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Balrampur News: टाइगर रिजर्व बनने की राह पर सोहेलवा वन्यजीव अभयारण्य के बढ़े कदम

Wed, 18 Feb 2026 10:48 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 18 Feb 2026 10:48 PM IST
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Sohelwa Wildlife Sanctuary takes a step forward on the path to becoming a tiger reserve
बलरामपुर में ​स्थित सोहेलवा जंगल।-संवाद
बलरामपुर। देवीपाटन मंडल के जंगलों की पहचान बन चुका सोहेलवा वन्यजीव अभयारण्य प्रदेश का पांचवां टाइगर रिजर्व बनने का इंतजार पूरा होने वाला है। लगभग 452 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस वन क्षेत्र में 232 वर्ग किमी को कोर एरिया और 220 वर्ग किमी को बफर जोन के रूप में नामित किया गया है। जंगल का सर्वे भी पूरा हो चुका है।
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बीते वर्ष अप्रैल में हुई बाघ जनगणना की रिपोर्ट में पहली बार सोहेलवा में बाघों के फोटोग्राफिक प्रमाण मिलने से इसकी दावेदारी और मजबूत हुई है। इस बार हुए सर्वे की रिपोर्ट भी बनी है। अब सिर्फ एक अध्ययन टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद होने वाले बदलाव और प्रभाव का होना है। इसके लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को प्रस्ताव भेजा गया है।
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वर्ष 2022 की गणना में तीन बाघों की मौजूदगी दर्ज होने के बाद वन विभाग ने तैयारी शुरू की। वास्तविक संख्या का सटीक आकलन करने के लिए जनवरी 2026 में पुनः सर्वे हुआ, जो आठ फरवरी तक तीन चरणाें में चला। इसके लिए 700 से अधिक ट्रैकिंग कैमरे लगाए गए। सर्वे टीम सभी रिपोर्ट के साथ दिल्ली लौट गई है। सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग के तुलसीपुर, रामपुर, भाभर, बरहवा, पश्चिमी सोहेलवा, पूर्वी सोहेलवा समेत सातों रेंज क्षेत्रों में आर्थिक व सामाजिक सर्वेक्षण पूरा हो गया है।
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दिल्ली स्थित ग्लोबल टाइगर फोरम की तीन सदस्यीय टीम ने लगभग एक माह तक सीमावर्ती गांवों और वन क्षेत्रों में रहकर विस्तृत अध्ययन किया। इस सर्वे का उद्देश्य जंगलों पर ग्रामीण निर्भरता, वन्यजीवों की मौजूदगी, वन संपदा की स्थिति और मानव-वन्यजीव संबंधों की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तैयार करना था। माना जा रहा है कि टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने की प्रक्रिया मार्च 2026 तक आगे बढ़ेगी।
दुधवा मॉडल पर विकसित होगी जंगल सफारी

अभयारण्य क्षेत्र के जरवा इलाके में इको-टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया है, जिससे पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है। घने जंगलों की हरियाली, स्वच्छ आबोहवा और नेपाल की पहाड़ियों का दृश्य सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण बन रहा है। टाइगर रिजर्व के लिए संघर्ष कर रहे सर्वेश सिंह ने बताया कि इससे स्थानीय लोगों के लिए भी रोजगार के नए अवसर खोल रही है। पर्यटन संभावनाओं को देखते हुए यहां जंगल सफारी, होम-स्टे, बर्ड सिटिंग प्वाइंट, नेचर ट्रैक और बोटिंग जैसी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। मॉडल के रूप में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की तर्ज पर इको-टूरिज्म ढांचा खड़ा करने की तैयारी है। जंगल से सटे गांवों के लोगों को छोटे कॉटेज व होम-स्टे बनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा, जिससे स्थानीय आबादी की आय में वृद्धि होगी। वन क्षेत्र में लगभग 10 किलोमीटर लंबा नेचर ट्रैक विकसित करने की योजना है, जहां पर्यटक सुरक्षित दूरी से लंगूर, हिरन, भालू, बिज्जू, साही सहित अन्य वन्यजीवों को देख सकेंगे। यह ट्रैक पर्यावरण शिक्षा और प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण बनेगा।

टाइगर रिजर्व घोषित करने पूरे होते हैं मानक
टाइगर रिजर्व की मान्यता नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी की सिफारिश पर मिलती है।
तय मानक को सोहेलवा वन्यजीव अभ्यारण्य अब पूरा करता है।

जंगल का क्षेत्र सामान्यतः 300–500 वर्ग किमी या उससे अधिक क्षेत्र उपयुक्त माना जाता है।

कोर और बफर जोन का निर्धारण

बाघों की मौजूदगी के वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक होते हैं। केवल अनुमान नहीं, बल्कि दस्तावेजी साक्ष्य जरूरी है।

जैव विविधता और शिकार प्रजातियां का होना। ताकि बाघों के लिए प्राकृतिक भोजन शृंखला बनी रहे।
जंगल में स्थायी वॉटर होल, नदियां या तालाब हों तथा घास के मैदान (ग्रासलैंड) मौजूद हों।
कोर क्षेत्र में गांवों की संख्या कम हो या पुनर्वास की योजना हो, ताकि बाघों का प्राकृतिक मूवमेंट बाधित न हो।
एंटी-पोचिंग कैंप, वन रक्षक, ड्रोन/कैमरा ट्रैप, पेट्रोलिंग सिस्टम जैसी मजबूत सुरक्षा प्रणाली जरूरी है।


सोहेलवा वन्यजीव अभयारण्य की स्थिति

▪ कुल क्षेत्रफल – 452 वर्ग किमी

▪ कोर एरिया – 232 वर्ग किमी

▪ बफर जोन – 220 वर्ग किमी

▪ बाघों की दर्ज संख्या (2022) – 3

▪ वर्ष 2026 की गणना हो चुकी है।

▪ ट्रैकिंग कैमरे – 700 प्रस्तावित

▪ प्रमुख योजनाएं – जंगल सफारी, नेचर ट्रैक, बर्ड सिटिंग प्वाइंट, बोटिंग, होम-स्टे

▪ नेचर ट्रैक लंबाई – लगभग 10 किमी

▪ वन्यजीव प्रमुखता – बाघ, भालू, हिरन, लंगूर, बिज्जू, साही

▪ रोजगार फोकस – स्थानीय ग्रामीणों के लिए कॉटेज व होम-स्टे


परीक्षण के बाद आगे बढ़ेगी योजना
सोहेलवा वन्यजीव अभयारण्य सभी मानक पूरे करता है। इसकी रिपोर्ट भी बन चुकी है। अब एक अध्ययन इस बात का होना है, कि टाइगर रिजर्व से फायदा क्या होगा और इससे दुष्प्रभाव क्या हो सकता है। आम लोगों की सुरक्षा और संरक्षण के साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार की संभावनाओं का सर्वे जल्द ही पूरा होगा।
गौरव गर्ग, जिला प्रभागीय वनाधिकारी
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