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14 साल की छात्रा ने लगा ली फांसी
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Mon, 30 Nov 2015 11:52 PM IST
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बांदा। मां के डांटने से क्षुब्ध हाईस्कूल की छात्रा
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ने फांसी लगाकर जान दे दी। पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप
दिया।
नरैनी कस्बे के देविन पुरवा (बरुवा स्योढ़ा) निवासी रामप्रकाश की 14 वर्षीय पुत्री अर्चना कोटार्य ने सोमवार सुबह खपरैल की धन्नी में रस्सी बांधकर गले में फंदा कस लिया।
घर लौटी मां ने उसे फांसी पर टंगा देखा तो सन्न रह गई। परिजनों ने घटना की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने शव फंदे से उतारकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। पिता ने बताया कि अच्छा खाना न बनाने पर मां ने उसे डांट दिया था।
इसी बात से क्षुब्ध होकर अर्चना ने फांसी लगा ली। वह उसकी इकलौती पुत्री थी। कस्बे के विवेकानंद इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की छात्रा थी।
आए दिन किशोर उम्र के बालक-बालिकाओं का आत्महत्या पर जिला अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डा.हरदयाल का कहना है कि बच्चे बेहद संवेदनशील होते हैं।
उन पर पढ़ाई या घरेलू काम का दबाव रहता है। उन्हें लगता है कि परिवार का कोई सदस्य उनके समर्थन में नहीं है तो निराशा (डिप्रेशन) में आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं।
ऐसी घटनाएं रोकने के लिए बच्चों के अंदर हीनभावना रोकना बहुत जरूरी है। यदि किसी परिवार का आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और काम करना मजबूरी हो तो उसके बारे में सहानुभूति पूर्वक बच्चों को बताएं।
नरैनी कस्बे के देविन पुरवा (बरुवा स्योढ़ा) निवासी रामप्रकाश की 14 वर्षीय पुत्री अर्चना कोटार्य ने सोमवार सुबह खपरैल की धन्नी में रस्सी बांधकर गले में फंदा कस लिया।
घर लौटी मां ने उसे फांसी पर टंगा देखा तो सन्न रह गई। परिजनों ने घटना की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने शव फंदे से उतारकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। पिता ने बताया कि अच्छा खाना न बनाने पर मां ने उसे डांट दिया था।
इसी बात से क्षुब्ध होकर अर्चना ने फांसी लगा ली। वह उसकी इकलौती पुत्री थी। कस्बे के विवेकानंद इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की छात्रा थी।
आए दिन किशोर उम्र के बालक-बालिकाओं का आत्महत्या पर जिला अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डा.हरदयाल का कहना है कि बच्चे बेहद संवेदनशील होते हैं।
उन पर पढ़ाई या घरेलू काम का दबाव रहता है। उन्हें लगता है कि परिवार का कोई सदस्य उनके समर्थन में नहीं है तो निराशा (डिप्रेशन) में आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं।
ऐसी घटनाएं रोकने के लिए बच्चों के अंदर हीनभावना रोकना बहुत जरूरी है। यदि किसी परिवार का आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और काम करना मजबूरी हो तो उसके बारे में सहानुभूति पूर्वक बच्चों को बताएं।