पड़ताल: फॉर्मेलिन की लेप चढ़ी मछलियां हानिकारक, रोजाना 30 क्विंटल की है खपत; ध्यान दें- सेहत न हो जाए खराब
मछली को ताजा बनाए रखने के लिए फॉर्मेलिन का लेप लगाया जाता है, जो सेहत के लिए हानिकारक है। इससे तमाम तरह की बीमारियां होती हैं। हालांकि, इस लेप से व्यापारियों को काफी कम नुकसान उठाना पड़ता है।
विस्तार
अगर आप मछली खाने के शौकीन हैं तो सावधान हो जाइए। शहर में आंध्रप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल से मछलियां आती हैं। इन्हें ताजा रखने के लिए फॉर्मेलिन का लेप चढ़ाया जा रहा है, जो सेहत के लिए काफी नुकसानदायक है। जिले में रोजाना 30 क्विंटल मछली की खपत है। सहालग में यह बढ़कर एक टन हो जाता है।
शहर में कटहल नाले के पास मछली मंडी है। यहीं पर स्थानीय मछलियों के अलावा बाहर से मछलियां मंगाई जाती हैं। अधिकतर दुकानों पर देखा जाता है कि बर्फ के अंदर मछलियां रखी जाती हैं। मछली कारोबारियों ने बताया कि आंध्र प्रदेश और सुदूर राज्यों से मंगाई जाने वाली मछलियां बर्फ में रखकर शहर तक पहुंचाई जाती हैं।
मछलियों को फॉर्मेलिन रसायन के घोल में डाला जाता है। इसके बाद इन्हें बर्फ रखकर थर्मोकोल के डिब्बे में पैक किया जाता है। ताकि जल्दी खराब न हों। शहर की मछली मंडी में रोहू, बिगेट, भाकुर, बैकर, पापलेट मछली की मांग अधिक है। जानकारों के अनुसार, केमिकल लगी मछली को करीब तीन माह तक ताजा रखा जा सकता हैं। इससे कारोबारियों को नुकसान का खतरा कम रहता है।
हालांकि इन मछलियों के सेवन से सेहत खराब हो सकती है। सहालग में बढ़ती मांग को देखते हुए कारोबारी इसकी तैयारी पहले ही कर लेते हैं। मांग के हिसाब से मछलियां मंगाकर रख लेते हैं। मछली विक्रेता रमेश साहनी, बृजलाल सहनी, राम मिलन साहनी ने बताया कि ग्राहकों की सेहत का ख्याल रखा जाता है। चंद लोगों की वजह से ईमानदारी से कारोबार करने वाले बदनाम होते हैं। स्थानीय कारोबारियों से मछलियों को लाकर बेचा जाता है।
किडनी हो सकती है खराब
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. पंकज झा ने बताया कि बर्फ के अंदर रखी गईं मछली खाने से किडनी तेजी से खराब होती है। इतना ही नहीं किडनी के साथ ही शरीर के विभिन्न अंगों पर भी इसका गलत असर पड़ता है। फॉर्मेलिन एक खतरनाक हानिकारक रसायन है। यह शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके सेवन से लीवर के साथ ही किडनी समेत कई महत्वपूर्ण अंगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
विभाग की जांच में सब कुछ ठीक मिला
खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की ओर से बीते जनवरी माह 10 नमूने जांच के लिए भेजा गया था। विभाग के अनुसार रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी नहीं आई। सब कुछ ठीक पाया गया था।
जनपद में मछली बिक्री के 15 लाइसेंस जारी हुए हैं। पंजीकृत कारोबारियों को विभाग की ओर से समय-समय पर जागरूक किया जाता है। उधर, धंधेबाज जिम्मेदारों की आंखों में धूल झोककर अपना धंधा चमकाकर मोटी रकम बना रहे हैं।
बोले अधिकारी
जांच रिपोर्ट में रसायन की पुष्टि नहीं नहीं हुई है। समय-समय पर जांच की जाती है। पंजीकृत कारोबारियों को जागरूक किया जाता है। अभियान चलाकर जांच की जाएगी। - दिनेश कुमार राय, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी, बलिया।
जिले में करीब 2100 पोखरियों में मछली का पालन होता है। पिठले वर्ष जिले में 26000 टन का उत्पादन जिले में हुआ है। मत्स्य उत्पाद के क्षेत्र में जिला आत्मनिर्भर नहीं है। विभाग की योजनाओं के जरिए जिले में मछली पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। ताजा रखने के लिए केमिकल उपयोग करना उचित नहीं है। - विकास मिश्रा, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मत्स्य विभाग, बलिया।
मछली के रेट
- रोहू 150 से 160 रुपये प्रति किलो
- रब्रिगेड 150 से 160 रुपये प्रति किलो
- रभाकुर 150 से 160 रुपये प्रति किलो
- रबैकर 130 रुपये प्रति किलो
तालाब से मंगाई मछली
- रोहू 300 रुपये प्रति किलो
- भाकुर 300 रुपये प्रति किलो
- ब्रिगेड सिल्वर 200 से 220 रुपये प्रति किलो
- पापुलर 160 से 180 रुपये प्रति किलो
- नैनी 180 रुपये प्रति किलो
- ग्रास 220 रुपये प्रति किलो
- चाइना 220 से लेकर 240 प्रति किलो