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1857 की क्रांति का फल 1947 में मिला
ब्यूरो/अमर उजाला,बलिया
Updated Thu, 07 Apr 2016 08:35 PM IST
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मंगल पांडेय
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देशभक्तों की कतार में सबसे पहला नाम शहीद मंगल पांडेय का आता है। नगवां गांव के सुदिष्ट पांडेय और जानकी देवी की वह लड़कों में मंगल दूसरे नंबर पर थे। परिवार और संस्कारों का ही असर था कि मंगल पांडेय में देशभक्ति और धार्मिक भावनाएं कूट-कूट कर भरी हुई थी। अन्याय सहना उनके स्वभाव में नहीं था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद मंगल पांडेय ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही के रूप में भर्ती हुए। लेकिन अंग्रेजों के कुचक्र से अनभिज्ञ थे। जब उन्हें यह मालूम हुआ कि अंग्रेजों ने सिपाहियों को गाय एवं सुअर की चर्बी लगी कारतूस प्रयोग करने के लिए दे रहे हैं तो वह आग बबूला हो गए और 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में अंग्रेज अफसरों को ललकारते हुए कई को मौत केे घाट उतार दिया।
अंग्रेज अफसरों के काफी मशक्कत के बाद अखिरकार मंगल पांडेय गिरफ्तार हुए। उन पर मुकदमा चला और फांसी की सजा सुनाई गई। मंगल पांडेय को आठ अप्रैल 1857 को प्रात: साढे़ पांच बजे छावनी परिसर में फांसी दे दी गई। मंगल पांडेय के बलिदान ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया। उनकी शहादत ने अंग्रेजों के प्रति जो बगावत का बीज बोया कि उन्हें देश से उखाड़कर फेंक दिया। परिणामत: 15 अगस्त 1947 को लोगों ने आजादी की सुबह देखी।
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देश कीआजादी के लिए कुर्बानी देने वाले मंगल पांडेय के साथ लोकतंत्र के पहरूओं ने कोई न्याय नहीं किया। आजादी मिले भले ही 69 वर्ष बीत चुके हैं। ऐसे में यदि आपको लगता है कि आप शहीद के गांव तक पक्की सड़क से पहुंच जाएंगे तो भूल जाएं।
और तो छोड़िए शासन-प्रशासन की उपेक्षा का इससे बड़ा जीता जागता उदाहरण क्या हो सकता है ? शहीद के नाम पर वर्ष 2006 से निर्माणाधीन राजकीय महिला महाविद्यालय का कार्य इतनी धीमी गति से चल रहा है कि नौ वर्ष बाद भी वह तैयार नहीं हुआ। ये प्रोजेक्ट भी किसी और का नहीं खुद सपा मुखिया मुलायम सिंह का है। 2005 में शहीद की प्रतिमा का नगवां में अनावरण करने पहुंचे मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने नगवां में महिला महाविद्यालय बनाने की घोषणा की थी।
तब से इस महाविद्यालय का संचालन स्मारक सोसाइटी के एक सभाकक्ष में हो रहा है। जिसमें लगभग 600 छात्राएं बीए, बीएससी और बीकाम की शिक्षा ग्रहण कर रही है। यहां अध्यापकों का अभाव हमेशा से रहा है। इसे लेकर प्रभारी प्रचार्य डा. चंदन शाहू ने बताया कि महाविद्यालय में कुल नौ अध्यापक हैं।
अभी विद्यालय में अंग्रेजी, राजनीति शास्त्र, संस्कृत, रसायन विज्ञान तथा अर्थशास्त्र के अध्यापकों की कमी है। इसके लिए कई बार पत्र व्यवहार भी किया गया। लेकिन अध्यापकों की कमी दूर नहीं हुई। बताया कि सबसे प्रमुख समस्या तो विद्यालय भवन का निर्माण का है।
