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Balrampur News: भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध का विशेष महत्व
Wed, 28 Oct 2026 11:01 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Wed, 28 Oct 2026 11:01 PM IST
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बलरामपुर। एमएलके महाविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग की ओर से बुधवार को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं गुरु-शिष्य संबंध’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता बताते हुए गुरु-शिष्य संबंधों में श्रद्धा, अनुशासन और चिंतन की भूमिका पर प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. जेपी पांडेय, मुख्य वक्ता एवं विभागाध्यक्ष डॉ. स्वदेश भट्ट, कार्यक्रम समन्वयक प्रो. दिनेश कुमार मौर्य तथा कार्यक्रम संयोजक लेफ्टिनेंट डॉ. देवेंद्र कुमार चौहान ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया।
प्राचार्य प्रो. जेपी पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक और बौद्धिक विरासत है। वेदों, उपनिषदों, पांडुलिपियों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से यह विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा विज्ञान, कला, साहित्य, गणित और खगोल विज्ञान सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने का समग्र दृष्टिकोण प्रदान करती है।
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मुख्य वक्ता एवं विभागाध्यक्ष डॉ. स्वदेश भट्ट ने कहा कि भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध केवल किताबी ज्ञान के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चरित्र निर्माण, आत्मबोध और व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया भी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार और नैतिक मूल्यों का विकास करना भी है। गुरु-शिष्य संबंधों को मजबूत बनाने के लिए श्रद्धा, अनुशासन और चिंतन आवश्यक हैं।
कार्यक्रम समन्वयक प्रो. दिनेश कुमार मौर्य ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन डॉ. श्रीनारायण सिंह ने किया। इस अवसर पर स्नातक एवं परास्नातक के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. जेपी पांडेय, मुख्य वक्ता एवं विभागाध्यक्ष डॉ. स्वदेश भट्ट, कार्यक्रम समन्वयक प्रो. दिनेश कुमार मौर्य तथा कार्यक्रम संयोजक लेफ्टिनेंट डॉ. देवेंद्र कुमार चौहान ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया।
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प्राचार्य प्रो. जेपी पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक और बौद्धिक विरासत है। वेदों, उपनिषदों, पांडुलिपियों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से यह विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा विज्ञान, कला, साहित्य, गणित और खगोल विज्ञान सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने का समग्र दृष्टिकोण प्रदान करती है।
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मुख्य वक्ता एवं विभागाध्यक्ष डॉ. स्वदेश भट्ट ने कहा कि भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध केवल किताबी ज्ञान के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चरित्र निर्माण, आत्मबोध और व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया भी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार और नैतिक मूल्यों का विकास करना भी है। गुरु-शिष्य संबंधों को मजबूत बनाने के लिए श्रद्धा, अनुशासन और चिंतन आवश्यक हैं।
कार्यक्रम समन्वयक प्रो. दिनेश कुमार मौर्य ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन डॉ. श्रीनारायण सिंह ने किया। इस अवसर पर स्नातक एवं परास्नातक के विद्यार्थी उपस्थित रहे।