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फिरंगी को मारो, फिरंगी को मारो... से गूंजा बलिया
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कलेक्ट्रेट परिसर स्थित गंगा बहुद्देशीय सभागार में आयोजित आजादी के अमृत महोत्सव के तहत बलिदानी म
- फोटो : BALLIA
बलिया। ‘फिरंगी को मारो, फिरंगी को मारो...युगों की पुरानी धरोहर संभालो...’। शहर के चौराहों पर यह गीत गूंज उठा, एक जंग हुई। इस तरह मंगलवार को मंगल पांडेय को याद किया गया। आजादी के अमृत महोत्सव तहत आयोजित जयंती समारोह में लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी व संकल्प के रंगकर्मियों ने शहर के विभिन्न चौराहों और मंगल पांडेय की जन्मभूमि नगवा ने बलिदानी मंगल पांडेय नाटक की प्रस्तुतियां हुईं।
नाटक की शुरुआत शहीद के नमन गीत से हुई। बैरकपुर छावनी के बाहर बरगद की छांव में एक साधु बैठा है। वह चिमटा बजाकर गा रहा है। मंगल पांडेय साधु को प्रणाम करते हैं। परिचय पूछते हैं। साधु की त्योरी चढ़ जाती है, ‘एक गुलाम की हिम्मत कि मेरे बारे में पूछे’ मंगल पांडेय के साथी सैनिक बोल पड़े, ‘हम गुलाम नहीं, कंपनी की फौज के सिपाही हैं।’ साधु तंज कसता है ‘किसकी कंपनी, तुम गुलाम नहीं तो और क्या हो।’ साधु नाराज है कि विदेशी हमारी संस्कृति चौपट कर रहे हैं और भारतीय सैनिक उनकी चाकरी बजा रहे हैं। फौज में कारसूत में चर्बी लगे होने की बात फैलती है और सेना में खलबली मच जाती है। देश में पहले स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंका गया। मंगल पांडेय को फांसी हुई तो दर्शकों की आंखें नम हो गईं। टाउन हाल, कदम चौराहा, रेलवे स्टेशन और वीर लोरिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में इसकी प्रस्तुतियां हुईं। अकादमी के निदेशक प्रो. दिनेश खन्ना को सम्मानित किया गया।
मंगल पांडेय की जन्मतिथि सही करने की मांग
बलिया। फेडरेशन ऑफ आल इंडिया व्यपार मंडल के प्रदेश संगठन मंत्री जितेंद्र चतुर्वेदी ने पहली आजादी की लड़ाई के नायक मंगल पांडेय की जन्मतिथि का विवाद समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को मेल भेजा है। जन्मतिथि सही कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि शहीद मंगल पांडेय के पैतृक गांव पर लगे बोर्ड में उनकी जन्मतिथि 30 जनवरी 1831 लिखी है जबकि सरकार ने 19 जुलाई घोषित किया है। इसके सुधार के लिए कई बार आवाज उठी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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नाटक की शुरुआत शहीद के नमन गीत से हुई। बैरकपुर छावनी के बाहर बरगद की छांव में एक साधु बैठा है। वह चिमटा बजाकर गा रहा है। मंगल पांडेय साधु को प्रणाम करते हैं। परिचय पूछते हैं। साधु की त्योरी चढ़ जाती है, ‘एक गुलाम की हिम्मत कि मेरे बारे में पूछे’ मंगल पांडेय के साथी सैनिक बोल पड़े, ‘हम गुलाम नहीं, कंपनी की फौज के सिपाही हैं।’ साधु तंज कसता है ‘किसकी कंपनी, तुम गुलाम नहीं तो और क्या हो।’ साधु नाराज है कि विदेशी हमारी संस्कृति चौपट कर रहे हैं और भारतीय सैनिक उनकी चाकरी बजा रहे हैं। फौज में कारसूत में चर्बी लगे होने की बात फैलती है और सेना में खलबली मच जाती है। देश में पहले स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंका गया। मंगल पांडेय को फांसी हुई तो दर्शकों की आंखें नम हो गईं। टाउन हाल, कदम चौराहा, रेलवे स्टेशन और वीर लोरिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में इसकी प्रस्तुतियां हुईं। अकादमी के निदेशक प्रो. दिनेश खन्ना को सम्मानित किया गया।
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मंगल पांडेय की जन्मतिथि सही करने की मांग
बलिया। फेडरेशन ऑफ आल इंडिया व्यपार मंडल के प्रदेश संगठन मंत्री जितेंद्र चतुर्वेदी ने पहली आजादी की लड़ाई के नायक मंगल पांडेय की जन्मतिथि का विवाद समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को मेल भेजा है। जन्मतिथि सही कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि शहीद मंगल पांडेय के पैतृक गांव पर लगे बोर्ड में उनकी जन्मतिथि 30 जनवरी 1831 लिखी है जबकि सरकार ने 19 जुलाई घोषित किया है। इसके सुधार के लिए कई बार आवाज उठी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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