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Ballia News: 125 साल में मरीजों की संख्या चार गुना बढ़ी पर चिकित्सक जरूरत के आधे ही
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जिला अस्पताल परिसर स्थित आपातकालीन कक्ष।
बलिया। खुलने के 125 साल बाद जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या चार गुना हो गई। बेड की संख्या भी बढ़ती गई, लेकिन स्टॉफ की संख्या नहीं बढ़ी। इससे मरीजों के इलाज से लेकर देखरेख मुश्किल होती जा रही है। स्थिति यह है कि जितने पद स्वीकृत हैं, उन सभी पर तैनाती भी नहीं है। समय से साथ शासन की जारी योजनाओं के तहत बेड बढ़ते गए लेकिन डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट व वार्ड बॉय कम होते गए। जिला अस्पताल में 176 की जगह धरातल पर 236 बेड का संचालन हो रहा है। 236 बेड पर कम से कम 45 चिकित्सक चाहिए। लेकिन 25 पद ही सृजित हैं और तैनाती 22 की ही है। एक नर्स पर छह मरीज की जगह 30 से 40 मरीजों की निगरानी की जिम्मेदारी है। वहीं, जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के 149 अस्पतालों में 221 की जगह सिर्फ 87 चिकित्सक तैनात है।
जिला अस्पताल की स्थापना 1901 में हुई थी, जिसमें पुरुषों का उपचार किया जाता है। उस समय ओपीडी में तीन से चार सौ मरीज आते थे। पुराने वार्ड की जगह अस्पताल में वर्ष 2003 में 150 बेड के एनेक्सी भवन का निर्माण हुआ। सीएमएस, डॉक्टर, स्टाफ नर्स, आया, चीफ फार्मासिस्ट समेत 93 स्थायी पद सृजित थे। 124 वर्ष बाद तक अस्पताल में मरीजों की संख्या चार गुना बढ़ गई है। उसके बावजूद स्टाफ पुराने अस्पताल के मानक पर भी नहीं है। चिकित्सक को छोड़ अन्य सभी पद के सापेक्ष आधे स्वास्थ्यकर्मी तैनात है। 2015 के बाद इमरजेंसी व ट्राॅमा सेंटर शुरू हुआ लेकिन स्टाफ नहीं बढ़े।
70 वर्ष में बढ़ी सुविधा व बेड, नहीं बढ़े स्वास्थ्यकर्मी
वर्ष 1956 के करीब जिला अस्पताल परिसर में जिला महिला अस्पताल की अलग से स्थापना की गई। शुरुआत में यहां 54 बेड की व्यवस्था की गई थी और सीएमएस, डॉक्टर, स्टाफ नर्स, आया, चीफ फार्मासिस्ट समेत 38 स्थायी पद सृजित किए गए थे। तब से अब तक महिला अस्पताल में मरीजों की संख्या काफी बढ़ गई है। सौ शय्या व एसएनसीयू वार्ड का भी संचालन शुरू हो गया है। रोजाना ओपीडी में औसतन 530 महिलाएं आती हैं। हर माह 900 सौ से ज्यादा सामान्य और करीब 200 सिजेरियन प्रसव होते हैं। नवजातों के लिए भी एसएनसीयू की