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ई-रिक्शा चला हिम्मत से भरपूर हिना चलाती घर
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ई-रिक्शा पर सवारी ले जाती हिना।
- फोटो : BANDA
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बांदा। मंडल मुख्यालय की इकलौती महिला ई-रिक्शा चालक हिना शहरियों के बीच आकर्षण का केंद्र है। दिनभर सवारियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने वाली हालात से मजबूर युवती को ई-रिक्शा चलाते देख लोग गौर से देखते हैं। कुछ तरस और रहम खाते हैं तो कुछ मनचले मजाक उड़ातेे हैं।
पर इन दोनों तरह की निगाहों से बेखबर और बेफिक्र हिना की निगाहें और फिक्र शाम को घर का चूल्हा जलाने के लिए कमाई पर टिकी रहती हैं। हिना की हिम्मत भी कम नहीं है। उसका सामना अक्सर शोहदों से भी होता है। लेकिन वह उन पर भारी पड़ती है। कई को सरेआम दौड़ा भी चुकी हैं। पति, पिता और मां लाचार व बीमार हैं।
शहर के कांशीराम कालोनी की रहने वाली हिना की तमन्ना पढ़-लिखकर अन्य लड़कियों की तरह कुछ कर दिखाने की थी, पर हिम्मत और हौसले के बावजूद वह अपने इस सपने को हकीकत में नहीं बदल पाई। मजदूर पिता समीर अली बीमारी के चलते लाचार हो गए। मां हुसनी घरेलू कामकाज में ही कैद होकर रह गई। 20 वर्षीय हिना को मजबूरन कक्षा 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़कर घर की जिम्मेदारी का बोझ संभालना पड़ा।
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हिना की शादी भरतकूप (चित्रकूट) में हो गई। एक पुत्र हुआ, लेकिन वह भी अल्प समय में ही चल बसा। उसके बाद कोई संतान नहीं हुई। बदकिस्मती ने हिना का यहीं साथ नही छोड़ा। उसका पति भी बीमार हो गया। फेरी लगाकर कपड़ों की चेन बेचने का काम धंधा ठप हो गया। ऐसे में हिना पर घर के खर्च के साथ पति और पिता के इलाज की भी जिम्मेदारी आ पड़ी।
आर्थिक रूप से बुरी तरह तंगहाल हिना घर पर दुकान खोलने की इच्छुक थी पर पूंजी के अभाव में वह भी नहीं हो सका। ऐसी स्थितियों में हिना को बिना पूंजी के किसी कमाई की सख्त दरकार थी। वरना घर का चूल्हा जलना मुश्किल था। ऐसे में हिना ने हिम्मत न हारते हुए किराए का ई-रिक्शा उठा लिया। लॉकडाउन के समय से वह ई-रिक्शा चलाकर घर का खर्च उठाने के साथ ही मां-बाप और पति की तीमारदारी भी कर रही है। हौसले से भरपूर हिना का अक्सर शोहदों से सामना हो जाता है। वह उन पर भारी पड़ती है। सपा सरकार में हिना और उसकी मां को समाजवादी पेंशन मिलती थी। वह भी बंद हो गई। अब रिक्शे की कमाई पर ही पूरा दारोमदार है।
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पर इन दोनों तरह की निगाहों से बेखबर और बेफिक्र हिना की निगाहें और फिक्र शाम को घर का चूल्हा जलाने के लिए कमाई पर टिकी रहती हैं। हिना की हिम्मत भी कम नहीं है। उसका सामना अक्सर शोहदों से भी होता है। लेकिन वह उन पर भारी पड़ती है। कई को सरेआम दौड़ा भी चुकी हैं। पति, पिता और मां लाचार व बीमार हैं।
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शहर के कांशीराम कालोनी की रहने वाली हिना की तमन्ना पढ़-लिखकर अन्य लड़कियों की तरह कुछ कर दिखाने की थी, पर हिम्मत और हौसले के बावजूद वह अपने इस सपने को हकीकत में नहीं बदल पाई। मजदूर पिता समीर अली बीमारी के चलते लाचार हो गए। मां हुसनी घरेलू कामकाज में ही कैद होकर रह गई। 20 वर्षीय हिना को मजबूरन कक्षा 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़कर घर की जिम्मेदारी का बोझ संभालना पड़ा।
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हिना की शादी भरतकूप (चित्रकूट) में हो गई। एक पुत्र हुआ, लेकिन वह भी अल्प समय में ही चल बसा। उसके बाद कोई संतान नहीं हुई। बदकिस्मती ने हिना का यहीं साथ नही छोड़ा। उसका पति भी बीमार हो गया। फेरी लगाकर कपड़ों की चेन बेचने का काम धंधा ठप हो गया। ऐसे में हिना पर घर के खर्च के साथ पति और पिता के इलाज की भी जिम्मेदारी आ पड़ी।
आर्थिक रूप से बुरी तरह तंगहाल हिना घर पर दुकान खोलने की इच्छुक थी पर पूंजी के अभाव में वह भी नहीं हो सका। ऐसी स्थितियों में हिना को बिना पूंजी के किसी कमाई की सख्त दरकार थी। वरना घर का चूल्हा जलना मुश्किल था। ऐसे में हिना ने हिम्मत न हारते हुए किराए का ई-रिक्शा उठा लिया। लॉकडाउन के समय से वह ई-रिक्शा चलाकर घर का खर्च उठाने के साथ ही मां-बाप और पति की तीमारदारी भी कर रही है। हौसले से भरपूर हिना का अक्सर शोहदों से सामना हो जाता है। वह उन पर भारी पड़ती है। सपा सरकार में हिना और उसकी मां को समाजवादी पेंशन मिलती थी। वह भी बंद हो गई। अब रिक्शे की कमाई पर ही पूरा दारोमदार है।