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अनियोजित विकास, शोषणपरक नीति ने बढ़ाया है जल संकट: डा. गणेश
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रामगढ़। वर्तमान जल संकट मानव की भोगवादी प्रवृत्ति, विलासिता पूर्ण जीवन, अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास एवं जल की शोषणपरक नीति की देन है। जल स्रोतों के अनियोजित एवं अनियंत्रित उपयोग के चलते जहां जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है, वहीं दूसरी तरफ जल प्रदूषण में भी तीव्रगति से वृद्धि होती जा रही है। ये बातें अमरनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालयय दुबेछपरा के भुगोल के पूर्व विभागाध्यक्ष ने जलसंकट पर चिंता जताते हुए कही।
उन्होंने कहा कि कहा कि जल सृष्टि का आदि तत्व है। जल न केवल जीवन को धारण करता है, बल्कि स्वयं जीवन प्राण है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जल को देवता मानकर जल स्रोतों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु पूजा का विधान बनाया गया है। बताया कि हमारी पृथ्वी पर जो जल विद्यमान है उसमें से मात्र 0.8 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। शेष 97.4 प्रतिशत जल खारा जल के रूप में समुद्रों में एवं 1.8 प्रतिशत जल ध्रुवों पर बर्फ के रूप में विद्यमान है। प्रकृति में विद्यमान 1.5 विलियन क्यूबिक किमी जल में से मात्र 12500 से 19000 विलियन लीटर जल ही प्रतिवर्ष मानवीय उपयोग हेतु उपलब्ध है। कहा कि देश में जल उपलब्धता को देखा जाय तो वर्ष 1947 में 40 करोड़ की जनसंख्या के लिए 5000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति उपलब्ध था, जबकि वर्ष 2000 में 100 करोड़ जनसंख्या के लिए जल उपलब्धता घटकर 2000 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष हो गई। एक अनुमान के अनुसार 2025 में 139 करोड़ जनसंख्या के लिए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष मात्र 1500 घनमीटर जल उपलब्ध होगा, जबकि 2050 में 160 करोड़ जनसंख्या के लिए मात्र 1000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष उपलब्ध होगा, जो घोर जल संकट की तरफ इंगित करता है। बताया कि धरातलीय जल स्रोत सूखते जा रहे हैं एवं भूमिगत जल स्तर नीचे खिसकता जा रहा है, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। जिले में वर्षा पूर्व का जल स्तर औसतन 7 मीटर है, जबकि वर्षा पश्चात जल स्तर 4.5 मीटर प्राप्त होता है।
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उन्होंने कहा कि कहा कि जल सृष्टि का आदि तत्व है। जल न केवल जीवन को धारण करता है, बल्कि स्वयं जीवन प्राण है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जल को देवता मानकर जल स्रोतों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु पूजा का विधान बनाया गया है। बताया कि हमारी पृथ्वी पर जो जल विद्यमान है उसमें से मात्र 0.8 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। शेष 97.4 प्रतिशत जल खारा जल के रूप में समुद्रों में एवं 1.8 प्रतिशत जल ध्रुवों पर बर्फ के रूप में विद्यमान है। प्रकृति में विद्यमान 1.5 विलियन क्यूबिक किमी जल में से मात्र 12500 से 19000 विलियन लीटर जल ही प्रतिवर्ष मानवीय उपयोग हेतु उपलब्ध है। कहा कि देश में जल उपलब्धता को देखा जाय तो वर्ष 1947 में 40 करोड़ की जनसंख्या के लिए 5000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति उपलब्ध था, जबकि वर्ष 2000 में 100 करोड़ जनसंख्या के लिए जल उपलब्धता घटकर 2000 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष हो गई। एक अनुमान के अनुसार 2025 में 139 करोड़ जनसंख्या के लिए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष मात्र 1500 घनमीटर जल उपलब्ध होगा, जबकि 2050 में 160 करोड़ जनसंख्या के लिए मात्र 1000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष उपलब्ध होगा, जो घोर जल संकट की तरफ इंगित करता है। बताया कि धरातलीय जल स्रोत सूखते जा रहे हैं एवं भूमिगत जल स्तर नीचे खिसकता जा रहा है, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। जिले में वर्षा पूर्व का जल स्तर औसतन 7 मीटर है, जबकि वर्षा पश्चात जल स्तर 4.5 मीटर प्राप्त होता है।
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