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समाजवाद के गढ़ में भी सपा नहीं चला पाई साइकिल
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कहने को पूर्वांचल समाजवाद का गढ़ है। सपा की जड़ें यहां काफी मजबूत और पुरानी है। पूर्वांचल के इन जिलों में अपना अलग राजनीतिक वजूद रखने वाला बलिया जनपद भी शामिल है। समाजवाद के इस गढ़ में एक ऐसी विधानसभा सीट है जहां से सपा आज तक अपना खाता नहीं खोल पाई है। बात हो रही है रसड़ा विधानसभा की। पार्टी यहां हमेशा दमदारी के साथ चुनाव लड़ती है। दो बार दूसरे नंबर तक का सफर तय किया, लेकिन उसे जीत अब तक नहीं मिली है।
कभी सुरक्षित सीटों में रही रसड़ा विधानसभा अब सामान्य सीट का रूप ले चुकी है। इसके बाद भी समाजवादी पार्टी यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब नहीं हो सकी है। यहा विधानसभा सीट सबसे ज्यादा बसपा और कांग्रेस के खाते में रही हैं। भारतीय जनता पार्टी यहां से एक बार अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। सपा ही एक ऐसी पार्टी है जो अभी तक यहां से अपना खाता नहीं खोल पाई है। विधानसभा चुनाव-2022 में भी इस सीट को लेकर संशय बरकरार है। चुनाव में सपा का सपभासपा के साथ गठबंधन है। चर्चाएं हैं कि इस बार ये सीट सुभासपा की झोली में जा सकती है। ऐसे में सपा को रसड़ा के लिए अभी इतजार करना पड़ेगा।
पांच बार बसपा के खाते में रही सीट
बलिया। रसड़ा विधानसभा सीट 2007 तक सुरक्षित सीट रही है। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से बसपा के उमाशंकर सिंह ने जीत दर्ज की है। 2007 और 2002 में इस सीट से बसपा के घूरा राम विधायक रहे। 1996 के चुनाव में उन्हें भाजपा के अनिल कुमार से हार का सामना करना पड़ा था। इससे पहले 1993 और 1991 के चुनाव में भी इस सीट पर घूरा राम का बसपा से कब्जा रहा। 1991 का चुनाव वह जनता दल के टिकट पर यहां से जीते थे।
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1989 तक रहा कांग्रेस का कब्जा
बलिया। वर्ष 1989 में यहां से कांग्रेस के टिकट पर रामबचन, 1985 और 1980 में हरदेव विधायक रहे। 1977 में यह सीट जेएनपी के मन्नू राम के खाते में रही। 1974 में कम्युनिस्ट पार्टी से रघुनाथ यहां से विधायक बने। इसके पहले 1969, 1967, 1957 और 1951 में यह सीट कांग्रेस की ही खाते में रही।
कब कौन जीता चुनाव
2017-उमाशंकर सिंह (बसपा)
2012-उमाशंकर सिंह (बसपा)
2007-घूरा राम (बसपा)
2002-घूरा राम (बसपा)
1996-अनिल कुमार (भाजपा)
1993-घूरा राम (बसपा)
1991-घूरा राम (बसपा)
1989-रामबचन (कांग्रेस)
1985-हरदेव(कांग्रेस)
1980-हरदेव (कांग्रेस)
1977-मन्नू राम (जनप)
1974-रघुनाथ(सीपीआई)
1969-रामरतन (कांग्रेस)
1967-रामरतन (कांग्रेस)
1957-गंगा सिंह (कांग्रेस)
-रामरनत (कांग्रेस)
1951-ईस्ट-मांधाता (कांग्रेस)
-ईस्ट-रामरतन (कांग्रेस)
-वेस्ट-गंगा प्रसाद सिंह (कांग्रेस)
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कभी सुरक्षित सीटों में रही रसड़ा विधानसभा अब सामान्य सीट का रूप ले चुकी है। इसके बाद भी समाजवादी पार्टी यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब नहीं हो सकी है। यहा विधानसभा सीट सबसे ज्यादा बसपा और कांग्रेस के खाते में रही हैं। भारतीय जनता पार्टी यहां से एक बार अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। सपा ही एक ऐसी पार्टी है जो अभी तक यहां से अपना खाता नहीं खोल पाई है। विधानसभा चुनाव-2022 में भी इस सीट को लेकर संशय बरकरार है। चुनाव में सपा का सपभासपा के साथ गठबंधन है। चर्चाएं हैं कि इस बार ये सीट सुभासपा की झोली में जा सकती है। ऐसे में सपा को रसड़ा के लिए अभी इतजार करना पड़ेगा।
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पांच बार बसपा के खाते में रही सीट
बलिया। रसड़ा विधानसभा सीट 2007 तक सुरक्षित सीट रही है। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से बसपा के उमाशंकर सिंह ने जीत दर्ज की है। 2007 और 2002 में इस सीट से बसपा के घूरा राम विधायक रहे। 1996 के चुनाव में उन्हें भाजपा के अनिल कुमार से हार का सामना करना पड़ा था। इससे पहले 1993 और 1991 के चुनाव में भी इस सीट पर घूरा राम का बसपा से कब्जा रहा। 1991 का चुनाव वह जनता दल के टिकट पर यहां से जीते थे।
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1989 तक रहा कांग्रेस का कब्जा
बलिया। वर्ष 1989 में यहां से कांग्रेस के टिकट पर रामबचन, 1985 और 1980 में हरदेव विधायक रहे। 1977 में यह सीट जेएनपी के मन्नू राम के खाते में रही। 1974 में कम्युनिस्ट पार्टी से रघुनाथ यहां से विधायक बने। इसके पहले 1969, 1967, 1957 और 1951 में यह सीट कांग्रेस की ही खाते में रही।
कब कौन जीता चुनाव
2017-उमाशंकर सिंह (बसपा)
2012-उमाशंकर सिंह (बसपा)
2007-घूरा राम (बसपा)
2002-घूरा राम (बसपा)
1996-अनिल कुमार (भाजपा)
1993-घूरा राम (बसपा)
1991-घूरा राम (बसपा)
1989-रामबचन (कांग्रेस)
1985-हरदेव(कांग्रेस)
1980-हरदेव (कांग्रेस)
1977-मन्नू राम (जनप)
1974-रघुनाथ(सीपीआई)
1969-रामरतन (कांग्रेस)
1967-रामरतन (कांग्रेस)
1957-गंगा सिंह (कांग्रेस)
-रामरनत (कांग्रेस)
1951-ईस्ट-मांधाता (कांग्रेस)
-ईस्ट-रामरतन (कांग्रेस)
-वेस्ट-गंगा प्रसाद सिंह (कांग्रेस)