस्वाहा जंगल को बचाने की मुहिम को और धार देते हुए जंगल की मिट्टी को पूरे देश में पहुंचाएंगे।
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इसके लिए पदयात्राओं को निकालने की भी तैयारियां की जा रही हैं। इसी मिट्टी से पर्यावरण के योद्धाओं का तिलक भी किया जाएगा। बकस्वाहा जंगल को हीरा खदान में बदलने की सरकारी योजना का विरोध कर रहे संगठन पीपल, नीम, तुलसी अभियान संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि बकस्वाहा जंगल के मुद्दे पर पूरे देश के पर्यावरण योद्धाओं को एक सूत्र में बांधकर जंगल के पेड़ कटने से बचाने के अभियान को और तेज किया जाएगा।
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इसके तहत हरेक राज्य में यात्राएं निकाली जाएंगी। इन यात्राओं की शुरुआत बिहार राज्य से होगी। दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश से यात्रा निकलेगी। तीसरे चरण में राजस्थान और फिर अगले चरणों में झारखंड, उड़ीसा, बंगाल, असम, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश से भी यात्राएं निकाली जाएंगी।
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उन्होंने बताया कि प्रयास होगा कि यह यात्राएं हरेक जनपद में पहुंचे और लोगों को पेड़ों की अहमियत संग जंगल बचाने के लिए जागरूक किया जा सके। यात्राओं में शामिल लोग बकस्वाहा जंगल की मिट्टी से पर्यावरण योद्धाओं का तिलक करेंगे।
डॉ. धर्मेंद्र ने बताया कि देश के बाहर नेपाल में भी यह अभियान पहुंचाया जाएगा। कुछ स्थानों पर डाक के जरिए भी मिट्टी भेजी जाएगी। उन्होंने दावा किया कि बकस्वाहा जंगल को बचाने के लिए बिहार से शुरू हुए अभियान में इस मुद्दे पर पूरे देश में जागरुकता आई है।
तिलक के साथ संकल्प भी
यात्राओं के दौरान बकस्वाहा जंगल की मिट्टी से पर्यावरण योद्धाओं का तिलक करते हुए संकल्प दिलाया जाएगा कि विकास के नाम पर हरियाली नहीं उजड़ने देंगे। बेजुबान पशु-पक्षी, जीव, जंतु के आशियाने उजड़ने से बचाएंगे। मांग की जाएगी कि जंगल का विस्तार कर वन आधारित उद्योग स्थापित किए जाएं।
21 सितंबर से 2 अक्तूबर तक पदयात्रा
बकस्वाहा जंगल की पैरोकारी में एकता परिषद अगले माह 12 दिवसीय पदयात्रा निकालेगी। परिषद के अनुसार, विश्व शांति दिवस 21 सितंबर से विश्व अहिंसा दिवस दो अक्तूबर तक यह पदयात्रा निकाली जाएगी।
परिषद के पीवी राजगोपाल ने बताया कि इस अवधि में पूरी दुनियां में लगभग 120 पदयात्राएं निकाली जाएंगी। इनमें एक पद यात्रा बकस्वाहा के लिए भी होगी। मुख्य मांग और मुद्दा बकस्वाहा जंगल और वहां के आदिवासियों तथा शैल चित्रों को बचाने की है।
जंगल बचाने की जंग में एकता परिषद भी
बकस्वाहा जंगल बचाने को कई संगठन जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। इन्हीं में एक एकता परिषद भी है। परिषद के गांधीवादी विचारक पीवी राजगोपाल ने टीम नेकी के तत्वावधान में सामाजिक कार्यकर्ताओं से कहा कि पूरी दुनिया में मनुष्य का जीवन बेहतर बनाने को आंदोलन हो रहे हैं। टीम नेकी भी नदी, तालाब, जंगल, पेड़ बचाने के लिए कृत संकल्पित है।
अभियान की वर्चुअल कार्यशाला कल
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान में शामिल पर्यावरण प्रेमी अनुराग विश्नोई (रूप नगर, पंजाब) का कहना है कि पर्यावरण प्रेमियों से विचार-विमर्श करने के बाद अभियान आयोजित किए गए हैं। कहा कि जो लोग बकस्वाहा नहीं आ सकते, वह अपने स्थान पर इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं।
कहा कि अभियान में कई प्रदेशों के पर्यावरण प्रेमी शामिल हैं, जिसमें मातृ शक्ति का बड़ा योगदान है। बताया कि 21 अगस्त को डॉ. धर्मेंद्र कुमार की अगुवाई में वर्चुअल कार्यशाला होगी। इसमें बकस्वाहा में होने वाले मंथन शिविर की रणनीति बनेगी। पर्यावरण प्रेमियों को इसमें आमंत्रित किया गया है।
रक्षाबंधन पर पेड़ों में बंधेंगे रक्षासूत्र
बकस्वाहा जंगल रक्षाबंधन के त्योहार पर अपने पैरोकारों से गुलजार हो सकता है। बारिश में जमकर हरे भरे हो गए पेड़ों में पर्यावरण पैरोकार रक्षासूत्र यानी राखी बांधेंगे। रक्षाबंधन 22 अगस्त (रविवार) को है। यह जानकारी पर्यावरण पैरोकार उद्घोष फाउंडेशन ने दी। रक्षाबंधन से पूर्व भी बकस्वाहा जंगल में पेड़ों को रक्षासूत्र बांधे गए।
ये है बकस्वाहा का बवाल
बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में स्थित बकस्वाहा जंगल को मध्य प्रदेश सरकार ने हीरा खदान के लिए बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग इंडस्ट्रीज कंपनी को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। यहां हीरा खनन से जंगल के लगभग 2.15 लाख पेड़ काटे जाएंगे।

इतनी बड़ी संख्या में हरे पेड़ों की कटान से पर्यावरण को संभावित भारी नुकसान के मद्देनजर पर्यावरण पैरोकार संगठन देश व्यापी विरोध कर रहे हैं। एनजीटी और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी यह मामला पहुंच चुका है। बकस्वाहा जंगल में दुर्लभ हजारों वर्ष पुराने शैलचित्र भी हैं। इनके भी नष्ट होने का अंदेशा है।
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