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Ballia News: बापू की नज़र में दूसरा बारदोली था बलिया
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नगर के सतीशचंद्र कालेज के मैदान आयोजित सभा को संबोधित करते महात्मा गांधी। फाइल फोटो
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बलिया जिले से गहरा रिश्ता रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में बलिया की भागीदारी से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी पत्रिका यंग इंडिया में लिखा था कि बलिया देश का दूसरा बारदौली है। दो अक्तूबर को बापू की 157वीं जयंती पर बलिया एक बार फिर उस इतिहास को याद कर रहा है।
इस रिश्ते की जड़ें 1920-21 के आंदोलन में हैं। वर्ष 1920 में जब स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर गांधी जी के हाथों में आई और 1921 में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ा, तो उसकी सबसे चमत्कारिक प्रतिक्रिया बलिया में हुई। इस आंदोलन के तहत बार कौंसिल, कचहरी, स्कूल-कॉलेज, सरकारी दुकानों, नौकरियों और विदेशी वस्त्रों व सामान के बहिष्कार के साथ ही विदेशी वस्तुओं का परित्याग और खादी पहनना शामिल था।
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बागी धरती ने बापू की अपील को माना
इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि बलिया की जनता ने बापू की अपील को अक्षरशः माना। इसका असर इस कदर रहा कि लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई, घर-घर चरखे पर सूत कातना और खादी पहनना शुरू कर दिया। नगरा के निवासी लक्ष्मी नारायण कांदू, जो जिले में गांजा के सबसे बड़े लाइसेंसी विक्रेता थे, ने अपना पूरा स्टॉक जला दिया और जीवन भर गांजा न बेचने की कसम खाई। कवि-अधिवक्ता गुरुमुख सिंह भक्त ने वकालत छोड़ दी, कचहरी के मुख्तार रामचंद्र लाल ने मुख्तारी छोड़ दी। रामहरख लाल, नगेश्वर उपाध्याय, अवध बिहारी पाण्डेय, मथुरा लाल, राम सनेही सिंह सहित बीसों लोगों ने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी। मुरली मनोहर लाल तो कानून की पढ़ाई छोड़कर इलाहाबाद से बलिया आ गए थे।
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16 अक्तूबर 1925 को आए थे बलिया, एससी कॉलेज में हुई थी सभा
आजादी के जन-जागरण को देखने और आंदोलन को गति देने के लिए 16 अक्तूबर 1925 को गांधी जी बलिया आए थे। शहर के एससी कॉलेज के मैदान में उनकी विशाल सभा हुई थी। उन्हें सुनने के लिए पूरे जिले से लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। मंच को इतना ऊंचा बनाया गया था कि हर कोई बापू को देख सके। साहित्यकार शिव कुमार कौशिकेय ने बताया कि सभा में बापू ने अपने यंग इंडिया में लिखे लेख की चर्चा करते हुए कहा था कि जालिम सरकार नहीं रखनी है और हर व्यक्ति को अपने इस संदेश को आत्मसात कर आंदोलन को तेज करने का आह्वान किया था। बलिया से लौटने के बाद बापू ने नवजीवन में बलिया जिले की जनसभा के ऊंचाई पर बांस से बने हिलते मंच, जनसैलाब और आत्मीय सत्कार पर लिखा था। बापू ने अधिवक्ता मुरली मनोहर लाल के जगदीशपुर स्थित आवास पर थोड़ी देर भोजन और विश्राम भी किया था।
गांधीजी के जीवन दर्शन में प्रकृति संरक्षण की थी अवधारणा
वर्तमान समय में महात्मा गांधीजी की प्रकृति संरक्षण संबंधी विचारों की सार्थकता और बढ़ गई है। मानव की भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास हेतु जिस तरह से प्रकृति का अंधाधुंध दोहन एवं शोषण किया गया और किया जा रहा है, उससे पृथ्वी कराह उठी है। पर्यावरणविद् डॉ. गणेश पाठक ने बताया कि गांधी जी ने सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण संबंधित विचार प्रस्तुत नहीं किए हैं, किंतु सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, स्वच्छता, प्रेम, दया, उनका आश्रम जीवन, खादी आंदोलन, प्राकृतिक चिकित्सा, स्वदेशी आंदोलन, कुटीर उद्योग, ग्रामीण अर्थव्यवस्था संबंधी विचार, श्रम एवं रोजगार संबंधी विचार, सादा जीवन एवं उच्च विचार आदि उनके विचार हैं। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उनका तात्पर्य अहिंसा से है। कहा कि हम खादी आंदोलन के विचार को देखें तो यह पाते हैं कि खादी मात्र एक वस्त्र की विचारधारा नहीं है, बल्कि एक पूरी जीवन प्रणाली है।
