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Balrampur News: मोबाइल की स्क्रीन की लंबाई-चौड़ाई तक सिमटा बच्चों का खेल मैदान
Tue, 28 Jul 2026 11:06 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Tue, 28 Jul 2026 11:06 PM IST
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फोटो-20-नवनीत श्रीवास्तव
बलरामपुर। कभी शाम ढलते ही शहर और गांवों के मैदान बच्चों की किलकारियों से गूंज उठते थे। क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा और फुटबॉल जैसे खेल उनकी दिनचर्या का हिस्सा होते थे। अब तस्वीर बदल चुकी है। मैदान सूने हैं और बच्चों का अधिकतर समय मोबाइल की स्क्रीन पर बीत रहा है। खेलकूद से बढ़ती दूरी का असर उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर साफ दिखाई देने लगा है।
जिले के शिक्षकों और चिकित्सकों का कहना है कि पहले स्कूल से लौटने के बाद बच्चे घंटों मैदान में खेलते थे, लेकिन अब अधिकांश बच्चे मोबाइल गेम, सोशल मीडिया और वीडियो देखने में व्यस्त रहते हैं। शहर से लेकर तुलसीपुर, उतरौला, गैसड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों तक खुले खेल मैदान लगातार कम हो रहे हैं। कई मैदान अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं, जबकि स्कूलों में भी खेल सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में बच्चों का अधिकांश समय घरों के भीतर मोबाइल के साथ गुजर रहा है।
स्क्रीन टाइम बढ़ा, खेल का समय घटा
अभिभावकों का कहना है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है। शहर की शालिनी बताती हैं कि ऑनलाइन गेम, शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया अब बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पहले शाम का समय खेल के लिए होता था, लेकिन अब वह मोबाइल पर बीत जाता है। सिविल लाइन निवासी राकेश कहते हैं कि बिना मोबाइल के बच्चों को एक घंटे तक भी व्यस्त रखना कठिन हो गया है। स्कूलों की पढ़ाई और सूचनाएं भी अब काफी हद तक मोबाइल पर निर्भर हो गई हैं।
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शरीर ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित
मनोचिकित्सक डॉ. अशोक सिंह बताते हैं कि मोबाइल की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। लगातार स्क्रीन देखने से एकाग्रता कम होती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है, नींद प्रभावित होती है और कई बच्चों में चिंता व अवसाद जैसे लक्षण भी देखने को मिल रहे हैं। शारीरिक गतिविधियां घटने से मोटापे की समस्या बढ़ रही है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और जीवनशैली से जुड़ी अन्य बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
खेल ही व्यक्तित्व निर्माण की नींव
राजकीय हाईस्कूल रमनगरा के प्रधानाचार्य डॉ. नवीनत श्रीवास्तव का कहना है कि खेल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण आधार हैं। मैदान बच्चों में अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, टीम भावना और आत्मविश्वास विकसित करते हैं। नियमित खेलकूद करने वाले बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है। अभिभावकों को बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करते हुए उन्हें प्रतिदिन कम से कम एक से दो घंटे खुले मैदान में खेलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
बदलती तस्वीर
खुले खेल मैदान लगातार कम हो रहे हैं।
आउटडोर खेलों की जगह ऑनलाइन गेम लेते जा रहे हैं।
बच्चों में मोटापा, आंखों की समस्याएं और मानसिक तनाव बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ नियमित खेलकूद और सीमित स्क्रीन टाइम की सलाह दे रहे हैं।
अभिभावक क्या करें
दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल से दूर रखें।
बड़े बच्चों के स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें।
प्रतिदिन कम से कम एक घंटा आउटडोर खेल के लिए प्रोत्साहित करें।
बच्चों के साथ संवाद और खेल के लिए भी समय निकालें।
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जिले के शिक्षकों और चिकित्सकों का कहना है कि पहले स्कूल से लौटने के बाद बच्चे घंटों मैदान में खेलते थे, लेकिन अब अधिकांश बच्चे मोबाइल गेम, सोशल मीडिया और वीडियो देखने में व्यस्त रहते हैं। शहर से लेकर तुलसीपुर, उतरौला, गैसड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों तक खुले खेल मैदान लगातार कम हो रहे हैं। कई मैदान अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं, जबकि स्कूलों में भी खेल सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में बच्चों का अधिकांश समय घरों के भीतर मोबाइल के साथ गुजर रहा है।
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स्क्रीन टाइम बढ़ा, खेल का समय घटा
अभिभावकों का कहना है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है। शहर की शालिनी बताती हैं कि ऑनलाइन गेम, शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया अब बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पहले शाम का समय खेल के लिए होता था, लेकिन अब वह मोबाइल पर बीत जाता है। सिविल लाइन निवासी राकेश कहते हैं कि बिना मोबाइल के बच्चों को एक घंटे तक भी व्यस्त रखना कठिन हो गया है। स्कूलों की पढ़ाई और सूचनाएं भी अब काफी हद तक मोबाइल पर निर्भर हो गई हैं।
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शरीर ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित
मनोचिकित्सक डॉ. अशोक सिंह बताते हैं कि मोबाइल की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। लगातार स्क्रीन देखने से एकाग्रता कम होती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है, नींद प्रभावित होती है और कई बच्चों में चिंता व अवसाद जैसे लक्षण भी देखने को मिल रहे हैं। शारीरिक गतिविधियां घटने से मोटापे की समस्या बढ़ रही है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और जीवनशैली से जुड़ी अन्य बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
खेल ही व्यक्तित्व निर्माण की नींव
राजकीय हाईस्कूल रमनगरा के प्रधानाचार्य डॉ. नवीनत श्रीवास्तव का कहना है कि खेल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण आधार हैं। मैदान बच्चों में अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, टीम भावना और आत्मविश्वास विकसित करते हैं। नियमित खेलकूद करने वाले बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है। अभिभावकों को बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करते हुए उन्हें प्रतिदिन कम से कम एक से दो घंटे खुले मैदान में खेलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
बदलती तस्वीर
खुले खेल मैदान लगातार कम हो रहे हैं।
आउटडोर खेलों की जगह ऑनलाइन गेम लेते जा रहे हैं।
बच्चों में मोटापा, आंखों की समस्याएं और मानसिक तनाव बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ नियमित खेलकूद और सीमित स्क्रीन टाइम की सलाह दे रहे हैं।
अभिभावक क्या करें
दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल से दूर रखें।
बड़े बच्चों के स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें।
प्रतिदिन कम से कम एक घंटा आउटडोर खेल के लिए प्रोत्साहित करें।
बच्चों के साथ संवाद और खेल के लिए भी समय निकालें।

फोटो-20-नवनीत श्रीवास्तव