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पहिए क्या थमे, थम गई चालकों की जिंदगी
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ग्राउंड रिपोर्ट
बलिया। लॉकडाउन में सवारी वाहनों के पहिये थमने के बाद चालकों की गृहस्थी की गाड़ी भी थम गई है। लगभग दो माह से वाहन खड़े होने के कारण इनके परिवार के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है। इनमें बस से लेकर टेंपो तक के चालक शामिल हैं। इनमें स्कूल बस, वैन और आटो चलाने वाले भी चालक भी शामिल हैं।
शहर में सवारी वाहन चलाने वाले चालक विभिन्न स्टैंडों से देहात इलाकों में सवारियों को पहुंचा कर अपने परिवार की जीविका चलाते थे लेकिन लाक डाउन में धंधा बंद होने से वे आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। लॉकडाउन में सभी सवारी वाहन जहां-तहां खड़े है। वाहन स्वामियों ने चालकों व खलासियों को आने से भी मना कर दिया। कुछ चालकों ने सब्जी आदि का व्यवसाय कर परिवार की जीविका चलाने का प्रयास किया है, लेकिन अधिकतर आज भी बेकार घूम रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही स्थिति सुधरेगी।
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लॉकडाउन-4 में मिली अधूरी राहत
लॉकडाउन-4 शुरू होने के समय जिला प्रशासन ने सुबह सात से शाम को सात बजे तक बसों या प्राइवेट वाहनों को चलाने की अनुमति दी, लेकिन सिर्फ 50 फीसदी यात्री बैठाने की शर्त रख दी। छोटे वाहनों में चालकों को छोड़कर तीन लोगों के बैठने की अनुमति दी। ऐसी स्थिति में किसी भी वाहन स्वामी ने अपना वाहन चलाने की जहमत नहीं उठाई। कहना है कि महंगाई के इस दौर में आधे सवारी से बस या तीन सवारी से छोटे वाहनों के तेल का पैसा भी निकलेगा। ऐसे में चालकों को वेतन देना भी मुश्किल हो जाएगा तो आखिर वाहन क्यों चलाएं।
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बढ़ा किराया तो सफर नहीं करेंगे लोग
वाहन स्वामी मणि दुबे बताते हैं कि बलिया से मनियर, सिकंदरपुर, बैरिया, रसड़ा, भरौली आदि का किराया लगभग 35 रुपये है। इन सभी की दूरी जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर है। इतनी दूरी तय करने में एक छोटे वाहन में लगभग तीन लीटर डीजल लगेगा, जिसकी कीमत लगभग 225 रुपये होगी। अब यदि तीन सवारी लेकर वाहन चलाना है तो एक सवारी से कम से कम सौ रुपये किराया लिया जाए तो भी शाम को चालक को दोपहर का भोजन और तनख्वाह देने के लिए दो सौ रुपयों की भी बचत हो जाएगी, इसकी कोई गांरटी नहीं है। यही सौ रुपये किराया सुनने के बाद कोई वाहन में बैठना भी पसंद नहीं करेगा। ऐसे में अच्छा यही है कि जब तक पूरी सवारी की परमिशन नहीं मिलती वाहन को खड़ा रखा जाए।
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पचास फीसदी सवारी से कैसे निकलेगा खर्च
यही हाल बस मालिकों का भी है। जिला मुख्यालय से मनियर व सिकंदरपुर मार्ग पर बस चलवाने वाले जितेंद्र सिंह बताते हैं कि एक बस को कुल 40 सीट की अनुमति मिलती है। अब रियायत के अनुसार बस चलाएं तो कुल 20 सवारियां बैठानी होंगी। बस रोड पर निकलती है तो अमूमन पांच किलोमीटर पर एक लीटर डीजल खाती है। अब 35 किलोमीटर के लिए उसे सात लीटर डीजल चाहिए, जिसकी कीमत होगी लगभग 550 रुपये। इसके साथ बस में एक चालक, एक कंडक्टर और एक खलासी को रखना जरूरी है। इन तीनों के दोपहर भोजन और शाम को वेतन में लगभग 750 रुपये का खर्च आएगा। यदि 20 सवारियां हम अंतिम स्टेशन की ही बैठाएं तो हमे मिलेंगे, कुल 700 रुपये। अब बाकी का खर्च कहां से आएगा। इससे अच्छा है कि बस खड़ी रहे।
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लॉकडाउन में सवारी वाहनों को खड़ा करा दिया गया है। वाहन स्वामियों ने कहा है कि वाहन चलाने की अनुमति जबतक नहीं मिलती है, चालक को आने की जरूरत नहीं है। हम कोई काम भी नहीं कर पा रहे हैं।-लल्लन यादव, चालक
- वाहन स्वामी ने वाहन न चलने पर वेतन देने में असमर्थता जताई है। वैसे भी चालक रोज के हिसाब से ही काम करते हैं। दिनभर गाड़ी चलाने पर दोपहर का भोजन और तनख्वाह वाहन स्वामी देते हैं। अब परिवार के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है।-हरेराम गिरि
- उम्मीद थी कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद वाहन चलने लगेंगे लेकिन लाकडाउन की अवधि बढ़ती ही गई। सोचा कि कोई मालवाहक वाहन ही चला लूं तो उसमें भी सफलता नहीं मिली। अब बस लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार है।-विजय यादव, चालक
- काम छूटने पर सोचा कि सब्जी का व्यवसाय किया जाए। पता चला कि कई अन्य साथियों ने भी यही व्यवसाय अपना रखा है। इस समय खरीदने वालों से अधिक तो बेचने वाले हो गए हैं तो उसमें भी इतना पैसा नहीं मिल पा रहा कि परिवार का खर्च चल सके।-दुर्गा गिरि, चालक
