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पौराणिक स्थलों का खजाना अब तक न पहचाना
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बलिया। जिले के पौराणिक स्थलों पर काम तो हुए, लेकिन अभी भी प्रतापगढ़ पर्यटन के मानचित्र पर उभर नहीं सका है। कई जगहों पर घाट बदहाल हैं तो कहीं अव्यवस्था का बोलबाला है। यही वजह है कि अपने में ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व को समेटने वाले मुद्दा पर्यटन इन स्थलों पर स्थानीय लोगों की ही भीड़ ज्यादा दिखती है। कुछ ऐतिहासिक स्थल ऐसे भी हैं जो अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं, तो कुछ के नामोनिशान तक मिट चुके हैं।
बलिया में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 से अमर शहीद मंगल पांडे की स्मृति में बलिया महोत्सव% का आगाज भी हुआ। अफसोस, वह भी शासन-प्रशासन की उदासीनता के कारण औपचारिकता मात्र ही रह गया। जिले की पुरातात्विक धरोहरों का राष्ट्रीय पटल पर ले जाने का कभी-कभार प्रयास जरुर हुआ, लेकिन उसे मंजिल नहीं मिल सकी। वैसे यदि आम जन की बात करें तो जिले में स्थित पौराणिक स्थल कामेश्वर धाम कारो, लखनेश्वर डीह मुड़ेरा रसड़ा, देवकली सिकंदरपुर, वनखंडी मठ डूहा बिहरा आदि स्थलों पर देश के विभिन्न भागों से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है। हालांकि इसका कोई रिकार्ड मौजूद नहीं है।
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आचार्य हजारी प्रसाद से लेकर चंद्रशेखर तक पैदा हुए ,नहीं बदली दशा
इस दुनिया को बसाने और सभ्यता-संस्कृति सिखाने वाले भार्गव वंश के मूल पुरूष महर्षि भृगु की तपोभूमि, भगवान शिव की संतापहारिणी कामदहन भूमि कारो, 1857 के अग्रदूत मंगल पांडे की जन्मभूमि, 1942 के अगस्त क्रांति के अगुआ बलिया। इसे प्रकृति ने सुरहाताल, दहताल से लेकर गंगा, घाघरा, तमसा, मगई नदियों के मनोरम तटों से सजाया भी है। जहां वेद व्यास, परशुराम जैसे ऋषियों से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी, हरिहर प्रसाद वर्मा से लेकर अमरकांत, डा. केदारनाथ सिंह सरीखे अनेक साहित्यकारों ने जन्म लिया। जहां की मिट्टी से जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर और जनेश्वर मिश्र जैसे राजनेता पैदा हुए, उस बलिया में पर्यटन की दशा निराशाजनक ही रही है। देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से करीब होने का भी लाभ इस जिले को नहीं मिल सका।
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जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल:
--कामेश्वर धाम कारो (चितबड़ागांव) : बावन बीघे की सुंदर झील के तट पर स्थित भगवान शिव का पौराणिक मंदिर। यहां भगवान शिव ने कामदेव को जलाया था। वह प्राचीन आम का पेड़ यहां आज भी है। विश्वामित्र जी के साथ राम-लक्ष्मण ने यहां रात्रि विश्राम किया था।
--लखनेश्वर डीह, मुड़ेरा (रसड़ा) : तमसा तट पर प्राचीन शिवालय, जिसका लिंग लक्ष्मण जी द्वारा बनाया गया था, उनके अंगुलियों के निशान यहां आज भी हैं। विश्वामित्र जी ने राम-लक्ष्मण को यहां बला-अतिबला की विद्या सिखायी थी। प्राचीन किले का भग्नावशेष, दुर्लभ विष्णु प्रतिमाएं यहां मौजूद हैं।
