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सूखा रोग को अंधविश्वास में दे रहे दैवी का दर्जा
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Divine status is being given to drought disease in superstition
- फोटो : BANDA
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बांदा। सूखा रोग लाइलाज नहीं। बुंदेलखंड में यह अंधविश्वास बच्चों को दिव्यांग और शारीरिक रूप से जर्जर बना रहा है। दरअसल यह विटामिन-डी की कमी से होने वाला रोग रीकेट्स है। इलाज की बजाय अभिभावक दैवीय मर्ज मानकर ओझा और झाड़फूंक के चक्कर में पड़ रहे हैं।
महिला जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डा. एचएन सिंह का कहना है कि बुंदेलखंड में अंधविश्वास के चलते कुछ बीमारियों को दैवी रोग का दर्जा दे दिया जाता है। इलाज से परहेज करके झाड़फूंक कराते हैं। उन्होंने बताया कि सूखा रोग में हड्डियां नरम और भंगुर हो जाती हैं।
इस बीमारी की सबसे मुख्य वजह विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी है। कुपोषण, हड्डियों को क्षति पहुंचाने में प्रमुख भूमिका निभाता है। डॉ. सिंह के मुताबिक जेनेटिक स्थितियां भी इस बीमारी की जनक हो सकती हैं। रोग से बच्चों के शरीर में विकृति आ जाती है, लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं कि इलाज से बच्चों को दुरुस्त किया गया।
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अजीतपारा गांव की अंजू इसकी बानगी हैं। सात माह पहले में उसने जुड़वां बेटी-बेटे को जन्म दिया। बच्चों का वजन दो किलो से भी कम था। लोगों के कहने पर इसे दैवी रोग बताकर ओझा से झाडफ़ूंक करवाना शुरू कर दिया। पांच माह तक कोई फायदा नहीं हुआ।
गांव पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने देखा और बच्चों को सूखा रोग ग्रस्त बताते हुए एनआरसी में भर्ती कराया। 14 दिन यहां बच्चों का इलाज हुआ। अब दोनों स्वस्थ हैं। इसी गांव के मजदूर फूलचंद्र ने बताया कि उसकी दो वर्षीय बेटी का वजन बहुत कम हो गया।
सूखा रोग बताने पर झाड़फूंक कराई, लेकिन वजन घटता ही चला गया और आठ किलो से चार किलो रह गया। आंगनबाड़ी कुसुमा देवी ने बालिका को जिला अस्पताल लाकर एनआरसी में भर्ती कराया। 14 दिन इलाज के बाद बालिका का वजन बढ़कर नौ किलो हो गया।
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महिला जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डा. एचएन सिंह का कहना है कि बुंदेलखंड में अंधविश्वास के चलते कुछ बीमारियों को दैवी रोग का दर्जा दे दिया जाता है। इलाज से परहेज करके झाड़फूंक कराते हैं। उन्होंने बताया कि सूखा रोग में हड्डियां नरम और भंगुर हो जाती हैं।
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इस बीमारी की सबसे मुख्य वजह विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी है। कुपोषण, हड्डियों को क्षति पहुंचाने में प्रमुख भूमिका निभाता है। डॉ. सिंह के मुताबिक जेनेटिक स्थितियां भी इस बीमारी की जनक हो सकती हैं। रोग से बच्चों के शरीर में विकृति आ जाती है, लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं कि इलाज से बच्चों को दुरुस्त किया गया।
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अजीतपारा गांव की अंजू इसकी बानगी हैं। सात माह पहले में उसने जुड़वां बेटी-बेटे को जन्म दिया। बच्चों का वजन दो किलो से भी कम था। लोगों के कहने पर इसे दैवी रोग बताकर ओझा से झाडफ़ूंक करवाना शुरू कर दिया। पांच माह तक कोई फायदा नहीं हुआ।
गांव पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने देखा और बच्चों को सूखा रोग ग्रस्त बताते हुए एनआरसी में भर्ती कराया। 14 दिन यहां बच्चों का इलाज हुआ। अब दोनों स्वस्थ हैं। इसी गांव के मजदूर फूलचंद्र ने बताया कि उसकी दो वर्षीय बेटी का वजन बहुत कम हो गया।
सूखा रोग बताने पर झाड़फूंक कराई, लेकिन वजन घटता ही चला गया और आठ किलो से चार किलो रह गया। आंगनबाड़ी कुसुमा देवी ने बालिका को जिला अस्पताल लाकर एनआरसी में भर्ती कराया। 14 दिन इलाज के बाद बालिका का वजन बढ़कर नौ किलो हो गया।