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चार साल में चार साल में 1021 किसानों ने दी जान
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Fri, 15 Apr 2016 12:03 AM IST
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फाइनेंसर सुसाइड
- फोटो : bureau
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बांदा। बुंदेलखंड में सूखे से तबाह किसानों के मरने का सिलसिला जारी है। चार साल में चित्रकूट धाम मंडल में दम तोड़ने वाले 1021 किसानों में बांदा के 330 और चित्रकूट के 140 किसान शामिल हैं। इसी तरह महोबा में 286 तो हमीरपुर में 265 किसान जान दे चुके हैं।
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ये आंकड़ें सपा के राज्यसभा सदस्य विशंभर प्रसाद निषाद की ओर से सदन में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने पेश किया है। हालांकि प्रशासन इन किसानों की मौत की वजह कृषि जनित नहीं मानता है।
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कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक बांदा जिले में वर्ष 2013 में 70, वर्ष 2014 में 107, वर्ष 2015 में 116 और मार्च 2016 तक 37 किसानों ने सुसाइड किया। इसी तरह हमीरपुर में वर्ष 2013 में 66, वर्ष 2014 में 85, वर्ष 2015 में 89 तथा वर्ष 2016 मार्च तक 25 किसानों ने खुदकुशी की।
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जनपद महोबा में वर्ष 2013 में 55, वर्ष 2014 में 91, वर्ष 2015 में 107 और वर्ष 2016 मार्च तक 33 किसानों ने मौत को गले लगाया। चित्रकूट जनपद मेें वर्ष 2013 में 25, वर्ष 2014 में 47, वर्ष 2015 में 52 और वर्ष 2016 मार्च तक 16 किसानोें ने आत्महत्या की है।
दैवी आपदा दायरे से खारिज कर दीं मौतें
बांदा। बुंदेलखंड में आए दिन हो रही किसानों की आत्महत्या पर प्रशासन की लीपापोती का पुराना ढर्रा बरकरार है। हास्यापद बात यह है कि प्रशासन यह मान रहा है कि आत्महत्या करने वाले किसान कर्जदार और मनरेगा जॉब कार्ड धारक थे। इसके बावजूद जांच रिपोर्ट में कोई न कोई नकारात्मक तथ्य दर्शाकर मौत को दैवी आपदा के दायरे से बाहर बता रहा है।
जांच रिपोर्ट में साफ लिख दिया जाता है कि प्रथम दृष्टया यह मामला दैवी आपदा के अंतर्गत नहीं है या फिर यह लिखा जाता है कि मृत्यु कृषि जनित या भूख से होना प्रमाणित नहीं पाई गई। हाल ही में बबेरू तहसील के अछाह गांव में 40 वर्षीय किसान कृष्ण कुमार ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
अपर जिलाधिकारी डीएस पांडेय ने बताया कि बबेरू तहसीलदार ने अपनी जांच में लिखा है कि मृतक किसान कृष्ण कुमार ने किसान क्रेडिट कार्ड बनवा रखा था। यानी वह कर्जदार था। साथ ही मनरेगा जॉब कार्डधारक भी था।
इसके बाद भी प्रशासन ने इस आत्महत्या केा दैवी आपदा के दायरे में नहीं माना है। इसी तरह बड़ोखर खुर्द गांव में किसान बलवीर सिंह ने बिजली लाइन के टावर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। प्रशासन ने इस मौत को डिप्रेशन या गृहकलह बताकर कृषिजनित क्षति के कारण मौत मानने से इनकार कर दिया।
बैंकों की बेवफाई : ‘बड़ों’ पर करम, ‘छोटों’ पर सितम
बांदा। सुप्रीम कोर्ट ने बैंकाें को उनके रवैए पर बेवजह ही फटकार नहीं लगाई। बैंक और राजस्व विभाग की कारगुजारियां ही ऐसी हैं कि 15-25 हजार का कर्ज लेने वाले किसानों पर वसूली के लिए उत्पीड़न के पहाड़ तोड़ दिए जाते हैं। उनकी जमीन और ट्रैक्टर नीलम हो जाते हैं।
दूसरी तरफ लाखों का लोन लेने वाले बड़े बकायेदारों की कोई खोज खबर नहीं ली जाती। बांदा में भी बैंकों और प्रशासन के रवैए की कई बानगी हैं। शहर की एक ट्रैक्टर एजेंसी ने वर्ष 2013 मेें 35 लाख रुपये का कर्ज दिया था। अब यह बढ़कर 40 लाख रुपये हो गया है। आज तक अदायगी नहीं हुई।
स्टेट बैंक की मुख्य शाखा से दिए गए इस कर्ज का मामला अब कर्जदार ने कोर्ट ले जाकर उलझा दिया है। इसी तरह बंगालीपुरा निवासी एक व्यक्ति ने वर्ष 2009 में मकान के लिए साढ़े सात लाख रुपये कर्ज हथिया लिया। अब यह 8 लाख 20 हजार हो गया है। बकाएदार को नोटिस की रस्म अदायगी कर बैंक खामोश है। ऐसे ही बड़े कर्जदारों के तमाम मामले स्टेट बैंक सहित अन्य बैंकों में पड़े हुए हैं।