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नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ डाला छठ का व्रत
ब्यूरो/ अमर उजाला बलिया
Updated Sun, 15 Nov 2015 11:46 PM IST
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सूर्योपासना का महापर्व डाला छठ रविवार से शुरू हो गया। महिलाओं ने घर की साफ-सफाई कर नहाय-खाय के साथ ही व्रत आरंभ कर दिया। इस दौरान गली-मुहल्लों में छठ मइया के गीत गाए जा रहे हैं।
नगर एवं ग्रामीण इलाकों में भी महिलाएं अभी से सुबह-शाम गीत गाने लगी हैं। तीन दिन तक चलने वाले व्रत में शुद्धता और स्वच्छता का काफी ध्यान रखा जाता है। व्रती महिलाओं ने अरवा चावल व लौकी खाकर व्रत की शुरूआत की।
खरना व्रत के चलते नगर के बाजारों में लौकी की जबर्दस्त मांग रही। जिसके चलते अस्सी से सौ रुपये तक लौकी की बिक्री हुई। रविवार को स्नान करने के बाद व्रती महिलाओं ने शाम को लौकी की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल का भात ग्रहण किया। कारण की लौकी जहां आसानी से पच जाती है।
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वहीं इससे व्रत के दौरान शुद्धता बनी रहती है। लौकी चावल के साथ पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। अगले दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को गुड़ से निर्मित खीर, रोटी तथा फल का पारण किया जाता है।
षष्ठी तिथि से कठिन व्रत का डगर शुरू हो जाता है। शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाएं पूजन-अर्चन शुरू कर देती है। सप्तमी तिथि को उदीयमान भास्कर को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत तोड़ा जाता है। इस व्रत की परंपरा है कि महिलाएं देर रात से पानी में खड़ा होकर सूर्य के निकलने का इंतजार करती हैं।
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नगर एवं ग्रामीण इलाकों में भी महिलाएं अभी से सुबह-शाम गीत गाने लगी हैं। तीन दिन तक चलने वाले व्रत में शुद्धता और स्वच्छता का काफी ध्यान रखा जाता है। व्रती महिलाओं ने अरवा चावल व लौकी खाकर व्रत की शुरूआत की।
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खरना व्रत के चलते नगर के बाजारों में लौकी की जबर्दस्त मांग रही। जिसके चलते अस्सी से सौ रुपये तक लौकी की बिक्री हुई। रविवार को स्नान करने के बाद व्रती महिलाओं ने शाम को लौकी की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल का भात ग्रहण किया। कारण की लौकी जहां आसानी से पच जाती है।
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वहीं इससे व्रत के दौरान शुद्धता बनी रहती है। लौकी चावल के साथ पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। अगले दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को गुड़ से निर्मित खीर, रोटी तथा फल का पारण किया जाता है।
षष्ठी तिथि से कठिन व्रत का डगर शुरू हो जाता है। शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाएं पूजन-अर्चन शुरू कर देती है। सप्तमी तिथि को उदीयमान भास्कर को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत तोड़ा जाता है। इस व्रत की परंपरा है कि महिलाएं देर रात से पानी में खड़ा होकर सूर्य के निकलने का इंतजार करती हैं।