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Balrampur News: हनुमान चालीसा व सुंदरकांड मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल

Tue, 28 Oct 2025 10:18 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर Updated Tue, 28 Oct 2025 10:18 PM IST
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Hanuman Chalisa and Sunderkand are included in the curriculum of Maa Pateshwari University.
बलरामपुर। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में ऐतिहासिक परिवर्तन किया है। विश्वविद्यालय ने पहली बार बलरामपुर की धरती के संत तुलसीदास की रचना ‘हनुमान चालीसा’ को स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
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विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह प्रसिद्ध रचना गोस्वामी तुलसीदास नहीं, बल्कि बलरामपुर के तुलसीदास की है, जिन्होंने इसे यहां की आध्यात्मिक भूमि पर रचा था। एमए प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में सुंदरकांड को जोड़ा गया है।
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कुलपति प्रोफेसर रविशंकर सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने हिंदी विभाग के पाठ्यक्रम को स्थानीयता से वैश्विकता की दृष्टि से नया रूप दिया है। अब विद्यार्थी सिर्फ साहित्य नहीं, अपनी मिट्टी की खुशबू और भाषा की आत्मा को भी महसूस करेंगे।
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कुलपति प्रो. सिंह का कहना है कि हमारा उद्देश्य शिक्षा को अपनी संस्कृति से जोड़ना है। जब विद्यार्थी अपनी भाषा और परंपरा को जानेंगे, तभी शिक्षा का वास्तविक अर्थ साकार होगा। बताया जाता है कि बलरामपुर के संत तुलसीदास ने अपने साधना काल में हनुमान चालीसा की रचना की थी। आज यह रचना करोड़ों भक्तों के लिए रक्षा कवच माना जाता है।
विश्वविद्यालय वित्त समिति के सदस्य सर्वेश सिंह ने कहाकि मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय का यह निर्णय न केवल पाठ्यक्रम को समृद्ध करेगा। बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश भी देगा कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही ज्ञान का वृक्ष फलता-फूलता है। यह पहल बलरामपुर को न सिर्फ तुलसी परंपरा से जोड़ेगी, बल्कि विश्वविद्यालय को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र भी बनाएगी। - संवाद

अवधी की सुगंध से सजेगा बीए का पाठ्यक्रम
बीए प्रथम वर्ष के हिंदी पाठ्यक्रम में अब विद्यार्थी ‘अयोध्या कांड’ (दोहा 28 से 41) के साथ ‘रामलला नहछू’ का अध्ययन करेंगे। यह कृति गोस्वामी तुलसीदास द्वारा गोंडा क्षेत्र की अवधी बोली में रचित है। विश्वविद्यालय स्तर पर यह पहली बार है जब स्थानीय अवधी रूप को इस तरह सम्मान मिला है। हिंदी पाठ्यक्रम समिति के पूर्व संयोजक प्रो. शैलेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय का यह निर्णय बताता है कि आधुनिक शिक्षा तभी पूर्ण है, जब उसमें संस्कृति, लोकभाषा और आध्यात्मिक चेतना का समावेश हो। यह कदम बलरामपुर को न केवल शैक्षणिक, बल्कि सांस्कृतिक मानचित्र पर भी नई पहचान देगा।

एमए में सुंदरकांड से मिलेगा भक्ति और काव्य का बोध
एमए प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में अब ‘सुंदरकांड’ को जोड़ा गया है। इससे छात्रों को तुलसीदास के काव्य कौशल, भाषा-सौंदर्य और भक्ति दर्शन की गहराई समझने का अवसर मिलेगा। विश्वविद्यालय का यह निर्णय विद्यार्थियों के लिए नई शैक्षणिक दृष्टि लेकर आया है।



‘रामलला नहछू’ और संत तुलसीदास को जानें
‘रामलला नहछू’ गोस्वामी तुलसीदास की अवधी में रचित बाललीला काव्य है, जिसमें बालक राम के नहाने, खेलने और स्नेहपूर्ण रूप का चित्रण है। यह रचना लोकभाषा की सहजता और भक्ति रस का जीवंत उदाहरण है। प्रोफेसर शैलेंद्र नाथ मिश्र के अनुसार, बलरामपुर के तुलसीपुर क्षेत्र के भोजपुर निवासी संत तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की थी। बाद में वे भवनियापुर में बस गए और तुलसीपुर नगर की स्थापना की। संत तुलसीदास स्वयं को गोस्वामी तुलसीदास का अवतार मानते थे। इसका उल्लेख 1940 के दशक में कल्याण पत्रिका में प्रकाशित विनायक के लेख में मिलता है, जबकि अखिल भारतीय विक्रम परिषद, काशी द्वारा प्रकाशित तुलसी ग्रंथावली में भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है।
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