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Balrampur News: नेपाल तक मशहूर थारू जनजाति की अलबेली होली
Thu, 26 Feb 2026 11:13 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Thu, 26 Feb 2026 11:13 PM IST
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बलरामपुर के जरवा में होली खेलते थारू समाज के युवा ।-फाइल फोटो
बलरामपुर। रंगों के पर्व होली काे अब कुछ दिन ही बचे हैं। ऐसे में महिलाओं, बुजुर्ग व बच्चों में गजब का उल्लास देखने को मिल रहा है। वैसे तो होली का पर्व सभी धूमधाम से मनाते हैं, लेकिन पचपेड़वा व गैसड़ी क्षेत्र में रहने वाली थारू जनजाति की अलबेली होली आसपास जनपदों के साथ नेपाल तक मशहूर है। होली का उत्सव देखने के लिए नेपाल से लोग थारू बहुल गांवों में आते हैं।
सोहेलवा जंगल के बीचोबीच भारत-नेपाल के सीमावर्ती गांवों में बसी थारू जनजाति की अनोखी होली का दौर वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है। वसंत पंचमी पर थारू गांवों में होलिका दहन स्थलों पर रेड़ के पेड़ की टहनी लगाकर जगह चिह्नित की जाती है। रेड़ के पेड़ की टहनी को गांव के अनाथ बच्चे लगाते हैं। अनाथ बच्चों के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए यह परंपरा है। होलिका दहन स्थल चिह्नित होने के बाद से ही गांवों में होली उत्सव का दौर शुरू हो जाता है।
टोली में लोग लोकगीत गाकर नाचते-गाते हैं। थारू गांव मोहकमपुर जरवा के अगरू और राघव राम थारू बताते हैं कि होलिका दहन की रात लोग अपने घरों से लाए उपले, घास-फूस और लकड़ी से होलिका जलाते हैं। होली वाले दिन सुबह गांव की लोकगीत मंडली प्रत्येक घर से गुड़ और चावल एकत्र करके होलिका में डालती है। इसके बाद होलिका की राख अपने माथे और शरीर पर लगाते हैं। फिर राख, अबीर-गुलाल, मांस व शराब कुलदेवी को चढ़ाकर खुशहाली की कामना करते हैं। पूजन के बाद गुड़ और चावल का प्रसाद लोगों में बांटा जाता है, इसके बाद होली का उत्सव शुरू हो जाता है। थारू महिला लक्ष्मी और श्यामकली थारू का कहना है कि हमारी जनजाति की होली की परंपरा बेहद अनूठी है। कुलदेवी को मांस व शराब चढ़ाने का रिवाज सदियों पुराना है। होलिका दहन से लेकर रंग खेलने तक हर पल विशेष रहता है। यही परंपरा उनके समुदाय को अलग पहचान दिलाती है।
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सोहेलवा जंगल के बीचोबीच भारत-नेपाल के सीमावर्ती गांवों में बसी थारू जनजाति की अनोखी होली का दौर वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है। वसंत पंचमी पर थारू गांवों में होलिका दहन स्थलों पर रेड़ के पेड़ की टहनी लगाकर जगह चिह्नित की जाती है। रेड़ के पेड़ की टहनी को गांव के अनाथ बच्चे लगाते हैं। अनाथ बच्चों के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए यह परंपरा है। होलिका दहन स्थल चिह्नित होने के बाद से ही गांवों में होली उत्सव का दौर शुरू हो जाता है।
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टोली में लोग लोकगीत गाकर नाचते-गाते हैं। थारू गांव मोहकमपुर जरवा के अगरू और राघव राम थारू बताते हैं कि होलिका दहन की रात लोग अपने घरों से लाए उपले, घास-फूस और लकड़ी से होलिका जलाते हैं। होली वाले दिन सुबह गांव की लोकगीत मंडली प्रत्येक घर से गुड़ और चावल एकत्र करके होलिका में डालती है। इसके बाद होलिका की राख अपने माथे और शरीर पर लगाते हैं। फिर राख, अबीर-गुलाल, मांस व शराब कुलदेवी को चढ़ाकर खुशहाली की कामना करते हैं। पूजन के बाद गुड़ और चावल का प्रसाद लोगों में बांटा जाता है, इसके बाद होली का उत्सव शुरू हो जाता है। थारू महिला लक्ष्मी और श्यामकली थारू का कहना है कि हमारी जनजाति की होली की परंपरा बेहद अनूठी है। कुलदेवी को मांस व शराब चढ़ाने का रिवाज सदियों पुराना है। होलिका दहन से लेकर रंग खेलने तक हर पल विशेष रहता है। यही परंपरा उनके समुदाय को अलग पहचान दिलाती है।
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