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इस रिश्ते की जड़ें 1920-21 के आंदोलन में हैं। वर्ष 1920 में जब स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर गांधी जी के हाथों में आई और 1921 में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ा, तो उसकी सबसे चमत्कारिक प्रतिक्रिया बलिया में हुई। इस आंदोलन के तहत बार कौंसिल, कचहरी, स्कूल-कॉलेज, सरकारी दुकानों, नौकरियों और विदेशी वस्त्रों व सामान के बहिष्कार के साथ ही विदेशी वस्तुओं का परित्याग और खादी पहनना शामिल था।
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बागी धरती ने बापू की अपील को माना
इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि बलिया की जनता ने बापू की अपील को अक्षरशः माना। इसका असर इस कदर रहा कि लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई, घर-घर चरखे पर सूत कातना और खादी पहनना शुरू कर दिया। नगरा के निवासी लक्ष्मी नारायण कांदू, जो जिले में गांजा के सबसे बड़े लाइसेंसी विक्रेता थे, ने अपना पूरा स्टॉक जला दिया और जीवन भर गांजा न बेचने की कसम खाई। कवि-अधिवक्ता गुरुमुख सिंह भक्त ने वकालत छोड़ दी, कचहरी के मुख्तार रामचंद्र लाल ने मुख्तारी छोड़ दी। रामहरख लाल, नगेश्वर उपाध्याय, अवध बिहारी पाण्डेय, मथुरा लाल, राम सनेही सिंह सहित बीसों लोगों ने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी। मुरली मनोहर लाल तो कानून की पढ़ाई छोड़कर इलाहाबाद से बलिया आ गए थे।
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16 अक्तूबर 1925 को आए थे बलिया, एससी कॉलेज में हुई थी सभा
आजादी के जन-जागरण को देखने और आंदोलन को गति देने के लिए 16 अक्तूबर 1925 को गांधी जी बलिया आए थे। शहर के एससी कॉलेज के मैदान में उनकी विशाल सभा हुई थी। उन्हें सुनने के लिए पूरे जिले से लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। मंच को इतना ऊंचा बनाया गया था कि हर कोई बापू को देख सके। साहित्यकार शिव कुमार कौशिकेय ने बताया कि सभा में बापू ने अपने यंग इंडिया में लिखे लेख की चर्चा करते हुए कहा था कि जालिम सरकार नहीं रखनी है और हर व्यक्ति को अपने इस संदेश को आत्मसात कर आंदोलन को तेज करने का आह्वान किया था। बलिया से लौटने के बाद बापू ने नवजीवन में बलिया जिले की जनसभा के ऊंचाई पर बांस से बने हिलते मंच, जनसैलाब और आत्मीय सत्कार पर लिखा था। बापू ने अधिवक्ता मुरली मनोहर लाल के जगदीशपुर स्थित आवास पर थोड़ी देर भोजन और विश्राम भी किया था।
गांधीजी के जीवन दर्शन में प्रकृति संरक्षण की थी अवधारणा
वर्तमान समय में महात्मा गांधीजी की प्रकृति संरक्षण संबंधी विचारों की सार्थकता और बढ़ गई है। मानव की भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास हेतु जिस तरह से प्रकृति का अंधाधुंध दोहन एवं शोषण किया गया और किया जा रहा है, उससे पृथ्वी कराह उठी है। पर्यावरणविद् डॉ. गणेश पाठक ने बताया कि गांधी जी ने सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण संबंधित विचार प्रस्तुत नहीं किए हैं, किंतु सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, स्वच्छता, प्रेम, दया, उनका आश्रम जीवन, खादी आंदोलन, प्राकृतिक चिकित्सा, स्वदेशी आंदोलन, कुटीर उद्योग, ग्रामीण अर्थव्यवस्था संबंधी विचार, श्रम एवं रोजगार संबंधी विचार, सादा जीवन एवं उच्च विचार आदि उनके विचार हैं। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उनका तात्पर्य अहिंसा से है। कहा कि हम खादी आंदोलन के विचार को देखें तो यह पाते हैं कि खादी मात्र एक वस्त्र की विचारधारा नहीं है, बल्कि एक पूरी जीवन प्रणाली है।