{"_id":"6400e7a8add037207108da34","slug":"tigers-roar-echoed-again-in-sohelwa-balrampur-news-c-13-1-111408-2023-03-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Balrampur News: सोहेलवा में फिर गूंजी टाइगर की दहाड़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Balrampur News: सोहेलवा में फिर गूंजी टाइगर की दहाड़
Thu, 02 Mar 2023 11:45 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Thu, 02 Mar 2023 11:45 PM IST
विज्ञापन
बलरामपुर के सोहेलवा जंगल स्थित प्राकृतिक जलाशय में कलरव करते पक्षी
बलरामपुर। नेपाल सीमा से सटे सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में एक बार फिर टाइगर की दहाड़ गूंजने लगी है। कभी राॅयल बंगाल टाइगर का प्राकृतवास माने गए सोहेलवा जंगल में पिछले एक दशक से टाइगर की आवाज खामोश थी। जनवरी में जंगल की निगरानी के लिए लगाए गए 400 ट्रैकिंग कैमरे में तीन टाइगर दिखे हैँ। ट्रैकिंग कैमरों का डाटा वन्यजीव संस्थान देहरादून को सत्यापन के लिए भेज दिया गया।
भारत-नेपाल सीमा पर 452 वर्ग किलोमीटर में फैला सोहेलवा जंगल वन्यजीवों को केंद्र है। पर्यावरणविद डॉ. नागेंद्र सिंह कहते हैं कि दो दशक पहले सोहेलवा में 10 से अधिक टाइगर थे। इनकी दहाड़ से आसपास के गांव गूंजते थे। वक्त बदला, परिवेश बदला तो टाइगर की आवाज गुम होती चली गई। वनों की कटान ने इसमें अहम भूमिका निभाई। पिछले एक दशक से सोहेलवा जंगल में टाइगर की सक्रियता नहीं नजर आई।
डीएफओ डॉ. सेम्मारन एम का कहना है कि अक्तूबर में सोहेलवा जंगल में 400 ट्रैकिंग कैमरे लगाए गए थे। इसमें तीन टाइगर दिखे हैं। जिसको लेकर अब विभाग सक्रिय हो गया है। कई स्तर पर निगरानी की जा रही है। कैमरे भी बढ़ाए जा रहे हैं। सोहेलवा को टाइगर रिजर्व क्षेत्र घोषित कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
विज्ञापन
तेंदुए की है अधिकता
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में तेंदुए की संख्या लगातार बढ़ रही है। कैमरे की निगरानी में पाया गया कि 60 से अधिक तेंदुआ, 153 हिरन, 1047 चीतल, 1160 जंगली सूकर, 9 फिशिंग कैट, 819 नीलगाय, 17 घुरल, 103 सांभर, 2413 लंगूर, 3385 बंदर व 61 लकड़बग्घा सहित कई अन्य प्रजाति के वन्यजीव रहते हैं। इसके अतिरिक्त दुलर्भ प्रजाति के पक्षियों का कलरव भी गूंजता रहता है। गिद्धों का भी यहां पर वास है।
यह भी है विशेषता
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में जटिल रोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली तमाम तरह की औषधीय जड़ी बूटियां भी पाईं जाती हैं। कटनीम, वन तुलसी, अकोन, वन मुसरिया, फाकरन, बेदूं, सतावर, करौंदा, सर्पगंधा, मूसली सहित अन्य पौधे यहां पर मिलते हैं। साल, अर्जुन, कचनार, कंजी, हर्र, बहेड़ा, कुसुम, सिरस, खैर, गूलर, महुआ, सागौन व सेमल की भी बहुतायत हैं। ऊला, कांस, खस, कांवर, कुश, कचुआ, खरिया घास भी प्रमुख रूप से हैं। यहां के जलाशयों में कछुआ, घड़ियाल के रहने का दावा किया जा रहा है।
हर साल आते हैं प्रवासी पक्षी
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में स्थित भगवानपुर, चित्तौड़गढ़ व कोहरगड्डी आदि जलाशयों में साइबेरिया के अतिरिक्त कांगड़ा, लद्ददाख, चीन व तिब्बत से सिखपर, बारहेडेड गूज, लालसर, सुर्खाब, गैडवल, डारटर आदि विभिन्न प्रकार के पक्षी नवंबर में आते हैं। मार्च तक यह जलाशयों में कलरव करते हैं।
विज्ञापन
भारत-नेपाल सीमा पर 452 वर्ग किलोमीटर में फैला सोहेलवा जंगल वन्यजीवों को केंद्र है। पर्यावरणविद डॉ. नागेंद्र सिंह कहते हैं कि दो दशक पहले सोहेलवा में 10 से अधिक टाइगर थे। इनकी दहाड़ से आसपास के गांव गूंजते थे। वक्त बदला, परिवेश बदला तो टाइगर की आवाज गुम होती चली गई। वनों की कटान ने इसमें अहम भूमिका निभाई। पिछले एक दशक से सोहेलवा जंगल में टाइगर की सक्रियता नहीं नजर आई।
विज्ञापन
डीएफओ डॉ. सेम्मारन एम का कहना है कि अक्तूबर में सोहेलवा जंगल में 400 ट्रैकिंग कैमरे लगाए गए थे। इसमें तीन टाइगर दिखे हैं। जिसको लेकर अब विभाग सक्रिय हो गया है। कई स्तर पर निगरानी की जा रही है। कैमरे भी बढ़ाए जा रहे हैं। सोहेलवा को टाइगर रिजर्व क्षेत्र घोषित कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
विज्ञापन
तेंदुए की है अधिकता
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में तेंदुए की संख्या लगातार बढ़ रही है। कैमरे की निगरानी में पाया गया कि 60 से अधिक तेंदुआ, 153 हिरन, 1047 चीतल, 1160 जंगली सूकर, 9 फिशिंग कैट, 819 नीलगाय, 17 घुरल, 103 सांभर, 2413 लंगूर, 3385 बंदर व 61 लकड़बग्घा सहित कई अन्य प्रजाति के वन्यजीव रहते हैं। इसके अतिरिक्त दुलर्भ प्रजाति के पक्षियों का कलरव भी गूंजता रहता है। गिद्धों का भी यहां पर वास है।
यह भी है विशेषता
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में जटिल रोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली तमाम तरह की औषधीय जड़ी बूटियां भी पाईं जाती हैं। कटनीम, वन तुलसी, अकोन, वन मुसरिया, फाकरन, बेदूं, सतावर, करौंदा, सर्पगंधा, मूसली सहित अन्य पौधे यहां पर मिलते हैं। साल, अर्जुन, कचनार, कंजी, हर्र, बहेड़ा, कुसुम, सिरस, खैर, गूलर, महुआ, सागौन व सेमल की भी बहुतायत हैं। ऊला, कांस, खस, कांवर, कुश, कचुआ, खरिया घास भी प्रमुख रूप से हैं। यहां के जलाशयों में कछुआ, घड़ियाल के रहने का दावा किया जा रहा है।
हर साल आते हैं प्रवासी पक्षी
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग में स्थित भगवानपुर, चित्तौड़गढ़ व कोहरगड्डी आदि जलाशयों में साइबेरिया के अतिरिक्त कांगड़ा, लद्ददाख, चीन व तिब्बत से सिखपर, बारहेडेड गूज, लालसर, सुर्खाब, गैडवल, डारटर आदि विभिन्न प्रकार के पक्षी नवंबर में आते हैं। मार्च तक यह जलाशयों में कलरव करते हैं।