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Ballia News: 1.57 करोड़ से बने ट्रॉमा सेंटर में होती है सिर्फ मरहम-पट्टी, 60 लाख फिर मंजूर

Fri, 30 Jan 2026 11:27 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 30 Jan 2026 11:27 PM IST
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The trauma centre, built at a cost of 1.57 crore, only provides bandaging; another 60 lakh has been approved.
जिला अस्पताल ​स्थित ट्रामा सेंटर।संवाद
बलिया। जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर का भवन 1.57 करोड़ रुपये से बना है। करोड़ों रुपए के वेंटिलेटर व ओटी के आधुनिक उपकरण होने के बावजूद यहां सिर्फ मरहम पट्टी होती है। चिकित्सक व कर्मचारियों की कमी से वेंटिलेटर व ओटी के आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इससे ये खराब हो रहे हैं। इसी बीच ट्राॅमा सेंटर में तीन ओटी बेड, तीन ट्राॅमा बेड, ओटी उपकरण, इन्वर्टर सहित अन्य सामान की खरीदारी के लिए शासन की ओर से 60 लाख रुपये बजट जारी किया गया है। ट्राॅमा सेंटर के नाम पर मिलने वाली धनराशि का कितना लाभ लोगों को मिलेगा, इस पर सवाल उठने लगे हैं।
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ट्राॅमा सेंटर सिर्फ नाम का है, सड़क दुर्घटना या अन्य गंभीर मरीजों को सिर्फ इमरजेंसी जैसी ही सुविधा मिल रही है। सड़क दुर्घटना या अन्य घायल मरीजों के आने पर ऑपरेशन करने की जगह मरहम पट्टी कर बीएचयू रेफर कर दिया जाता है। अस्पताल परिसर में सक्रिय दलाल तीमारदारों को बरगला कर मऊ निजी अस्पताल पहुंचाकर कमीशन लेते हैं। ट्राॅमा सेंटर में तीन सर्जन, आर्थो सर्जन, एक एनेस्थीसिया की तैनाती है।
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एक भी मरीज को वेंटिलेटर पर भर्ती नहीं किया गया
ट्रॉमा सेंटर में करोड़ों रुपये के उपकरण व पांच वेंटिलेटर पड़े हुए हैं। जो इलाज जिला अस्पताल की इमरजेंसी में होता है, वहीं ट्राॅमा सेंटर में भी होता है। पिछले चार माह से वेंटिलेटर संचालन का दावा अस्पताल प्रशासन करता है। लेकिन आज तक एक भी मरीज को वेंटिलेटर पर भर्ती कर इलाज नहीं हुआ।
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रोज 10 से 15 मरीज होते हैं रेफर
आईसीयू के अभाव में रोजाना करीब 10 से 15 मरीज बीएचयू रेफर होते हैं। ट्रॉमा सेंटर के नाम पर मिले चिकित्सक अस्पताल की ओपीडी में मरीजों का इलाज करते हैं।
दो एनेस्थीसिया, तीन स्टाफ नर्स और कर्मचारियों की जरूरत
जिला अस्पताल में आईसीयू के संचालन के लिए चिकित्सक, नर्स सहित 10 कर्मचारी आजमगढ़ मेडिकल कॉलेज से ट्रेनिंग लेकर आए। ट्राॅमा सेंटर के प्रथम तल पर कोराना काल में बने पांच बेड के आईसीयू वार्ड संचालन की जिम्मेदारी चिकित्सक व कर्मचारियों को दी गई। आईसीयू वार्ड में भर्ती मरीजों की सुविधा के लिए चार स्टाफ नर्स की ड्यूटी लगी है। काम का लोड व सुरक्षा को लेकर स्टाफ नर्सों ने एक शिफ्ट में दो नर्स की डयूटी लगाने की मांग की है। शासन द्वारा ट्राॅमा सेंटर के लिए आठ स्टाफ नर्स की तैनाती की गई थी। अस्पताल प्रशासन ने इन नर्सों में चार की ड्यूटी हड्डी, सर्जिकल, मेडिकल सहित अन्य वार्डों में लगा दी। एक शिफ्ट में दो-दो नर्स की डयूटी लगाने की मांग की गई। इसकी जगह आईसीयू का संचालन सिर्फ कागज पर होने लगा। तीन शिफ्ट में आईसीयू संचालन के लिए मानक के अनुसार अतिरिक्त दो एनेस्थीसिया, तीन स्टाफ नर्स, चार स्वीपर सहित अन्य कर्मचारियों की जरूरत है। तीन सर्जन व दो हड्डी रोग चिकित्सक की तैनाती होने के बावजूद माइनर ऑपरेशन तक नहीं होता है। गंभीर मरीज होने पर सिर्फ रेफर कर देते हैं।
10 वर्ष पूर्व बना था ट्राॅमा सेंटर

जनपद में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिले इसके लिए सपा शासन में वर्ष 2014-15 में 157.43 लाख में उप्र आवास एवं विकास परिषद निर्माण इकाई गाजीपुर द्वारा ट्राॅमा सेंटर का निर्माण शुरू किया गया। पूरा धन अवमुक्त होने के कारण एक वर्ष में भवन बन कर तैयार हो गया। 20 दिसंबर 2016 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, स्वास्थ्य मंत्री शिवकांत ओझा, राज्यसभा सदस्य नीरज शेखर, नारद राय व एमएलसी रविशंकर सिंह पप्पू ने उद्घाटन किया। करोड़ों के मेडिकल उपकरण व पांच वेंटिलेटर आकर रखे गए, लेकिन इसका संचालन नहीं शुरू हुआ। हर बार चिकित्सक, संसाधन व कर्मचारी की कमी बताकर स्वास्थ्य विभाग पीछे हट जाता था। पिछले दिनों गर्मी के दौरान हुई मौतों के बाद डीएम के अथक प्रयास से आठ वर्ष बाद जनवरी 2024 में ट्राॅमा सेंटर में इलाज शुरू हुआ, लेकिन वेंटिलेटर या ओटी आज तक चालू नहीं हो पाई। इमरजेंसी में ऑक्सीजन तक की व्यवस्था नहीं है। माइनर आपरेशन तक नहीं होता है।
ट्रॉमा सेंटर के उपकरणों के संचालन की प्रक्रिया चल रही है। इसके लिए कर्मचारियों और डॉक्टरों की मांग शासन से की गई है। मरीजों को बेहतर इलाज दिया जाता है। - डॉ. एसके यादव, सीएमएस जिला अस्पताल

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कोट...
जिला अस्पताल में दुर्घटना में घायल मरीज को ट्राॅमा सेंटर में इलाज के लिए भेजा जा रहा है। यहां सिर्फ मरहम पट्टी की जा रही है। ट्राॅमा जैसी कोई सुविधा नहीं है, जिला अस्पताल की इमरजेंसी में इससे बेहतर काम होता है। -- धनंजय कुमार, निवासी नरही।

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अस्पताल प्रशासन ट्राॅमा सेंटर के नाम पर मरीजों के साथ छलावा कर रहा है। 10 वर्ष बाद तक माइनर ओटी तक चालू नहीं हुआ, जबकि करोड़ों रुपये के उपकरण ताले में बंद हैं और मरीज बेहतर इलाज के लिए वाराणसी व मऊ जाने को विवश हैं। मरीजों को रेफर करने पर चिकित्सकों व कर्मचरियों को निजी अस्पताल से आमदनी होती है। -- लक्ष्मण यादव, भाकपा माले नेता
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