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जन्म के तत्काल बाद होगी नवजात के आंख-कान की जांच
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बैरिया। सरकारी अस्पतालों में जन्म के तत्काल बाद नवजात शिशु के आंख और कान की जांच की जाएगी। किसी तरह की दिक्कत होने पर ऐसे बच्चों को विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास इलाज के लिए भेजा जाएगा। इसके लिए एसजीपीजीआई को नोडल बनाया गया है।
हर माह तहसील क्षेत्र में दो से तीन हजार बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें एक से डेढ़ फीसदी बच्चे ऐसे होते हैं जिनकी आंखों या कानों में परेशानी होती है। समय पर इसकी जानकारी माताओं को नहीं हो पाती है। इसकी वजह से बच्चे दिव्यांग हो जाते हैं। इसे रोकने के लिए शासन ने नई रणनीति तैयार की है। इसमें नवजात के मां को भी बच्चों की स्थिति पता लगाने की तरकीब बताई जाएगी। जिला स्तर पर प्रशिक्षण देकर तैयार किए जाएगा। इनमें नाक-कान और गला रोग विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग ने महिला अस्पतालों के अलावा सभी सीएससी को निर्देश भी दिए हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुरली छपरा के चिकित्सा प्रभारी डॉ. देवनिति सिंह ने बताया की जन्म के तत्काल बाद जांच की जाएगी। दिक्कत होने पर विशेषज्ञों के पास इलाज के लिए भेजा जाएगा।
समय पर बीमारी पता चली तो सही इलाज
बैरिया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोटवां के चिकित्सा प्रभारी डॉ.आरबी सिंह ने बताया कि अगर नवजात बच्चों के नाक-कान और आंख से जुड़ी बीमारियों सही समय पर पता लग जाए तो इलाज संभव है। इसके लिए एक से तीन साल का वक्त बेहद अहम होता है। इलाज के बाद 70 से 80 फ़ीसदी रिकवरी हो सकती है। ऐसे मामलों में माता-पिता को जानकारी बाद में होती है।
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बच्चों का इशारा समझना जरूरी
बैरिया। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सोनबरसा के अधीक्षक डा. आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि बच्चे को इशारे से बुलाएं। अगर इशारा करने पर कोई रिस्पांस न दें तो डॉक्टर को दिखाएं। हाथ उठाने पर नजर इधर-उधर न हो, आवाज सुनकर वह सिर इधर-उधर न करें, मोबाइल और टीवी की आवाज पर भी कोई प्रतिक्रिया न हो तो बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं। ऐसे बच्चों का सही समय पर इलाज होता है तो ठीक होने की संभावना 80 फीसदी होती है।
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हर माह तहसील क्षेत्र में दो से तीन हजार बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें एक से डेढ़ फीसदी बच्चे ऐसे होते हैं जिनकी आंखों या कानों में परेशानी होती है। समय पर इसकी जानकारी माताओं को नहीं हो पाती है। इसकी वजह से बच्चे दिव्यांग हो जाते हैं। इसे रोकने के लिए शासन ने नई रणनीति तैयार की है। इसमें नवजात के मां को भी बच्चों की स्थिति पता लगाने की तरकीब बताई जाएगी। जिला स्तर पर प्रशिक्षण देकर तैयार किए जाएगा। इनमें नाक-कान और गला रोग विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग ने महिला अस्पतालों के अलावा सभी सीएससी को निर्देश भी दिए हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुरली छपरा के चिकित्सा प्रभारी डॉ. देवनिति सिंह ने बताया की जन्म के तत्काल बाद जांच की जाएगी। दिक्कत होने पर विशेषज्ञों के पास इलाज के लिए भेजा जाएगा।
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समय पर बीमारी पता चली तो सही इलाज
बैरिया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोटवां के चिकित्सा प्रभारी डॉ.आरबी सिंह ने बताया कि अगर नवजात बच्चों के नाक-कान और आंख से जुड़ी बीमारियों सही समय पर पता लग जाए तो इलाज संभव है। इसके लिए एक से तीन साल का वक्त बेहद अहम होता है। इलाज के बाद 70 से 80 फ़ीसदी रिकवरी हो सकती है। ऐसे मामलों में माता-पिता को जानकारी बाद में होती है।
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बच्चों का इशारा समझना जरूरी
बैरिया। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सोनबरसा के अधीक्षक डा. आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि बच्चे को इशारे से बुलाएं। अगर इशारा करने पर कोई रिस्पांस न दें तो डॉक्टर को दिखाएं। हाथ उठाने पर नजर इधर-उधर न हो, आवाज सुनकर वह सिर इधर-उधर न करें, मोबाइल और टीवी की आवाज पर भी कोई प्रतिक्रिया न हो तो बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं। ऐसे बच्चों का सही समय पर इलाज होता है तो ठीक होने की संभावना 80 फीसदी होती है।