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बुंदेलखंड: मोदी, योगी और शाह भी न बचा सके साख
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बांदा। कहते हैं कि जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो कोई क्या कर सकता है। चुनाव परिणाम के बाद बुंदेलखंड की तीनों सीटों के भाजपा प्रत्याशियों पर नजर डाले तो उक्त लाइनें एकदम सटीक बैठती हैं। तभी तो जिन सीटों पर प्रधानमंत्री मोदी, मुख्यमंत्री योगी और गृहमंत्री अमित शाह सरीखे दिग्गजों ने सभाएं की हो, वहां से पार्टी का सूपड़ा ही साफ हो जाए, किसने सोचा था।
बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट हो या फिर जालौन-भोगनीपुर-गरौठा व हमीरपुर-महोबा-तिंदवारी तीनों के निवर्तमान सांसदों के खिलाफ मतदाताओं में जबरदस्त नाराजगी दिखी। तीनों पूर्व सांसदों ने सिर्फ मोदी-योगी की योजनाओं का बखान करते हुए अपना लंबा कार्यकाल बिता दिया। चुनाव के वक्त जब दिग्गज जनता के बीच आए तो बहुत देर हो चुकी थी, लिहाजा एक भी सीट पर पार्टी के लिए तरस गई। तीनों ही सीटों पर दिग्गजों की जुबान पर भी मुद्दों की बात कम और विरोधियों पर प्रहार अधिक रहे।
बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट
झोली तक फैलाई पर जीत न हासिल हो पाई
इस सीट से भाजपा ने अपनी प्रतिष्ठा सी जोड़ रखी थी। यही वजह थी कि यहां पर मुख्यमंत्री योगी को एक नहीं बल्कि दो-दो बार जनसभा के लिए आना पड़ा। दोनों डिप्टी सीएम केशव मौर्य और ब्रजेश पाठक ने भी बांदा और चित्रकूट में सभाएं कर रूठे मतदाताओं को मनाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक तीर कमान से छूट चुका था। बिगड़ते समीकरण देख चुनाव प्रचार के अंतिम दिन खुद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जीआईसी मैदान का मंच संभाला और मतदाताओं के बीच झोली फैलाते हुए कहा था कि इस बार प्रत्याशी को जिता दो, वादा करते हैं कि वह उसे बड़ा आदमी बना देंगे। मगर जनता दिग्गजों से नहीं वह तो प्रत्याशी से ही नाराज थी, लिहाजा शाह का यूं झोली फैलाना भी व्यर्थ ही रहा।
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हमीरपुर-महोबा तिंदवारी संसदीय सीट
संविधान पर सफाई भी काम न आई
दो बार लगातार सांसद रहे पुष्पेंद्र सिंह चंदेल की साख बचाने और उन्हें हैट्रिक पर ले जाने के लिए समूचे बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकमात्र जनसभा इसी सीट की राठ विधानसभा में की। उन्होंने लोधी मतदाताओं को साधने का प्रयास करने के साथ-साथ संविधान पर सफाई देते हुए कहा कि कोई उसे खत्म करने नहीं जा रहा है। कहा कि यदि गठबंधन की सरकार बनीं तो जरूर आपकी संपत्ति आपसे छीनकर आरक्षण के नाम पर बांट दी जाएगी।
मतदाताओं की मानें तो उन्हें राष्ट्रीय मुद्दों से कोई सरोकार नहीं था। यदि प्रत्याशी ही पांच साल लापता होने के लिए मोदी के मंच से माफी ही मांग लेते तो बहुत था, मगर न कुछ ऐसा हुआ और न ही सीट पर भाजपा का जादू चल सका।
जालौन-भोगनीपुर-गरौंठा संसदीय सीट
जनसभा में ही मिल गए थे हार के संकेत
बुंदेलखंड की सबसे अहम इस संसदीय सीट को जीतने के लिए भी भाजपा ने पूरा जोर लगाया था। यहीं के रहने वाले सूबे में मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने न सिर्फ कैंप किया, बल्कि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी मतदाताओं पर डोरे डाले। आखिरी में खुद सीएम योगी ने जीआईसी में सभा रखी थी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
यहां के प्रत्याशी व केंद्र में मंत्री भानुप्रताप के खिलाफ लोगों में इस कदर नाराजगी थी कि योगी की सभा में मतदाता कम, पुलिस और भाजपाई ही नजर आए थे। यही से मतदाताओं ने भाजपा को हराने का संकेत दे दिया था। इसके बाद से ही कई भाजपाई तो घर बैठ गए थे। प्रत्याशी ने भी किसी रूठे नेता व मतदाताओं को मनाने का कोई प्रयास नहीं किया। लिहाजा हार का सामना करना पड़ा।
गठबंधन से अखिलेश ही पड़े दिग्गजों पर भारी
एक ओर भाजपा के दोहराए गए प्रत्याशियों से नाराजगी तो दूसरी ओर गठबंधन से पूर्व सीएम अखिलेश यादव की ओर से से मुद्दों की बात करना भी एक वजह थी कि भाजपा का विरोधी वोट बिखरने के बजाए एकतरफा सपा प्रत्याशियों की झोली में जा गिरा। अखिलेश ने जालौन में वहां के भाजपा प्रत्याशी पर ही विकास न होने का ठीकरा फोड़ा तो वहीं बांदा सीट पर पेपर लीक कराने में सरकार का हाथ होने की बात कहकर युवाओं की दुखती रग को पकड़ा।