--सोनाडीह भवानी, खैराडीह (बिल्थरारोड) : सरयू (घाघरा) के किनारे स्थित भगवती आदि शक्ति, जमदग्नि ऋषि आश्रम, पुरातात्विक स्थल आदि।
--वनखंडी आश्रम, डूहाबिहरा : पांच सौ साल पुराना किलानुमा मठ और अद्वैत शिव शक्ति परमधाम डूहा।
--देवकली (सिकंदरपुर) : गुलाब के फूलों की खेती, पुरातात्विक स्थल, महर्षि भृगु के साथ यहां पहुंचीं मूर्ति में कला के अद्भूत नमूने देखने को मिलेंगे।
--सुरहाताल झील, पक्षी विहार : प्राकृतिक झील व मनमोहक पिकनिक स्पॉट। इस मनोरम स्थल पर सर्दी के दिनों में साईबेरिया से बड़ी संख्या में पक्षी आती है। ताल में वह अटखेलियां करती हैं। फिलहाल इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी काशी वन्य जीव प्रभाग रामनगर वाराणसी के जिम्में है।
--बरइया पोखरा चितबड़ागांव : लाल पत्थरों से बना सुंदर सरोवर, जिसमें बड़ी-बड़ी मछलियां विहार करती हैं।
--मंगला भवानी, कोरंटाडीह : बलिया-गाजीपुर सीमा पर आदि शक्ति मां दुर्गा का ऐतिहासिक मंदिर, प्रमुख दर्शनीय स्थल।
--महर्षि भृगु मंदिर, बलिया: विश्व प्रसिद्ध भृगु मंदिर शहर के पूर्वी छोर पर स्थित है। मंदिर के गर्भ गृह में महर्षि भृगु के साथ ही उनके शिष्य महर्षि दर्दर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के प्रांगण में ही भगवान चित्रगुप्त का भी भव्य मंदिर है।
--बालेश्वर मंदिर, बलिया: शहर के बीचो-बीच स्थित बालेश्वर मंदिर पर हर रोज भक्तों की भीड़ जुटती है। मंदिर का नव निर्माण हो रहा है जो काफी आकर्षक है। सफेद संगमरमर के पत्थरों पर प्राचीन शैली की नक्काशी गयी है। ग्रंथों में उल्लेख है कि राजा बलि ने यहा पर यज्ञ किया था।
--कोरंटाडीह की ट्रेजरी: अंग्रेज अफसरों ने नरहीं थाना क्षेत्र के कोरंटाडीह में ट्रेजरी का निर्माण कराया था जहां कड़ी सुरक्षा सरकारी खजाना रखा जाता था। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी ट्रेजरी भवन पूरी तरह से सुरक्षित है।
--श्रीनाथ मठ व सरोवर, रसड़ा: रसड़ा शहर में स्थित श्रीनाथ मठ जिले ही नहीं अन्य जनपदों के लिये आस्था का केन्द्र है। मठ से सटे स्थित श्रीनाथ सरोवर की अपनी अलग पहचान है। सेंगर कुल के राजपूत हर साल रोट पूजा का आयोजन करते है। लाठियों संग होने वाली यह एकलौती पूजा आकर्षण का केन्द्र होता है।
--रोशन शाह का दरगाह, रसड़ा: हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक रोशन शाह की दरगाह है। यहां पर हर रोज सभी धर्म के लोग मन्नत मांगने के लिये पहुंचते हैं। साल में एक बार उर्स लगता है जिसमें दोनों समुदाय के लोग चादरपोशी करतें हैं।
--चैनराम बाबा मंदिर व सरोवर सहतवार, खपड़िया बाबा आश्रम श्रीपालपुर बैरिया, शहीद स्मारक बैरिया, महाराज बाबा मंदिर आदि।
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इन योजनाओं पर चल रहा काम