कहा कि जब जगह ही नहीं है तो अध्यापक पढ़ाएंगे कहां। वहीं शहीद के नाम पर स्मारक पार्क का हाल भी जर्जर है। शासन के उपेक्षा के कारण यहां दीवारें जर्जर होकर गिर रही है। वहीं मंगल पांडेय के नाम संचालित इंटर कालेज में भी इंटर में विज्ञान तथा कृ षि आदि विषयों की मान्यता न मिलना शासन के असहयोगात्मक रूख को दर्शाता है।
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प्रारंभिक शिक्षा के बाद मंगल पांडेय ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही के रूप में भर्ती हुए। लेकिन अंग्रेजों के कुचक्र से अनभिज्ञ थे। जब उन्हें यह मालूम हुआ कि अंग्रेजों ने सिपाहियों को गाय एवं सुअर की चर्बी लगी कारतूस प्रयोग करने के लिए दे रहे हैं तो वह आग बबूला हो गए और 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में अंग्रेज अफसरों को ललकारते हुए कई को मौत केे घाट उतार दिया।
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अंग्रेज अफसरों के काफी मशक्कत के बाद अखिरकार मंगल पांडेय गिरफ्तार हुए। उन पर मुकदमा चला और फांसी की सजा सुनाई गई। मंगल पांडेय को आठ अप्रैल 1857 को प्रात: साढे़ पांच बजे छावनी परिसर में फांसी दे दी गई। मंगल पांडेय के बलिदान ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया। उनकी शहादत ने अंग्रेजों के प्रति जो बगावत का बीज बोया कि उन्हें देश से उखाड़कर फेंक दिया। परिणामत: 15 अगस्त 1947 को लोगों ने आजादी की सुबह देखी।
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देश कीआजादी के लिए कुर्बानी देने वाले मंगल पांडेय के साथ लोकतंत्र के पहरूओं ने कोई न्याय नहीं किया। आजादी मिले भले ही 69 वर्ष बीत चुके हैं। ऐसे में यदि आपको लगता है कि आप शहीद के गांव तक पक्की सड़क से पहुंच जाएंगे तो भूल जाएं।
और तो छोड़िए शासन-प्रशासन की उपेक्षा का इससे बड़ा जीता जागता उदाहरण क्या हो सकता है ? शहीद के नाम पर वर्ष 2006 से निर्माणाधीन राजकीय महिला महाविद्यालय का कार्य इतनी धीमी गति से चल रहा है कि नौ वर्ष बाद भी वह तैयार नहीं हुआ। ये प्रोजेक्ट भी किसी और का नहीं खुद सपा मुखिया मुलायम सिंह का है। 2005 में शहीद की प्रतिमा का नगवां में अनावरण करने पहुंचे मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने नगवां में महिला महाविद्यालय बनाने की घोषणा की थी।
तब से इस महाविद्यालय का संचालन स्मारक सोसाइटी के एक सभाकक्ष में हो रहा है। जिसमें लगभग 600 छात्राएं बीए, बीएससी और बीकाम की शिक्षा ग्रहण कर रही है। यहां अध्यापकों का अभाव हमेशा से रहा है। इसे लेकर प्रभारी प्रचार्य डा. चंदन शाहू ने बताया कि महाविद्यालय में कुल नौ अध्यापक हैं।
अभी विद्यालय में अंग्रेजी, राजनीति शास्त्र, संस्कृत, रसायन विज्ञान तथा अर्थशास्त्र के अध्यापकों की कमी है। इसके लिए कई बार पत्र व्यवहार भी किया गया। लेकिन अध्यापकों की कमी दूर नहीं हुई। बताया कि सबसे प्रमुख समस्या तो विद्यालय भवन का निर्माण का है।
कहा कि जब जगह ही नहीं है तो अध्यापक पढ़ाएंगे कहां। वहीं शहीद के नाम पर स्मारक पार्क का हाल भी जर्जर है। शासन के उपेक्षा के कारण यहां दीवारें जर्जर होकर गिर रही है। वहीं मंगल पांडेय के नाम संचालित इंटर कालेज में भी इंटर में विज्ञान तथा कृ षि आदि विषयों की मान्यता न मिलना शासन के असहयोगात्मक रूख को दर्शाता है।