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सरहद के घालमेल से प्रत्याशी और प्रचारक परेशान
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यूपी-एमपी सीमा पर बोड़ा पुरवा की इस तस्वीर में पीली मिट्टी से पुता खपरैलनुमा कच्चा मकान एमपी में ?
- फोटो : BANDA
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बांदा/करतल। सीमा के घालमेल से प्रत्याशियों और मतदाता दोनों ही परेशान हैं। एमपी की सीमा पर आबाद कई गांवों की स्थिति अजीबोगरीब है। यहां का प्रत्याशी एमपी क्षेत्र में जाकर मतदाताओं से वोट मांग रहा है। एमपी में चुनाव होने पर वहां के प्रत्याशी यूपी में आबाद मतदाताओं से वोट मांगते हैं।
नरैनी तहसील एमपी की सीमा से जुड़ी है। करतल क्षेत्र के बिल्हरका गांव के बोड़ा पुरवा और विधुवा पुरवा में यूपी-एमपी सीमा का जबरदस्त घालमेल है। आलम यह है कि घर का दरवाजा अगर यूपी की तरफ खुलता है तो पिछले कमरे के खपरैल का पानी एमपी में गिरता है।
चांदी पाटी गांव के एक-दूसरे से सटे मकान भी सीमाओं में बंटे हैं। एक यूपी में तो दूसरा एमपी में। सरहद की इस घालमेल में यहां विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी और उनके प्रचारक प्रभावित हो रहे हैं। बोड़ा पुरवा केन नदी किनारे बसा था। बाढ़ में अक्सर प्रभावित होने पर 1979 में इसे ऊंचाई पर बसा दिया गया।
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लेकिन इस मजरे तक पहुंचने के लिए रास्ता नहीं है। यहां के बच्चे गांव की सीमा से सटे मध्य प्रदेश के चांदी पाटी गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि मजरा आने के लिए एमपी की सरहद पार कर आना पड़ता है। ऊंचाई पर बसे मजरे में आने-जाने का ऊबड़-खाबड़ कच्चा रास्ता है।
मतदाता इसी से होकर वोट डालने जाएंगे। प्रत्याशी भी मध्य प्रदेश की इसी भूमि से होकर वोट मांगने आ रहे हैं। कमोवेश यही स्थिति चित्रकूट जनपद के सीमावर्ती कई गांवों की है। मकानों और दीवारों में बंटे यूपी-एमपी के सरहद का पता लगाना मुश्किल होता है।
ग्रामीण बताते हैं कि मतदान के दिन सीमाएं सील हो जाने से कहीं आना-जाना रुक जाता है। मतदान भी प्रभावित होता है। बोड़ा पुरवा (यूपी) के ग्रामीणों की खेतीबाड़ी एमपी (छतरपुर) की जमीन में है।
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नरैनी तहसील एमपी की सीमा से जुड़ी है। करतल क्षेत्र के बिल्हरका गांव के बोड़ा पुरवा और विधुवा पुरवा में यूपी-एमपी सीमा का जबरदस्त घालमेल है। आलम यह है कि घर का दरवाजा अगर यूपी की तरफ खुलता है तो पिछले कमरे के खपरैल का पानी एमपी में गिरता है।
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चांदी पाटी गांव के एक-दूसरे से सटे मकान भी सीमाओं में बंटे हैं। एक यूपी में तो दूसरा एमपी में। सरहद की इस घालमेल में यहां विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी और उनके प्रचारक प्रभावित हो रहे हैं। बोड़ा पुरवा केन नदी किनारे बसा था। बाढ़ में अक्सर प्रभावित होने पर 1979 में इसे ऊंचाई पर बसा दिया गया।
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लेकिन इस मजरे तक पहुंचने के लिए रास्ता नहीं है। यहां के बच्चे गांव की सीमा से सटे मध्य प्रदेश के चांदी पाटी गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि मजरा आने के लिए एमपी की सरहद पार कर आना पड़ता है। ऊंचाई पर बसे मजरे में आने-जाने का ऊबड़-खाबड़ कच्चा रास्ता है।
मतदाता इसी से होकर वोट डालने जाएंगे। प्रत्याशी भी मध्य प्रदेश की इसी भूमि से होकर वोट मांगने आ रहे हैं। कमोवेश यही स्थिति चित्रकूट जनपद के सीमावर्ती कई गांवों की है। मकानों और दीवारों में बंटे यूपी-एमपी के सरहद का पता लगाना मुश्किल होता है।
ग्रामीण बताते हैं कि मतदान के दिन सीमाएं सील हो जाने से कहीं आना-जाना रुक जाता है। मतदान भी प्रभावित होता है। बोड़ा पुरवा (यूपी) के ग्रामीणों की खेतीबाड़ी एमपी (छतरपुर) की जमीन में है।