बलिया। मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना के तहत महर्षि भृगु आश्रम बलिया, खैराखास कुटी बेल्थरारोड, खपड़िया बाबा समाधि स्थल बैरिया, प्राचीन शिवमंदिर बेरुआरबारी, नेपाली बाबा धाम सिकंदरपुर, खाकी बाबा स्थल रसड़ा, बीका भगत का पोखरा फेफनापर लगभग 50 लाख की लागत से काम चल रहा है। इसके अलावा श्रीनाथ बाबा मठ रसड़ और बजरंग बली धाम दादर सिकंदरपुर में भी लाखों की लागत से काम कराया जा रहा है।
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बलिया में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 से अमर शहीद मंगल पांडे की स्मृति में बलिया महोत्सव% का आगाज भी हुआ। अफसोस, वह भी शासन-प्रशासन की उदासीनता के कारण औपचारिकता मात्र ही रह गया। जिले की पुरातात्विक धरोहरों का राष्ट्रीय पटल पर ले जाने का कभी-कभार प्रयास जरुर हुआ, लेकिन उसे मंजिल नहीं मिल सकी। वैसे यदि आम जन की बात करें तो जिले में स्थित पौराणिक स्थल कामेश्वर धाम कारो, लखनेश्वर डीह मुड़ेरा रसड़ा, देवकली सिकंदरपुर, वनखंडी मठ डूहा बिहरा आदि स्थलों पर देश के विभिन्न भागों से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है। हालांकि इसका कोई रिकार्ड मौजूद नहीं है।
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आचार्य हजारी प्रसाद से लेकर चंद्रशेखर तक पैदा हुए ,नहीं बदली दशा
इस दुनिया को बसाने और सभ्यता-संस्कृति सिखाने वाले भार्गव वंश के मूल पुरूष महर्षि भृगु की तपोभूमि, भगवान शिव की संतापहारिणी कामदहन भूमि कारो, 1857 के अग्रदूत मंगल पांडे की जन्मभूमि, 1942 के अगस्त क्रांति के अगुआ बलिया। इसे प्रकृति ने सुरहाताल, दहताल से लेकर गंगा, घाघरा, तमसा, मगई नदियों के मनोरम तटों से सजाया भी है। जहां वेद व्यास, परशुराम जैसे ऋषियों से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी, हरिहर प्रसाद वर्मा से लेकर अमरकांत, डा. केदारनाथ सिंह सरीखे अनेक साहित्यकारों ने जन्म लिया। जहां की मिट्टी से जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर और जनेश्वर मिश्र जैसे राजनेता पैदा हुए, उस बलिया में पर्यटन की दशा निराशाजनक ही रही है। देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से करीब होने का भी लाभ इस जिले को नहीं मिल सका।
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जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल:
--कामेश्वर धाम कारो (चितबड़ागांव) : बावन बीघे की सुंदर झील के तट पर स्थित भगवान शिव का पौराणिक मंदिर। यहां भगवान शिव ने कामदेव को जलाया था। वह प्राचीन आम का पेड़ यहां आज भी है। विश्वामित्र जी के साथ राम-लक्ष्मण ने यहां रात्रि विश्राम किया था।
--लखनेश्वर डीह, मुड़ेरा (रसड़ा) : तमसा तट पर प्राचीन शिवालय, जिसका लिंग लक्ष्मण जी द्वारा बनाया गया था, उनके अंगुलियों के निशान यहां आज भी हैं। विश्वामित्र जी ने राम-लक्ष्मण को यहां बला-अतिबला की विद्या सिखायी थी। प्राचीन किले का भग्नावशेष, दुर्लभ विष्णु प्रतिमाएं यहां मौजूद हैं।
--सोनाडीह भवानी, खैराडीह (बिल्थरारोड) : सरयू (घाघरा) के किनारे स्थित भगवती आदि शक्ति, जमदग्नि ऋषि आश्रम, पुरातात्विक स्थल आदि।
