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कालिंजर दुर्ग के लिए जागी उम्मीद
Banda
Updated Wed, 27 Jun 2012 12:00 PM IST
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बांदा। बुंदेलखंड का प्रसिद्ध और अजेय दुर्ग कालिंजर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने के प्रदेश सरकार के फैसले पर एक बार फिर इस ऐतिहासिक धरोहर के दिन बहोरने की किरण जाग उठी है। मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव ने किले और आसपास क्षेत्र को पर्यटन रूप में विकसित करने के निर्देश दिए हैं।
वैसे तो कालिंजर में वो सब कुछ है जो पर्यटकों और खासकर विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए काफी होता है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने पहाड़ पर बने इस शानदार दुर्ग को विश्व पर्यटक स्थल के रूप में उबारने के लिए कुछ खास तवज्जो नहीं दी। कालिंजर का उल्लेख वेदों, महाकाव्यों, पुराणों और तमाम प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में है। कहते हैं कि समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे। उनमें एक काल कूट हलाहल भी था। इस घातक विष से सुर-असुर दोनों को घातक संकट उत्पन्न हो गया। तब भगवान शंकर ने इसका पान कर इसकी तीव्रता को शांत कर दिया। जब वो कैलाश पर्वत की ओर जाने लगे तब काल कूट का प्रभाव उन्हें अशांत करने लगा। इसी समय वह कालिंजर पर्वत पर तलहटी पर पहुंचे तो इसकी सुरम्यता से उन्हें अति काल कूट प्रभाव से शांति मिली। इससे प्रसन्न होकर शंकर जी ने उत्तर पूर्व की पहाड़ी पर आसन जमा लिया और विष तीव्रता से मुक्ति पा गए। शंकर जी ने काल का इस स्थान पर क्षरण किया इसलिए इसका नाम कालंजर पड़ा। बाद में यह नाम कालिंजर पड़ गया।
चंदेलकालीन कालिंजर किले में शिला पटों की काफी संख्या है। इनमें ऐतिहासिक स्थलों और घटनाओं का वर्णन है। यह कई बार आक्रमणकारियों का शिकार बना। इससे यहां की तमाम कलाकृतियां नष्ट हो गईं। केवल चंदेलकालीन मूर्तियां और धर्म स्थल शेष रह गए हैं। यह दुर्ग अभेद दुर्ग था। सबसे प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव का मंदिर है। धार्मिक दृष्टिकोण के अतिरिक्त यह रचना शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका निर्माण एक गुफा के अंदर किया गया है।
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वैसे तो कालिंजर में वो सब कुछ है जो पर्यटकों और खासकर विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए काफी होता है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने पहाड़ पर बने इस शानदार दुर्ग को विश्व पर्यटक स्थल के रूप में उबारने के लिए कुछ खास तवज्जो नहीं दी। कालिंजर का उल्लेख वेदों, महाकाव्यों, पुराणों और तमाम प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में है। कहते हैं कि समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे। उनमें एक काल कूट हलाहल भी था। इस घातक विष से सुर-असुर दोनों को घातक संकट उत्पन्न हो गया। तब भगवान शंकर ने इसका पान कर इसकी तीव्रता को शांत कर दिया। जब वो कैलाश पर्वत की ओर जाने लगे तब काल कूट का प्रभाव उन्हें अशांत करने लगा। इसी समय वह कालिंजर पर्वत पर तलहटी पर पहुंचे तो इसकी सुरम्यता से उन्हें अति काल कूट प्रभाव से शांति मिली। इससे प्रसन्न होकर शंकर जी ने उत्तर पूर्व की पहाड़ी पर आसन जमा लिया और विष तीव्रता से मुक्ति पा गए। शंकर जी ने काल का इस स्थान पर क्षरण किया इसलिए इसका नाम कालंजर पड़ा। बाद में यह नाम कालिंजर पड़ गया।
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चंदेलकालीन कालिंजर किले में शिला पटों की काफी संख्या है। इनमें ऐतिहासिक स्थलों और घटनाओं का वर्णन है। यह कई बार आक्रमणकारियों का शिकार बना। इससे यहां की तमाम कलाकृतियां नष्ट हो गईं। केवल चंदेलकालीन मूर्तियां और धर्म स्थल शेष रह गए हैं। यह दुर्ग अभेद दुर्ग था। सबसे प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव का मंदिर है। धार्मिक दृष्टिकोण के अतिरिक्त यह रचना शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका निर्माण एक गुफा के अंदर किया गया है।
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