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आदिवासियों को नहीं पता केन-बेतवा की हकीकत
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
Updated Sun, 23 Oct 2016 11:38 PM IST
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गांव में बातचीत करते पर्यावरण विद्
- फोटो : अमर उजाला
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बांदा। एक दशक पूर्व तैयार की गई केन-बेतवा लिंक परियोजना का सोमवार को महोबा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही शिलान्यास कर दें लेकिन योजना में शामिल किए जा रहे बुंदेलखंड के 10 गांवों के आदिवासी बाशिंदों को अभी भी योजना की पूरी हकीकत नहीं पता। उन्हें तो बस इतना मालूम है कि उन्हें उजाड़ा जा रहा है। मुआवजे की बात भी अभी साफ नहीं है। उधर, प्रधानमंत्री के आगमन से दो दिन पूर्व इन गांवों में कई पर्यावरण विशेषज्ञों और स्वयंसेवियों ने भ्रमण कर ग्रामीणों की नब्ज टटोली।
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योजना में बुंदेलखंड के 10 गांव डोड़न, भोरखोहा, गुधरी, बसुधा, कूपी, सुखवाहा, शाहपुर, मैनारी, पलकोहा और खड़िहानी में 90 फीसदी आदिवासी आबाद हैं। इनके जीने का पूरा दारोमदार जंगली फल और लकड़ी व कुछ कृषि है। केन-बेतवा गठजोड़ में यह गांव खत्म हो जाएंगे। राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण इन गांवों समेत पन्ना टाईगर के अंदर डोड़न गांव में बांध बनाएगा। योजना क्षेत्र के गांवों का भ्रमण कर रविवार को लौटे बुंदेलखंड के समाजसेवी आशीष सागर ने बताया कि डोड़न गांव में आदिवासी उमाशंकर, पूर्व प्रधान वीर सिंह, पलकोहा गांव की महिला प्रधान जमुना ओमरे और सुखवाहा गांव के जगन्नाथ यादव व बलवीर सिंह आदि ने बताया कि उनकी जमीन योजना में ली जा रही है लेकिन उन्हें आज तक नहीं बताया गया कि यह योजना क्या है? न ही डीपीआर रिपोर्ट दिखाई गई।
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नाराज ग्रामीणों ने कहा कि जब हम ही न रहेंगे तो गांव और देश का कैसा विकास? उन्होंने कहा कि उजाड़े जा रहे परिवारों को प्रति परिवार 40 लाख रुपये मुआवजा और पांच एकड़ जमीन दी जाए। इन ग्रामीणों से स्वयंसेवी कुमकुम दास गुप्ता और पंकज जायसवाल ने भी बात की। आशीष सागर ने बताया कि आदिवासियों पर वन विभाग कहर ढा रहा है। नदी से उन्हें मछली पकड़ने और जंगल से लकड़ी लेने पर रोक लगा दी है। शाम छह बजे के बाद घर में आने-जाने नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि सपा और भाजपा में बांधों की राजनीति चल रही है। चार दिनों पूर्व प्रदेश के तत्कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव महोबा आकर लहचुरा बांध का लोकार्पण कर गए। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केन-बेतवा गठजोड़ का शिलान्यास कर सकते हैं।
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