--वनखंडी आश्रम, डूहाबिहरा : पांच सौ साल पुराना किलानुमा मठ और अद्वैत शिव शक्ति परमधाम डूहा।
--देवकली (सिकंदरपुर) : गुलाब के फूलों की खेती, पुरातात्विक स्थल, महर्षि भृगु के साथ यहां पहुंचीं मूर्ति में कला के अद्भूत नमूने देखने को मिलेंगे।
--सुरहाताल झील, पक्षी विहार : प्राकृतिक झील व मनमोहक पिकनिक स्पॉट। इस मनोरम स्थल पर सर्दी के दिनों में साईबेरिया से बड़ी संख्या में पक्षी आती है। ताल में वह अटखेलियां करती हैं। फिलहाल इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी काशी वन्य जीव प्रभाग रामनगर वाराणसी के जिम्में है।
--बरइया पोखरा चितबड़ागांव : लाल पत्थरों से बना सुंदर सरोवर, जिसमें बड़ी-बड़ी मछलियां विहार करती हैं।
--मंगला भवानी, कोरंटाडीह : बलिया-गाजीपुर सीमा पर आदि शक्ति मां दुर्गा का ऐतिहासिक मंदिर, प्रमुख दर्शनीय स्थल।
--महर्षि भृगु मंदिर, बलिया: विश्व प्रसिद्ध भृगु मंदिर शहर के पूर्वी छोर पर स्थित है। मंदिर के गर्भ गृह में महर्षि भृगु के साथ ही उनके शिष्य महर्षि दर्दर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के प्रांगण में ही भगवान चित्रगुप्त का भी भव्य मंदिर है।
--बालेश्वर मंदिर, बलिया: शहर के बीचो-बीच स्थित बालेश्वर मंदिर पर हर रोज भक्तों की भीड़ जुटती है। मंदिर का नव निर्माण हो रहा है जो काफी आकर्षक है। सफेद संगमरमर के पत्थरों पर प्राचीन शैली की नक्काशी गयी है। ग्रंथों में उल्लेख है कि राजा बलि ने यहा पर यज्ञ किया था।
--कोरंटाडीह की ट्रेजरी: अंग्रेज अफसरों ने नरहीं थाना क्षेत्र के कोरंटाडीह में ट्रेजरी का निर्माण कराया था जहां कड़ी सुरक्षा सरकारी खजाना रखा जाता था। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी ट्रेजरी भवन पूरी तरह से सुरक्षित है।
--श्रीनाथ मठ व सरोवर, रसड़ा: रसड़ा शहर में स्थित श्रीनाथ मठ जिले ही नहीं अन्य जनपदों के लिये आस्था का केन्द्र है। मठ से सटे स्थित श्रीनाथ सरोवर की अपनी अलग पहचान है। सेंगर कुल के राजपूत हर साल रोट पूजा का आयोजन करते है। लाठियों संग होने वाली यह एकलौती पूजा आकर्षण का केन्द्र होता है।
--रोशन शाह का दरगाह, रसड़ा: हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक रोशन शाह की दरगाह है। यहां पर हर रोज सभी धर्म के लोग मन्नत मांगने के लिये पहुंचते हैं। साल में एक बार उर्स लगता है जिसमें दोनों समुदाय के लोग चादरपोशी करतें हैं।
--चैनराम बाबा मंदिर व सरोवर सहतवार, खपड़िया बाबा आश्रम श्रीपालपुर बैरिया, शहीद स्मारक बैरिया, महाराज बाबा मंदिर आदि।
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इन योजनाओं पर चल रहा काम
बलिया। मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना के तहत महर्षि भृगु आश्रम बलिया, खैराखास कुटी बेल्थरारोड, खपड़िया बाबा समाधि स्थल बैरिया, प्राचीन शिवमंदिर बेरुआरबारी, नेपाली बाबा धाम सिकंदरपुर, खाकी बाबा स्थल रसड़ा, बीका भगत का पोखरा फेफनापर लगभग 50 लाख की लागत से काम चल रहा है। इसके अलावा श्रीनाथ बाबा मठ रसड़ और बजरंग बली धाम दादर सिकंदरपुर में भी लाखों की लागत से काम कराया जा रहा है।