उन्होंने भाजपा पर संविधान को खत्म करने की मंशा रखने का आरोप लगाया। साथ ही बुंदेलखंड की पानी की समस्या उठाई तो भाजपा के लोगों को खनन माफिया तक कहा। उनके यही भाषण भाजपा के दिग्गजों पर भारी पड़े और तीनों सीटों पर गठबंधन की जीत हुई।
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बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट हो या फिर जालौन-भोगनीपुर-गरौठा व हमीरपुर-महोबा-तिंदवारी तीनों के निवर्तमान सांसदों के खिलाफ मतदाताओं में जबरदस्त नाराजगी दिखी। तीनों पूर्व सांसदों ने सिर्फ मोदी-योगी की योजनाओं का बखान करते हुए अपना लंबा कार्यकाल बिता दिया। चुनाव के वक्त जब दिग्गज जनता के बीच आए तो बहुत देर हो चुकी थी, लिहाजा एक भी सीट पर पार्टी के लिए तरस गई। तीनों ही सीटों पर दिग्गजों की जुबान पर भी मुद्दों की बात कम और विरोधियों पर प्रहार अधिक रहे।
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बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट
झोली तक फैलाई पर जीत न हासिल हो पाई
इस सीट से भाजपा ने अपनी प्रतिष्ठा सी जोड़ रखी थी। यही वजह थी कि यहां पर मुख्यमंत्री योगी को एक नहीं बल्कि दो-दो बार जनसभा के लिए आना पड़ा। दोनों डिप्टी सीएम केशव मौर्य और ब्रजेश पाठक ने भी बांदा और चित्रकूट में सभाएं कर रूठे मतदाताओं को मनाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक तीर कमान से छूट चुका था। बिगड़ते समीकरण देख चुनाव प्रचार के अंतिम दिन खुद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जीआईसी मैदान का मंच संभाला और मतदाताओं के बीच झोली फैलाते हुए कहा था कि इस बार प्रत्याशी को जिता दो, वादा करते हैं कि वह उसे बड़ा आदमी बना देंगे। मगर जनता दिग्गजों से नहीं वह तो प्रत्याशी से ही नाराज थी, लिहाजा शाह का यूं झोली फैलाना भी व्यर्थ ही रहा।
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हमीरपुर-महोबा तिंदवारी संसदीय सीट
संविधान पर सफाई भी काम न आई
दो बार लगातार सांसद रहे पुष्पेंद्र सिंह चंदेल की साख बचाने और उन्हें हैट्रिक पर ले जाने के लिए समूचे बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकमात्र जनसभा इसी सीट की राठ विधानसभा में की। उन्होंने लोधी मतदाताओं को साधने का प्रयास करने के साथ-साथ संविधान पर सफाई देते हुए कहा कि कोई उसे खत्म करने नहीं जा रहा है। कहा कि यदि गठबंधन की सरकार बनीं तो जरूर आपकी संपत्ति आपसे छीनकर आरक्षण के नाम पर बांट दी जाएगी।
मतदाताओं की मानें तो उन्हें राष्ट्रीय मुद्दों से कोई सरोकार नहीं था। यदि प्रत्याशी ही पांच साल लापता होने के लिए मोदी के मंच से माफी ही मांग लेते तो बहुत था, मगर न कुछ ऐसा हुआ और न ही सीट पर भाजपा का जादू चल सका।
जालौन-भोगनीपुर-गरौंठा संसदीय सीट
जनसभा में ही मिल गए थे हार के संकेत
बुंदेलखंड की सबसे अहम इस संसदीय सीट को जीतने के लिए भी भाजपा ने पूरा जोर लगाया था। यहीं के रहने वाले सूबे में मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने न सिर्फ कैंप किया, बल्कि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी मतदाताओं पर डोरे डाले। आखिरी में खुद सीएम योगी ने जीआईसी में सभा रखी थी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
यहां के प्रत्याशी व केंद्र में मंत्री भानुप्रताप के खिलाफ लोगों में इस कदर नाराजगी थी कि योगी की सभा में मतदाता कम, पुलिस और भाजपाई ही नजर आए थे। यही से मतदाताओं ने भाजपा को हराने का संकेत दे दिया था। इसके बाद से ही कई भाजपाई तो घर बैठ गए थे। प्रत्याशी ने भी किसी रूठे नेता व मतदाताओं को मनाने का कोई प्रयास नहीं किया। लिहाजा हार का सामना करना पड़ा।
गठबंधन से अखिलेश ही पड़े दिग्गजों पर भारी
एक ओर भाजपा के दोहराए गए प्रत्याशियों से नाराजगी तो दूसरी ओर गठबंधन से पूर्व सीएम अखिलेश यादव की ओर से से मुद्दों की बात करना भी एक वजह थी कि भाजपा का विरोधी वोट बिखरने के बजाए एकतरफा सपा प्रत्याशियों की झोली में जा गिरा। अखिलेश ने जालौन में वहां के भाजपा प्रत्याशी पर ही विकास न होने का ठीकरा फोड़ा तो वहीं बांदा सीट पर पेपर लीक कराने में सरकार का हाथ होने की बात कहकर युवाओं की दुखती रग को पकड़ा।
उन्होंने भाजपा पर संविधान को खत्म करने की मंशा रखने का आरोप लगाया। साथ ही बुंदेलखंड की पानी की समस्या उठाई तो भाजपा के लोगों को खनन माफिया तक कहा। उनके यही भाषण भाजपा के दिग्गजों पर भारी पड़े और तीनों सीटों पर गठबंधन की जीत हुई।