एंबुलेंस की राह आसान
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हर व्यक्ति के जीवन को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। यही वजह है कि एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड इत्यादि वाहनों का सड़क से गुजरने का हक पहले होता है, पर जाम और कुछ वाहनों व राहगीरों की हठधर्मी इन वाहनों की राह में रोड़ा बन रही है। दुर्घटना में गंभीर घायल या गंभीर मरीज समय से अस्पताल नहीं पहुंच पाते और मौत हो जाती है। एंबुलेंस को रास्ता न देने वालों को यह सोचना चाहिए कि अगर वह रास्ता नहीं देंगे तो कभी उन्हें या उनके परिवार के लिए यह अप्रिय स्थिति आई तो उन्हें कौन रास्ता देगा? अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एंबुलेंस को रास्ता न देने पर मरीज की मौत को अपराध मानते हुए कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
पूरी दुनिया में एंबुलेंस को सड़क पर चलने का पहला हक हासिल है, ताकि उस पर ले जाए जा रहे मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाकर जान बचाई जा सके, पर महानगरों की कौन कहे बांदा जैसे शहर में भी चरमरा गई ट्रैफिक व्यवस्था में आए दिन एंबुलेंस फंस रही है। अक्सर हो रही इन घटनाओं पर ही हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि दो माह तक यातायात माह अभियान चलाकर लोगों को ट्रैफिक के तौरतरीके बताएं।
सड़क किनारे या सार्वजनिक स्थानों पर वाहन खड़ा करने से रोकें। सड़क, फुटपाथ और सर्विस लेन हर हाल में खाली रखी जाए। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रैफिक सिग्नल या जरूरी होने पर यातायात रोकने की दशा में यह सुनिश्चित किया जाए कि एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड की गाड़ियां बिना किसी रुकावट के निकल सकें। रिहायशी और कामर्शियल स्थानों में जहां पार्किंग न होने से जहां लोग अपने वाहन सड़कों पर खड़ा करते हैं, उन पर बड़ा जुर्माना लगाया जाए। यह भी कहा कि अस्पताल परिसर में तेज ध्वनि का कोई यंत्र नहीं बजाया जाएगा।
अन्य कार्य पर रजिस्ट्रेशन होगा निरस्त
कुछ राज्यों में एंबुलेंस की राह में रोड़ा बनने वालों पर जुर्माने का प्रावधान है। दिल्ली में एंबुलेंस की रास्ता रोकने वाले वाहन चालक पर 2000 रुपये जुर्माना किया जाता है। साथ ही अस्पताल में उस वाहन का नंबर और तारीख आदि दर्ज कर ली जाती है। उधर, बांदा के एआरटीओ (प्रशासन) राजेश वर्मा ने बताया कि एंबुलेंस संचालन के लिए डाक्टर द्वारा दिया गया अधिकार पत्र होना चाहिए। वाहन का फिटनेस होना चाहिए। एंबुलेंस में स्ट्रेचर, फर्स्ट एड बाक्स, आक्सीजन सिलिंडर आदि अनिवार्य रूप से होना चाहिए। बताया कि यह सारी सुविधाओं के बाद ही उनके विभाग में एंबुलेंस का रजिस्ट्रेशन किया जाता है। एंबुलेंस प्राइवेट हो या सरकारी। सभी पर यह नियम लागू है। एंबुलेंस पर कोई शुल्क नहीं लगता। सिर्फ फिटनेस और रजिस्ट्रेशन फीस जमा होती है। बताया कि मरीजों को लाने और ले जाने के अलावा किसी अन्य कार्य में प्रयोग करने पर एंबुलेंस का चालान होगा और रजिस्ट्रेशन निरस्त किया जा सकता है। ब्यूरो
राह में रुकावटों की कहानी, एंबुलेंस चालकों की जुबानी
एंबुलेंस चालक रीशू साहू ने बताया कि सड़क पर एंबुलेंसों को अन्य वाहन या राहगीर तरजीह नहीं देते। छोटे वाहन तो हटते ही नहीं, जिससे अक्सर एंबुलेंस अस्पताल तक पहुंचने में लेट-लतीफ हो जाती है। इसका खामियाजा मरीज को भुगतना पड़ता है। एंबुलेंस चालक नफीस का कहना था कि ट्रैफिक और सिविल पुलिस भी एंबुलेंस को प्राथमिकता पर आगे बढ़वाने में अक्सर तवज्जो नहीं देती। उनका बर्ताव भी एंबुलेंस के साथ भी अन्य वाहनों जैसा होता है। दूर से खड़े तमाशा देखते रहते हैं।
चालकों ने बताया कि एक हफ्ते पहले गौरिहार (छतरपुर) की महिला मरीज रजनी को एंबुलेंस पर लेकर कानपुर जा रहे थे। कानपुर के रामा देवी के नजदीक रेलवे क्रासिंग पर जाम में फंसने से अस्पताल पहुंचने में आधा घंटा देरी हो गई। तब तक मरीज की मौत हो गई। डाक्टरों का कहना था कि आधा घंटा पहले मरीज आ जाता तो बचाया जा सकता था। ब्यूरो