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बलिया। लॉकडाउन में सवारी वाहनों के पहिये थमने के बाद चालकों की गृहस्थी की गाड़ी भी थम गई है। लगभग दो माह से वाहन खड़े होने के कारण इनके परिवार के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है। इनमें बस से लेकर टेंपो तक के चालक शामिल हैं। इनमें स्कूल बस, वैन और आटो चलाने वाले भी चालक भी शामिल हैं।
शहर में सवारी वाहन चलाने वाले चालक विभिन्न स्टैंडों से देहात इलाकों में सवारियों को पहुंचा कर अपने परिवार की जीविका चलाते थे लेकिन लाक डाउन में धंधा बंद होने से वे आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। लॉकडाउन में सभी सवारी वाहन जहां-तहां खड़े है। वाहन स्वामियों ने चालकों व खलासियों को आने से भी मना कर दिया। कुछ चालकों ने सब्जी आदि का व्यवसाय कर परिवार की जीविका चलाने का प्रयास किया है, लेकिन अधिकतर आज भी बेकार घूम रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही स्थिति सुधरेगी।
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लॉकडाउन-4 में मिली अधूरी राहत
लॉकडाउन-4 शुरू होने के समय जिला प्रशासन ने सुबह सात से शाम को सात बजे तक बसों या प्राइवेट वाहनों को चलाने की अनुमति दी, लेकिन सिर्फ 50 फीसदी यात्री बैठाने की शर्त रख दी। छोटे वाहनों में चालकों को छोड़कर तीन लोगों के बैठने की अनुमति दी। ऐसी स्थिति में किसी भी वाहन स्वामी ने अपना वाहन चलाने की जहमत नहीं उठाई। कहना है कि महंगाई के इस दौर में आधे सवारी से बस या तीन सवारी से छोटे वाहनों के तेल का पैसा भी निकलेगा। ऐसे में चालकों को वेतन देना भी मुश्किल हो जाएगा तो आखिर वाहन क्यों चलाएं।
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बढ़ा किराया तो सफर नहीं करेंगे लोग
वाहन स्वामी मणि दुबे बताते हैं कि बलिया से मनियर, सिकंदरपुर, बैरिया, रसड़ा, भरौली आदि का किराया लगभग 35 रुपये है। इन सभी की दूरी जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर है। इतनी दूरी तय करने में एक छोटे वाहन में लगभग तीन लीटर डीजल लगेगा, जिसकी कीमत लगभग 225 रुपये होगी। अब यदि तीन सवारी लेकर वाहन चलाना है तो एक सवारी से कम से कम सौ रुपये किराया लिया जाए तो भी शाम को चालक को दोपहर का भोजन और तनख्वाह देने के लिए दो सौ रुपयों की भी बचत हो जाएगी, इसकी कोई गांरटी नहीं है। यही सौ रुपये किराया सुनने के बाद कोई वाहन में बैठना भी पसंद नहीं करेगा। ऐसे में अच्छा यही है कि जब तक पूरी सवारी की परमिशन नहीं मिलती वाहन को खड़ा रखा जाए।
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पचास फीसदी सवारी से कैसे निकलेगा खर्च
यही हाल बस मालिकों का भी है। जिला मुख्यालय से मनियर व सिकंदरपुर मार्ग पर बस चलवाने वाले जितेंद्र सिंह बताते हैं कि एक बस को कुल 40 सीट की अनुमति मिलती है। अब रियायत के अनुसार बस चलाएं तो कुल 20 सवारियां बैठानी होंगी। बस रोड पर निकलती है तो अमूमन पांच किलोमीटर पर एक लीटर डीजल खाती है। अब 35 किलोमीटर के लिए उसे सात लीटर डीजल चाहिए, जिसकी कीमत होगी लगभग 550 रुपये। इसके साथ बस में एक चालक, एक कंडक्टर और एक खलासी को रखना जरूरी है। इन तीनों के दोपहर भोजन और शाम को वेतन में लगभग 750 रुपये का खर्च आएगा। यदि 20 सवारियां हम अंतिम स्टेशन की ही बैठाएं तो हमे मिलेंगे, कुल 700 रुपये। अब बाकी का खर्च कहां से आएगा। इससे अच्छा है कि बस खड़ी रहे।
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लॉकडाउन में सवारी वाहनों को खड़ा करा दिया गया है। वाहन स्वामियों ने कहा है कि वाहन चलाने की अनुमति जबतक नहीं मिलती है, चालक को आने की जरूरत नहीं है। हम कोई काम भी नहीं कर पा रहे हैं।-लल्लन यादव, चालक
- वाहन स्वामी ने वाहन न चलने पर वेतन देने में असमर्थता जताई है। वैसे भी चालक रोज के हिसाब से ही काम करते हैं। दिनभर गाड़ी चलाने पर दोपहर का भोजन और तनख्वाह वाहन स्वामी देते हैं। अब परिवार के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है।-हरेराम गिरि
- उम्मीद थी कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद वाहन चलने लगेंगे लेकिन लाकडाउन की अवधि बढ़ती ही गई। सोचा कि कोई मालवाहक वाहन ही चला लूं तो उसमें भी सफलता नहीं मिली। अब बस लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार है।-विजय यादव, चालक
- काम छूटने पर सोचा कि सब्जी का व्यवसाय किया जाए। पता चला कि कई अन्य साथियों ने भी यही व्यवसाय अपना रखा है। इस समय खरीदने वालों से अधिक तो बेचने वाले हो गए हैं तो उसमें भी इतना पैसा नहीं मिल पा रहा कि परिवार का खर्च चल सके।-दुर्गा गिरि, चालक