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घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों ने कहा- अब नहीं जाएंगे शहर

Sun, 31 May 2020 08:54 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 31 May 2020 08:54 PM IST
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Migrant laborers returning home said - will not go to the city now
कोरोना के चलते लाकडाउन में जब भोजन के लिए भी पैसे नहीं बचे तो घर लौटने के लिए किसी ने पत्नी का मंगलसूत्र तो किसी ने बच्चे की साइकिल बेच कर पैसे की व्यवस्था की। उज्जैन से परिवार समेत बिहार के मोतिहारी जा रहे पवन कुमार ने रविवार की सुबह बताया कि लाकडाउन में बच्चे भूखे पेट सो जाते थे। उन्हें झूठी तसल्ली देते नहीं बना। घर आने के लिए किराया नहीं था। बताया कि वह नानाखेड़ा में फर्नीचर बनाने का काम करता था। लॉकडाउन शुरू होते ही फर्नीचर निर्माता फर्म के मालिक ने उसे घर रहने के लिए कह दिया। उज्जैन में कोरोना के प्रकोप ने सभी भयभीत हो गए। घर वाले फोन पर घर वापस आने के लिए दबाव डालने लगे। घर आने के लिए न तो कोई साधन था और पैसे।
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मजबूर होकर बेटे की साइकिल बेच दी। उज्जैन से खरगोन तक 150 किमी तक पैदल चलकर आया। पत्नी और बच्चे के पैर में छाले पड़ गये। बाजार बंद होने के कारण रास्ते में कहीं खाने पीने का सामान नहीं मिल सका। किराए का ऑटो लेकर भोपाल आया फिर रेलवे स्टेशन पर चना, गुड़ और लाई खाकर चार दिन गुजारे। स्टेशन पर एक पुलिसकर्मी की मदद से वाराणसी तक का टिकट मिल गया तो ऐसा लगा कि घर पहुंच गए। ट्रेन उज्जैन से वाराणसी आने में लगभग 48 घण्टे का समय लिया। यहां से फिर पैदल घर के लिए चला। कहा कि शहर से गांव लाख गुना अच्छा है, अपने हुनर से गांव में ही फर्नीचर का काम करके परिवार का भरण पोषण करूंगा। बताया कि साथ के कुछ लोग पत्नी का मंगलसूत्र बेच कर घर को गए।
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