व्यवस्था है। दोनों अस्पताल को मिलाकर 61 के करीब स्वास्थ्यकर्मी तैनात है। जबकि नए अस्पताल में रेगुलर 17 व संविदा पर 23 चिकित्सक कुल 40 पद है, जिसमें 11 तैनात हैं। नया अस्पताल शुरू होने से पद तो बढ़ गए लेकिन इसके बावजूद शासन ने अब तक स्थायी कर्मियों के न पद बढ़ाए न सभी स्वीकृत पदों पर तैनाती की। विभागीय सूत्रों का कहना है कि चार वर्षों से शासन को रिक्त पदों पर तैनाती और जरूरत के हिसाब से पद सृजन के लिए पत्र लिखे जा रहे हैं।
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नर्सों की भी कमी
जिला अस्पताल में नर्सों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। इस वजह से एक नर्स को छह मरीज की जगह 20 से 36 मरीज की देखभाल करनी पड़ती है। जो काफी चुनौतीपूर्ण है। संविदा व आउटसोर्स कर्मी भी पूरे नहीं हैं। साफ-सफाई का काम आउटसोर्स कर्मियों से कराया जा रहा है।
न स्थायी एनेस्थेटिक मिला न रेडियोलॉजिस्ट
महिला अस्पताल में स्थायी एनेस्थेटिक (निश्चेतक) भी तैनात नहीं है। सिजेरियन से प्रसव कराने के लिए वॉक इंटरव्यू से तैनात एनेस्थेटिक को बुलाना पड़ता है। सर्जन के अभाव में प्रसव को छोड़ दूसरा ऑपरेशन नहीं होता है। बच्चेदानी सहित अन्य ऑपरेशन के लिए वाराणसी, मऊ या निजी अस्पताल में मरीज जाने के लिए विवश होते हैं। रेडियोलॉजिस्ट का पद लंबे समय से खाली है, महिलाओं का अल्ट्रासाउंड सोनोग्राफर करते हैं। जबकि जिला अस्पताल में इन दिनों दो रेडियोलॉजिस्ट तैनात है। रिक्त पद पर तैनाती की मांग लंबे समय से चल रही है।
समय के साथ शासन के निर्देश पर बेड व चिकित्सकीय सुविधा का विस्तार हो रहा है। समय-समय पर चिकित्सकों व स्वास्थ्यकर्मी की मांग को लेकर पत्र जारी किया जाता है। स्वास्थ्यकर्मी की कमी के बावजूद मरीजों को बेहतर इलाज की सुविधा मिल रही है। - डॉक्टर एसके यादव, सीएमएस जिला अस्पताल बलिया।
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जिला अस्पताल
1901 में निर्माण हुआ था
चिकित्सक - 25 के सापेक्ष 22
स्टाफ नर्स - 30/28
वार्ड बॉय - 23/8
फार्मासिस्ट - 11/04
रेडियोलॉजिस्ट - 02
एनस्थितिया - 01
पैथालाजिस्ट - 2/01
चर्मरोग - 0
ईएनटी सर्जन - 0
हृदयरोग विशेषज्ञ- 0
अस्पताल में कुल बेड 176 / 236
ईमरजेंसी में बेड - 16
मेडिकल वार्ड बेड- 24
आक्सीजन सिलिंडर - 80
कंस्ट्रेटर मशीन-- 36
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जिला महिला अस्पताल ..
1938 में महिला अस्पताल बना...
