{"_id":"576ac77f4f1c1b9172b48987","slug":"there-were-big-fish-identification","type":"story","status":"publish","title_hn":"कभी-बड़ी मछलियां थीं यहां की पहचान ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कभी-बड़ी मछलियां थीं यहां की पहचान
ब्यूरो/अमर उजाला, बलिया
Updated Wed, 22 Jun 2016 10:44 PM IST
विज्ञापन
पोखरा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले के प्रमुख धरोहरों में शुमार चितबड़ागांव कस्बा स्थित बरईया का पोखरा अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। इसका निर्माण करीब चार सौ साल पहले दीनदयाल बरई ने कराया था। इस पोखरे की पहचान बड़ी-बड़ी मछलियों की वजह से थी। जिन्हें देखने और दाना खिलाने के लिए गैरजनपद तक के लोगों की भीड़ उमड़ती थी। लेकिन आज देखरेख के अभाव में मछलियों की संख्या काफी कम हो गई हैं।
कसबा स्थित बरईया का पोखरे का निर्माण 1760 में जन कल्याणार्थ दीनदयाल बरई ने एक एकड़ जमीन में कराया था। इसके निर्माण में 20 साल का समय लगा था। इस पोखरे को आकर्षक बनाने के लिए राजस्थान से लाल पत्थर मंगाकर लगाया गया है। इसका निर्माण दक्षिण भारतीय शैली से हुआ है। इसके निर्माण की लागत का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार रेलवे लाइन बिछाते समय अंग्रेजों ने मुआवजे के लिए पोखरे के मालिक से उसकी कीमत पूछी थी।
मालिक का कहना था कि केवल मजदूरों को बीडी और तंबाकू में एक लाख रुपया खर्च हुआ है। अन्य खर्च अभी बाकी है। इस पर अंग्रेज अधिकारियों ने उसे अधिगृहित करने से मना कर दिया। यह पोखरा सदियों से उम्दा मछलियों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन गत एक दशक से बेहतर रख-रखाव के अभाव में इस पोखरे की ख्याति में कमी आई है। अब उस तरह की मछलियां इस पोखरे में नहीं हैं जो एक दशक पहले हुआ करती थी।
विज्ञापन
लोगों की माने तो इस पोखरे में आदमकद मछलियां पोखरे में हुआ करती थीं। जिन्हें सोने का नथुनी भी पहनाई जाती थी। लेकिन अब यह स्थिति नहीं है। यहीं नहीं मछलियों को देखने के लिए आने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है।
विज्ञापन
कसबा स्थित बरईया का पोखरे का निर्माण 1760 में जन कल्याणार्थ दीनदयाल बरई ने एक एकड़ जमीन में कराया था। इसके निर्माण में 20 साल का समय लगा था। इस पोखरे को आकर्षक बनाने के लिए राजस्थान से लाल पत्थर मंगाकर लगाया गया है। इसका निर्माण दक्षिण भारतीय शैली से हुआ है। इसके निर्माण की लागत का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार रेलवे लाइन बिछाते समय अंग्रेजों ने मुआवजे के लिए पोखरे के मालिक से उसकी कीमत पूछी थी।
विज्ञापन
मालिक का कहना था कि केवल मजदूरों को बीडी और तंबाकू में एक लाख रुपया खर्च हुआ है। अन्य खर्च अभी बाकी है। इस पर अंग्रेज अधिकारियों ने उसे अधिगृहित करने से मना कर दिया। यह पोखरा सदियों से उम्दा मछलियों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन गत एक दशक से बेहतर रख-रखाव के अभाव में इस पोखरे की ख्याति में कमी आई है। अब उस तरह की मछलियां इस पोखरे में नहीं हैं जो एक दशक पहले हुआ करती थी।
विज्ञापन
लोगों की माने तो इस पोखरे में आदमकद मछलियां पोखरे में हुआ करती थीं। जिन्हें सोने का नथुनी भी पहनाई जाती थी। लेकिन अब यह स्थिति नहीं है। यहीं नहीं मछलियों को देखने के लिए आने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है।