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जयंती पर विशेषः जेपी का बेखौफ घूमना ब्रिटिश सल्तनत के लिए थी बड़ी चुनौती
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जयप्रकाशनगर। समाजवाद के पुरोधा लोक नायक जयप्रकाश नारायण 9 नवंबर 1942 में दीपावली के दिन जेल में बंद थे। जेल में सांस्कृतिक कार्यक्रम व भोजन का इंतजाम था। इसीबीच जयप्रकाश पांच साथियों के साथ जेल की दीवार लांघ निकल गए। जेल से निकलने के बाद वह जब गया जिले में प्रवेश किए तो वे लोग दो भागों में बंट गए।
एक दल मुजफ्फरपुर व दूसरा दल बनारस के लिए रवाना हो गया। दूसरे दल में जयप्रकाश नारायण भी थे। चलते चलते दो तीन स्टेशन के बाद करौंदिया स्टेशन आया। वहीं, जयप्रकाश जी तीसरे दर्जे की बोगी में घुस गए। सिर के बाल मुड़े हुए, बढ़ी हुई दाढ़ी, मटैला कुर्ता, सिर पर पगड़ी और पैरों में देहाती जूता था। उधर, पहला दल मुजफ्फरपुर से पहले ही पकड़ लिया गया, जबकि दूसरे दल के लोग बनारस पहुंचे और विश्ववद्यिालय पर रुक गए। उन्होंने दिल्ली व मुंबई में भूमिगत होकर अपना कार्य शुरु कर दिया। सबमें नई जान आ गई।
उसी समय जेपी ने मजदूरों, अमेरिकी सेना के अधिकारियों व छात्रो को पत्र लिखा। जेपी को स्वयंसेवकों की आवश्यकता थी जो अंग्रेजी हुकूमत के दस्तों पर छापा मारकर अपना कब्जा जमाए रखते। इस टीम का नाम आजाद हुकूमत रखा गया। जेपी द्वारा अपना ब्राडकास्टिंग स्टेशन भी कायम किया गया। इसके संचालक डॉ. राममनोहर लोहिया बनाए गए। इसी समय अंग्रेजी हुकूमत को इस बात की भनक लगी और डा लोहिया व जेपी दोनों पकड़ लिए गए और दोनों को हनुमान नगर थाने ले जाया जाने लगा। रास्तेे मेें किसी प्रकार जेपी ने आजाद हिंद टीम को खबर कराई कि कुछ हो सके करो ताकि मैं भाग सकूं। सूचना पाते ही यह टीम हनुमान नगर आ धमकी।
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इस टीम में 35 सैनिक थे। योजना के अनुसार सातों कैदी सो गए। इसी बीच अचानक गोलियां चलने लगी और अपनी जान की परवाह किए बिना जेपी सहित सातों बहादुर दौड़ पड़े और सभी जहां तहां चले गए। इसके बाद जयप्रकाश नारायण कलकत्ता पहुंचे और फिर आजादी के काम में जुट गए। अंग्रेजी हुकूमत इनसे हैरान थी। जयप्रकाश नारायण को बेखौफ घूमना ब्रिटिश सल्तनत के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। लेकिन जेपी के जेहन पर इसका कोई प्रभाव नहीं था।
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एक दल मुजफ्फरपुर व दूसरा दल बनारस के लिए रवाना हो गया। दूसरे दल में जयप्रकाश नारायण भी थे। चलते चलते दो तीन स्टेशन के बाद करौंदिया स्टेशन आया। वहीं, जयप्रकाश जी तीसरे दर्जे की बोगी में घुस गए। सिर के बाल मुड़े हुए, बढ़ी हुई दाढ़ी, मटैला कुर्ता, सिर पर पगड़ी और पैरों में देहाती जूता था। उधर, पहला दल मुजफ्फरपुर से पहले ही पकड़ लिया गया, जबकि दूसरे दल के लोग बनारस पहुंचे और विश्ववद्यिालय पर रुक गए। उन्होंने दिल्ली व मुंबई में भूमिगत होकर अपना कार्य शुरु कर दिया। सबमें नई जान आ गई।
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उसी समय जेपी ने मजदूरों, अमेरिकी सेना के अधिकारियों व छात्रो को पत्र लिखा। जेपी को स्वयंसेवकों की आवश्यकता थी जो अंग्रेजी हुकूमत के दस्तों पर छापा मारकर अपना कब्जा जमाए रखते। इस टीम का नाम आजाद हुकूमत रखा गया। जेपी द्वारा अपना ब्राडकास्टिंग स्टेशन भी कायम किया गया। इसके संचालक डॉ. राममनोहर लोहिया बनाए गए। इसी समय अंग्रेजी हुकूमत को इस बात की भनक लगी और डा लोहिया व जेपी दोनों पकड़ लिए गए और दोनों को हनुमान नगर थाने ले जाया जाने लगा। रास्तेे मेें किसी प्रकार जेपी ने आजाद हिंद टीम को खबर कराई कि कुछ हो सके करो ताकि मैं भाग सकूं। सूचना पाते ही यह टीम हनुमान नगर आ धमकी।
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इस टीम में 35 सैनिक थे। योजना के अनुसार सातों कैदी सो गए। इसी बीच अचानक गोलियां चलने लगी और अपनी जान की परवाह किए बिना जेपी सहित सातों बहादुर दौड़ पड़े और सभी जहां तहां चले गए। इसके बाद जयप्रकाश नारायण कलकत्ता पहुंचे और फिर आजादी के काम में जुट गए। अंग्रेजी हुकूमत इनसे हैरान थी। जयप्रकाश नारायण को बेखौफ घूमना ब्रिटिश सल्तनत के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। लेकिन जेपी के जेहन पर इसका कोई प्रभाव नहीं था।