बेड - 54 बेड
चिकित्सक - 29/11
000
केस एक : मेडिकल वार्ड में गंगहरा गांव निवासी मनोज कुमार मां को लेकर भर्ती थे। उन्हाेने बताया कि वार्ड की हालत बेहद खराब है। एक नर्स पर 24 बेड के मरीजों की जिम्मेदारी है। समय पर मरीजों को इंजेक्शन व दवा नहीं मिल पा रहा है।
केस दो : अगरौली निवासी सुनीता देवी ससुर को लेकर इमरजेंसी वार्ड में भर्ती थी। बताया कि दो वार्ड की जिम्मेदारी एक नर्स पर है। पैरामेडिकल छात्र मरीजों की निगरानी कर रहे हैं। ड्रिप व इंजेक्शन लगाने के लिए कई बार नर्स के यहां दौड़ने के बाद वह आती है।
केस तीन : सड़क दुर्घटना में घायल खेजुरी निवासी संतोष कुमार एक साथी को लेकर पहुंचे थे। चिकित्सक ने देखने के बाद इंजेक्शन लिखकर लगाने के लिए कहा। फार्मासिस्ट भर्ती फाॅर्म भर रहा था, दूसरा कोई इंजेक्शन लगाने वाला नहीं था। फार्मासिस्ट ने पैरामेडिकल छात्रा से इंजेक्शन लगवाया।
केस चार : हड्डी वार्ड में एक नर्स पर बच्चा व हड्डी रोग मरीजों की देखरेख की जिम्मेदारी है। शहर के तिखमपुर निवासी सुनील कुमार ने बताया कि तीमारदार नर्स के पीछे-पीछे घूम रहे हैं। अकेले मरीजों की जिम्मेदारी नहीं संभल रही है।
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जिला अस्पताल की स्थापना 1901 में हुई थी, जिसमें पुरुषों का उपचार किया जाता है। उस समय ओपीडी में तीन से चार सौ मरीज आते थे। पुराने वार्ड की जगह अस्पताल में वर्ष 2003 में 150 बेड के एनेक्सी भवन का निर्माण हुआ। सीएमएस, डॉक्टर, स्टाफ नर्स, आया, चीफ फार्मासिस्ट समेत 93 स्थायी पद सृजित थे। 124 वर्ष बाद तक अस्पताल में मरीजों की संख्या चार गुना बढ़ गई है। उसके बावजूद स्टाफ पुराने अस्पताल के मानक पर भी नहीं है। चिकित्सक को छोड़ अन्य सभी पद के सापेक्ष आधे स्वास्थ्यकर्मी तैनात है। 2015 के बाद इमरजेंसी व ट्राॅमा सेंटर शुरू हुआ लेकिन स्टाफ नहीं बढ़े।
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70 वर्ष में बढ़ी सुविधा व बेड, नहीं बढ़े स्वास्थ्यकर्मी
वर्ष 1956 के करीब जिला अस्पताल परिसर में जिला महिला अस्पताल की अलग से स्थापना की गई। शुरुआत में यहां 54 बेड की व्यवस्था की गई थी और सीएमएस, डॉक्टर, स्टाफ नर्स, आया, चीफ फार्मासिस्ट समेत 38 स्थायी पद सृजित किए गए थे। तब से अब तक महिला अस्पताल में मरीजों की संख्या काफी बढ़ गई है। सौ शय्या व एसएनसीयू वार्ड का भी संचालन शुरू हो गया है। रोजाना ओपीडी में औसतन 530 महिलाएं आती हैं। हर माह 900 सौ से ज्यादा सामान्य और करीब 200 सिजेरियन प्रसव होते हैं। नवजातों के लिए भी एसएनसीयू की व्यवस्था है। दोनों अस्पताल को मिलाकर 61 के करीब स्वास्थ्यकर्मी तैनात है। जबकि नए अस्पताल में रेगुलर 17 व संविदा पर 23 चिकित्सक कुल 40 पद है, जिसमें 11 तैनात हैं। नया अस्पताल शुरू होने से पद तो बढ़ गए लेकिन इसके बावजूद शासन ने अब तक स्थायी कर्मियों के न पद बढ़ाए न सभी स्वीकृत पदों पर तैनाती की। विभागीय सूत्रों का कहना है कि चार वर्षों से शासन को रिक्त पदों पर तैनाती और जरूरत के हिसाब से पद सृजन के लिए पत्र लिखे जा रहे हैं।
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नर्सों की भी कमी
जिला अस्पताल में नर्सों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। इस वजह से एक नर्स को छह मरीज की जगह 20 से 36 मरीज की देखभाल करनी पड़ती है। जो काफी चुनौतीपूर्ण है। संविदा व आउटसोर्स कर्मी भी पूरे नहीं हैं। साफ-सफाई का काम आउटसोर्स कर्मियों से कराया जा रहा है।
न स्थायी एनेस्थेटिक मिला न रेडियोलॉजिस्ट
महिला अस्पताल में स्थायी एनेस्थेटिक (निश्चेतक) भी तैनात नहीं है। सिजेरियन से प्रसव कराने के लिए वॉक इंटरव्यू से तैनात एनेस्थेटिक को बुलाना पड़ता है। सर्जन के अभाव में प्रसव को छोड़ दूसरा ऑपरेशन नहीं होता है। बच्चेदानी सहित अन्य ऑपरेशन के लिए वाराणसी, मऊ या निजी अस्पताल में मरीज जाने के लिए विवश होते हैं। रेडियोलॉजिस्ट का पद लंबे समय से खाली है, महिलाओं का अल्ट्रासाउंड सोनोग्राफर करते हैं। जबकि जिला अस्पताल में इन दिनों दो रेडियोलॉजिस्ट तैनात है। रिक्त पद पर तैनाती की मांग लंबे समय से चल रही है।
समय के साथ शासन के निर्देश पर बेड व चिकित्सकीय सुविधा का विस्तार हो रहा है। समय-समय पर चिकित्सकों व स्वास्थ्यकर्मी की मांग को लेकर पत्र जारी किया जाता है। स्वास्थ्यकर्मी की कमी के बावजूद मरीजों को बेहतर इलाज की सुविधा मिल रही है। - डॉक्टर एसके यादव, सीएमएस जिला अस्पताल बलिया।
जिला अस्पताल
1901 में निर्माण हुआ था
चिकित्सक - 25 के सापेक्ष 22
स्टाफ नर्स - 30/28
वार्ड बॉय - 23/8
फार्मासिस्ट - 11/04
रेडियोलॉजिस्ट - 02
एनस्थितिया - 01
पैथालाजिस्ट - 2/01
चर्मरोग - 0
ईएनटी सर्जन - 0
हृदयरोग विशेषज्ञ- 0
अस्पताल में कुल बेड 176 / 236
ईमरजेंसी में बेड - 16
मेडिकल वार्ड बेड- 24
आक्सीजन सिलिंडर - 80
कंस्ट्रेटर मशीन
जिला महिला अस्पताल ..
1938 में महिला अस्पताल बना...
बेड - 54 बेड
चिकित्सक - 29/11
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केस एक : मेडिकल वार्ड में गंगहरा गांव निवासी मनोज कुमार मां को लेकर भर्ती थे। उन्हाेने बताया कि वार्ड की हालत बेहद खराब है। एक नर्स पर 24 बेड के मरीजों की जिम्मेदारी है। समय पर मरीजों को इंजेक्शन व दवा नहीं मिल पा रहा है।
केस दो : अगरौली निवासी सुनीता देवी ससुर को लेकर इमरजेंसी वार्ड में भर्ती थी। बताया कि दो वार्ड की जिम्मेदारी एक नर्स पर है। पैरामेडिकल छात्र मरीजों की निगरानी कर रहे हैं। ड्रिप व इंजेक्शन लगाने के लिए कई बार नर्स के यहां दौड़ने के बाद वह आती है।
केस तीन : सड़क दुर्घटना में घायल खेजुरी निवासी संतोष कुमार एक साथी को लेकर पहुंचे थे। चिकित्सक ने देखने के बाद इंजेक्शन लिखकर लगाने के लिए कहा। फार्मासिस्ट भर्ती फाॅर्म भर रहा था, दूसरा कोई इंजेक्शन लगाने वाला नहीं था। फार्मासिस्ट ने पैरामेडिकल छात्रा से इंजेक्शन लगवाया।
केस चार : हड्डी वार्ड में एक नर्स पर बच्चा व हड्डी रोग मरीजों की देखरेख की जिम्मेदारी है। शहर के तिखमपुर निवासी सुनील कुमार ने बताया कि तीमारदार नर्स के पीछे-पीछे घूम रहे हैं। अकेले मरीजों की जिम्मेदारी नहीं संभल रही है।